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*वैदिक दर्शन : रतियज्ञ के उद्देश्य*

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         डॉ. विकास मानव

 आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्द्ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशं तीति। 

   ~तैत्तिरीयोपनिषद् (भृगु वल्ली)

आनन्दः = सुख। ब्रह्म = ईश्वर। इति = ऐसे,निश्चयपूर्वक जाना। आनन्दाद् = आनन्द से.

  हि एवं खलु = वस्तुतः निश्चय ही. इमानि ये भूतानि = प्राणिवर्ग। जायन्ते = उत्पन्न होते हैं। आनन्देन = आनन्द से/ के द्वारा. जातानि=उत्पन्न हुए प्राणी. जीवन्ति = जीवित रहते हैं। आनन्दम् =आनन्द में. प्रयन्ति = प्रयाण करते हैं, लौट जाते हैं। अभिसंविशन्ति प्रविष्ट होते हैं, लीन हो जाते हैं।

   आनन्दः ब्रह्म इति वि-अजानात् = आनन्द ब्रह्म है.

   आनन्दात् हि एवं खलु इमानि भूतानि जयन्ते= (उन्होंने यह भी जाना कि) आनन्द से हो ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं।

आनन्देन जातानि जीवन्ति = आनन्द पाने की आशा में सभी प्राणी जीवन यापन करते हैं।

आनन्दं प्रयन्ति अभि-सम्-विशन्ति = आनन्द को प्राप्त होते हैं. आनन्द में प्रवेश करते हैं, आनन्द में लीन होते हैं। आनन्द में समा जाते हैं।

आनन्द से सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं-का अर्थ है, वह क्रिया जिसमें सुख मिलता है, जिसमें सुख होता है, उसके करने से पैदा होते हैं।

   यह क्रिया है मैथुन.  मैथुन में सहज आनन्द है। इसे पाने के लिये प्राणी मैथुन करता है और इस मैथुन से संतति होती है। मैथुन से उत्पन्न होने वाला प्राणी मैथुन की कामना करता है। उसमें मैथुन के संस्कार होते हैं। यह संस्कार उसे मैथुन के लिये प्रेरित करता है।

   मैथुनजन्य आनन्द को पाने के लिये वह जीवन की आकांक्षा करता है। इस आनन्द की प्राप्ति हेतु वह अनन्त गुना कष्ट सहने के लिये तैयार होता है।इसके लिये वह अपना जीवन अर्पण कर देता है।

   यह आनन्द ब्रह्म है. इसका तात्पर्य है कि ब्रह्म और आनन्द में अभेद है. आनन्द बहुत बड़ी वस्तु है, मूल्यवान वस्तु है, अगद्य है।

  शंकराचार्य का मण्डनमिश्र के साथ काशी में शास्त्रार्थ हुआ। इस शास्त्रार्थ में मण्डनमिश्र पराजित हुए। शंकराचार्य के पास मेघासाम्राज्य था। किसी को भी पराजित करना उनके लिये आसान कार्य था।

   मण्डनमिश्र की पत्नी ने इस पराजय को पूर्ण पराजय नहीं माना. अर्धांगिनी होने के नाते बिना उसे पराजित किये शंकराचार्य पूर्ण विजयी नहीं माने गये। अतः मण्डनमिश्र की पत्नी भारती से शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ।

   भारती ने उनसे काम पर प्रश्न करना प्रारम्भ किया। शंकराचार्य निरूत्तर हो गये। शंकराचार्य ने इसके लिये समय माँगा।

    आचार्य तो आठ वर्ष की आयु में सन्यास ले चुके थे। उन्हें काम-शास्त्र का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं था। शंकराचार्य सिद्ध योगी थे। अपने इस शरीर को भोग में लगाना नहीं चाहते थे। वे अपने शरीर से संभोग में उतरकर आश्रमधर्म को भी कलंकित नहीं कर सकते थे. कामोपभोग हेतु उन्होंने परकाया प्रवेश का निश्चय किया। शंकराचार्य ने अपने दो शिष्यों को अपने शरीर की रक्षा में नियुक्त किया। एकान्त स्थान में ये शिष्य अपने गुरु शरीर की रक्षा करते रहे। आचार्य ने अपने सूक्ष्म शरीर से एक तत्काल मृतराजा की देह में प्रवेश किया।

    शंकराचार्य का सूक्ष्म शरीर राजा के स्थूलशरीर द्वारा कामोपभोग करता रहा। संभोगी की शैली बदल जाने से रानी को संदेह होता था पर कर ही क्या सकती थी ? शरीर तो राजा का ही था। राजा के शरीर में सन्यासी और सन्यासी का व्यवहार अपने ढंग का एक मास तक रानियों के साथ कामक्रीड़ा करते हुए काम तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर आचार्य अपने शरीर में लौट आये।

    अब कामशास्त्र में निष्णात शंकराचार्य ने भारती को शास्त्रार्थ में पीछे ढकेला. अनन्तर, मण्डनमिश्र शंकराचार्य के चार प्रधान शिष्यों में से एक शिष्य हुए।

 रतियज्ञ के दो उद्देश्य होते हैं :

१. संतानोत्पत्ति (संतति विस्तार)

 २. आनन्दानुसन्धान (संभोग से समाधि सुख)

    व्यास ने कुरुवंश को नष्टप्राय होने से बचाने के लिये रतियज्ञ किया था. फलस्वरूप धतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर का जन्म हुआ।

   इसके ठीक विपरीत श्री शंकराचार्य ने आनन्दानुसन्धान के लिये मृत राजा के शरीर में प्रवेश कर रतियज्ञ पूर्ण किया था। शंकराचार्य के द्वारा किये गये रति यज्ञ से राजपत्नी गर्भवती नहीं हुई। जबकि महापुरुषों का वीर्य अमोघ होता है। इसमें हेतु है।

अथ यामिच्छेन्न गर्भ दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधायाभिप्रायापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यारेता एव भवति। 

  ~बृहदारण्यक उपनिषद (६ । ४। १०)

अथ याम् इच्छेत् न गर्भम् दधीत इति तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संघाय अभिप्राय अपान्यात् इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः आदद इति अरेताः एव भवति.

   अथ = और, सर्वप्रथम। याम् = जिस स्त्री को। इच्छेत् =चाहे। न =नहीं। गर्भम्= गर्भ को। दधीत = धारण करे। इति = ऐसे। तस्याम् = उस (स्त्री) में। अर्थम् = अभिप्राय को। निष्ठाय = रखकर मुखेन मुख से। मुखम् मुख को संधाय = मिलाकर लगाकर। इन्द्रियेण = इन्द्रिय बल से। ते तेरे रेतसा = वीर्य से. रेतः = वीर्य. आदद = सोचता हूँ. इति= ऐसा. अरेताः = वीर्य से रहित. एव ही भवति = हो जाती है।

   जिस स्त्री को पुरुष चाहे कि वह गर्भधारण न करे तो सर्वप्रथम उसमें अपने प्रयोजन को स्थापित कर, उसके मुख से अपना मुख मिलाकर प्राणवायु को बाहर निकाले (अभिप्राणन करे)। प्राण को बाहर रोके (अपानन करे।

   तब मैथुनक्रिया करते हुए कहे कि मैं अपने शिश्न बल से, अपने वीर्य से तेरे तुम्हारे रज को लेता हूँ।

   ऐसा करने एवं कहने से स्त्री अरेत हो जाती है। वीर्य उसकी योनि में नहीं गिरता और वह गर्भ धारण नहीं करती। स्त्री गर्भ धारण न करे इसके लिये विधिवत ऐसी क्रियाओं का प्रयोग बताया गया है।

   साँस लेना प्राणन है। साँस को देना अभिप्राणन है। जो सांस बाहर निकाल दी गई है, उसे न लेना अपानन है। अभिप्राणन एवं अपानन इन दो क्रियाओं का मैथुनकाल में क्रमशः प्रयोग करने से स्त्री गर्भवती नहीं होती।

    ब्रह्मश्चर्य साधना, ध्यानसाधना से वीर्य का स्तम्भन होता है. वीर्य स्खलित नहीं होता. दीर्घकाल तक मैथुन में रत रहा जाता है. जननेन्द्रिय शिथिल नहीं होती. स्त्री पूरी तरह संतुष्ट होती है. पुरुष शक्ति का संचय करता है. आत्मोत्थान करता है. सम्भोग समय में पुरुष का मुंह रखी के मुंह में होता है। यह अधरपान क्रिया है। 

  यदि पुरुष चाहता है कि स्त्री गर्भ धारण करे तो उसे इसका उल्टा करना चाहिये। 

अथ यामिच्छेद् दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधाय अपान्याभिमान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति।

  ~बृहदारण्यक उपनिषद् (६ । ४ । ११)

अथ याम् इच्छेत् दधीत इति तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संधाय अपान्य अभिप्राण्यात् इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः आदधामि इति गर्भिणी एव भवति।

  अथ याम् इच्छेत् = पुरुष चाहे। 

दधीति इति = स्त्री गर्भ धारण करे। 

तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संधाय= मुख से मुख को संयुक्त कर।अपान्य =सांस निकाल कर। 

 अभिप्राण्यात् = गहरा साँस खींचे. इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः = स्व इन्द्रिय बल से स्त्री के रज) में।

आदधामि = स्थापित करता हूँ, स्खलित करता हूँहूँ। 

इति = ऐसा (कहे)। गर्भिणी एव भवति = गर्भवती होना निश्चित है। 

पुरुष स्त्री के साथ रतिक्रिया करता है और इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य गर्भस्थापित करना होता है तो ऐसे अवसर पर उसे क्या करना चाहिये ? यही इस मंत्र का प्रतिपाद्य है।

    यह गर्भाधान क्रिया है। इसमें योनि में लिंग का समावेशन होता है। इसके पश्चात् स्त्री, पुरुष के अधरोष्ठ को अपने दोनों ओष्ठों के बीच में रखकर उसका चूषण करती है। व्युत्क्रमतः पुरुष, स्त्री के अधरोष्ठ को।

   गर्भाधान यज्ञ में ‘अभिप्राण्य अपान्यात्’ सूत्र से पुरुष अपानन के पश्चात् अभिप्राणन करता है। इसमें प्राण वायु को अपने अन्दर खींचते हुए पुरुष अपने वीर्य को स्त्री की योनि के भीतर गिराता है। इससे गर्भ ठहरता है।

अग्नि जब प्रज्जवलित हो, तभी उसमें घी की आहुति डालनी चाहिये। अप्रज्जवलित/बुझी हुई अग्नि में मृताहुति डालना व्यर्थ होता है। स्त्री की योनि के मध्य भाग में अग्नि का निवास होता है। यह अग्नि जब तक जागे न लपटों से युक्त न हो, सुप्रज्ज्वलित न हो तब तक उसमें वीर्य रूपों घृत की आहूति नहीं डालना चाहिये।

   सुप्त अग्नि में वीर्याहुति व्यर्थ होती है। ऐसी अवस्था में गर्भाधान नहीं होता। अतः योषाग्नि को सर्वप्रथम प्रज्जवलित करना चाहिये। शिश्न की सतत गति से योनि को भीतरी दीवारों पर घर्षण के बढ़ने से उष्मा बढ़ती है। जैसे ग्वाला गाय के थन को मुझे में लेकर उससे दूध निकालता है, ठीक वैसे ही योनि को अन्तमांसपेशियाँ शिश्न से वीर्य का दोहन करती हैं। ऐसी अवस्था में वीर्य का रोक पाना पुरुष के लिये नितान्त कठिन होता है।   

    खुजलाहट के साथ स्त्री का रज जब क्षरित होता है तभी पुरुष का वीर्य झरना चाहिए। इन दोनों का परस्पर एक साथ मिलन गर्भाधान है।

   प्राय:  पुरुष शीघ्र उत्तेजित होता है और उसका वीर्य टपक पड़ता है। स्त्री शीघ्र नहीं उत्तेजित होती. विलम्ब से उत्तेजित होती है। गर्भाधान में पुरुष को उत्सुकता और धैर्य के साथ मैथुन करते रहना चाहिये। स्त्री स्खलित नहीं हुई और पुरुष स्खलित हो गया तो गर्भ नहीं ठहरता। स्त्री संतुष्ट भी नहीं होती. रोगी भी बनती है. पुरुष को पाप लगता है. इस तरह दोनों की क्षति.

  ऐसा काम जातक को मारता है। इसलिये ये मारक हैं। काम अमूर्त देवता है। यह आँखों में बसता है. जिहा  पर रहता है. ओठों में होता है. योनि व शिश्न में इसका प्रकृष्ट वास होता है।

 सम्भोग से स्त्री और पुरुष तृप्त होते हैं, क्षरित होकर शान्त वा शिथिल हो जाते हैं। इस प्रकार उन दोनों के अन्दर का काम शांत हो जाता है।

    यह काम पुनः अशांत होता है। धीरे-धीरे यह बढ़ता है, बढ़कर पुष्ट होता है. दोनों फिर एक दूसरे को देखने के लिये, बोलने के लिये तथा चूमने के लिये व्याकुल होते हैं। यह व्याकुलता बढ़कर उन्हें मैथुनातुर करती है। इसमें बाधा होना इनके लिये मृत्युतुल्य है।

शिव जी ने काम को मारा. अपने तीसरे नेत्र से जलाया. ज्ञान से शान्त किया। यह सर्वविदित है। काम तब से अशरीरी होकर अधिक व्यापक और शक्तिशाली हो गया।

   काम तो जल-मर नहीं सकता। मरा-जला उसका शरीर कामप्रेत बन गया है। इसी प्रेत काम ने शिवकोधर दबोचा। शिव ने स्कन्द को पैदा किया। स्कन्द पार्वती के पुत्र नहीं थे। ये किसी स्त्री के गर्भ में पले ही नहीं इसलिये मातृहीन हैं।

    शिव पार्वती के साथ खुले एकान्त स्थान में बिहार कर रहे थे। शिव पार्वती के साथ मैथुनरत थे। इसी समय ऋषिगण उनसे मिलने के लिये आये। हड़बड़ी में शिव ने अपना लिंग पार्वती की योनि से बाहर निकाला। उनका वीर्या योनि में न गिरकर बाहर भूमि पर बिछे हुए सरकण्डों पर पड़ा।

   इस वीर्य के ६ भाग हो गये। इस अमोघ वीर्य के एक-एक भाग को ६ कृत्तिकाओं ने ले लिया। इन कृत्तिकाओं ने आपस में मिलकर इस वीर्य के ६ भागों को एक में मिलाकर ६ सिर, १२ आंख १२ हाथ वाले एक अद्भुत बालक को रचना किया। इसे कार्तिकेय कहा गया।

  यह घटना सामान्य लोगों के लिये बोधगम्य नहीं है। ६ कृत्तिकाएँ ही कृत्तिकानक्षत्र के ६ तारे हैं। कृतिका का स्वामी सूर्य है। सूर्य ही शिव है। सूर्य अग्नि है। इसीलिये कार्तिकेय का नाम अग्निभू है। पार्वती त्रिगुणात्मक मूल प्रकृति है।

मनुष्यवदेवताभिधानम्.  पौराणिक कथाएँ इस सूत्र के परिप्रेक्ष्य में सत्य का निगूहन एवं अनावरण करती हैं। मूखों को यह सब अटपटा अश्लील और अनहोनी मालूम पड़ता है। यह मूर्खो के लिये नहीं, विद्वानों के लिये है।

 ब्रह्म सत् है, चित् है, आनन्द है। ‘सच्चिदानन्दं ब्रह्म’ जो इस आनन्द को नहीं जानता, जिसने इस आनन्द का अनुभव नहीं किया, वह ब्रह्म को क्या जानेगा ? वह ब्रह्म सुख की कल्पना कैसे करेगा ? उपस्थ (लिंग-योनि) आनन्द का घर है। 

सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकावनम्।

       (बृह. उप. ४ । ५ । १२)

आनन्द एक होकर भी अनेक है। आनन्द अपने अन्दर है। आनन्द अपने बाहर भी है। पुरुष का आनन्द स्त्री के अन्दर रहता है। इसको पाने के लिये पुरुष, स्त्री के पास जाता है। स्त्री का आनन्द पुरुष के अन्दर रहता है। इसे पाने के लिये स्त्री, पुरुष के निकट जाती है। पुरुष, स्त्री से आनन्द प्राप्त करता है। स्त्री, पुरुष को आनन्द देती है। पुरुष स्त्री को आनन्द देता है। स्त्री, पुरुष से आनन्द पाती है। यह संसार इसी आनन्द का चक्र है।

    देने में आनन्द है लेने में भी आनन्द है। यदि लेन-देन में आनन्द न हो तो ऐसा लेन देन किस काम का ? दाता को देने मेंसुख मिलना ही चाहिये। जो पाता है, उसको भी लेने में सुख होना चाहिये। जब माहक और दाता दोनों को सुखानुभूति होती है तो ऐसे व्यापार को उत्तम कहा जाता है।

    स्त्री और पुरुष दोनों एक ही साथ एक ही समय में दाता और माहक होते हैं। यदि दोनों आनन्दित है तो उनका पारस्परिक व्यापार (मैथुन यश) श्रेष्ठ है, अन्यथा तुच्छ स्त्री, पुरुष के वीर्य को लेती है। पुरुष अपना वीर्य स्त्री की योनि में उड़ेलता है। पुरुष का वीर्य जब स्त्री की योनि में गिरता है तो उसे अतीव सुख मिलता है। ये देने का आनन्द है। स्त्री जब पुरुष के वीर्य को अपनी योनि में लेती है, उसके उष्मात्मक स्पर्श से उसे आनन्द मिलता है।

   इसी प्रकार, स्त्री अपना रज पुरुष को देती है। उस रज के स्पर्श की सुखानुभूति पुरुष अपने शिशन (लिंग के अग्रभाग) से करता है। स्त्री जब अपना रज पुरुष के शिश्न पर चुवाती है तो उसे अतीव आनन्द मिलता है। इस आनन्द की अनुभूति में वह आँखें मूंद लेती है तथा स्तब्ध हो जाती है। स्त्री रज देकर आनन्दित होती है तो पुरुष रज लेकर उतना ही आनन्दित होता है। दोनों का आनन्द एक समान होता है। संभोग = आनंद का समान भोग. अगर पुरुष जल्दी निचुड़ जाए तो यह संभोग नहीं, स्त्री शोषण होता है.

    यदि पुरुष का आनन्द स्त्री के आनन्द से अधिक है तो अन्याय है। यदि स्त्री का आनन्द पुरुष से अधिक है तो भी अन्याय है। अतः स्त्री और पुरुष दोनों को चाहिये कि वे एक दूसरे को समान आनन्द दें तथा समान आनन्द लें। यही न्यायोचित रतियज्ञ है। 

सम्भोग के सुख में, आनन्द की खोज में पुरुष, स्त्री हो जाता है तथा स्त्री, पुरुष हो जाती है। यह अद्भुत क्रिया है। स्त्री में पुरुष तत्व की न्यूनता होती है। पुरुष में स्त्री तत्व की अल्पता होती है। यही अभाव उन दोनों को एक दूसरे के निकट लाता है। दोनों अर्धनारीश्वर बनना चाहते हैं।

 अर्धनारीश्वर का अर्थ हुआ- स्त्री और पुरुष तत्व समान मात्रा में धारण करते हुए क्रियाशील रहना। हर स्त्री हर पुरुष अर्धनारीश्वर का अपूर्ण रूप है। इसकी पूर्णता समत्व के लिये ये परस्पर मिलते हैं, संश्लिष्ट होते हैं, एक दूसरे में प्रविष्ट होकर अपने अभाव की पूर्ति करते हैं। संभोग में समत्व होता है। समत्य में आनन्द है, सुख है। क्योंकि :

समत्वं योगमुच्यते।

 ~श्रीमद्भागद्गीता)

संभोग में समता होती है। इससे सुख की उत्पत्ति होती है.

   संभोग समुद्र का मन्थन करके स्त्री-पुरुष सुखरूप रत्न पाते हैं। स्त्री और पुरुष का स्वस्थ संयोग आनन्द का स्रोत ही नहीं है, यह ब्रह्म और जीव के मिलन का, भक्त और भगवान् के सान्निध्य का भी स्थान है। हर प्रकार के आनन्दों की यह स्थली है। इस आनन्द को पाने के लिये लोग जीते और साँस लेते हैं। 

को होवान्यात् कः प्राप्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । 

  ~तैतिरीय उपनिषद (२/७)

कः हि एवं अन्यात् कः प्राण्यात् यद् एषः आकाशः आनन्दः न स्यात्।

अन् धातु अनिति जीवने विधिले प्र.पु. एक व. अन्यात्।

 प्र + अन् प्रणिति श्वास-प्रश्वासे विधिलिङ् प्र.पु. एक व. प्राण्यात्। 

आकाश = व्यापक।

यदि वह व्यापक आनन्द न होता तो कौन जीवित रहता ? कौन साँस लेता ?

  एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति। 

~बृहदारण्यक् उप. (४ । ३ । ३२)

 एतस्य एव अनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उप जीवन्ति.

अन्य समस्त लोग, आनन्द के ही इस अंश को पाकर जीवित रहते हैं। 

आनन्द से पृथक कौन है ? चाहे वह आनन्द भौतिक हो वा पराभौतिक।

स्त्री और पुरुष के बीच खटपट/ विभेद / झगड़ा/वैमनस्य नहीं होना चाहिये। इसके लिए १+१=१ का सूत्र अपनाना चाहिए। इसी में आनन्द है. जीव और ईश्वर का एकीकरण यहीं होता है। समाधि अवस्था में ईश्वर और जीव का भेद मिट जाता है। न ईश्वर रहता है, न जीव रहता है। इन दोनों के स्थान पर जो अनिर्वचनीय तत्व रहता है, उसे ब्रह्म कहते हैं।

   यह निर्गुण है और आनन्द है। जो इस आनन्द को जानता है वह अभय होता है। वह किसी से क्यों कम्पित होवे ? अद्वैत में दो होता नहीं। डर तो द्वैत में है। आनन्द में कभी भी डर नहीं होता। 

आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कदाचन।

 ~तैत्तिरीय उपनिषद (२ । ४)

तस्य ब्रह्मणः आनन्दम् विद्वान् कदाचन न बिभेति. 

उस ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला / अनुभव करने वाला कभी भय नहीं करता। तस्मै ब्रह्मणे नमः। तस्मै विदुषे नमः।

मैथुनानन्द ब्रह्मानन्द है। ब्रह्मानन्द काल निरपेक्ष है, शाश्वत है, निरवधि है। इसलिये व्यक्ति (स्त्री व पुरुष) को चाहिये कि वे मैथुनजन्य सुख को ब्रह्मानन्द की छाया वा झलक समझ कर पूर्णत्व की ओर उन्मुख होवें। इसको पाने के लिये, इसे सिद्ध करने के लिये अनन्त वर्षो तक जीयें। 

एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्ष शतादपि।

  ~रामायण (सुन्दरकाण्ड, सर्ग ३४)

मनुष्य स्वस्थ संभोग को जीता है तो सौ वर्ष के बाद भी उसे आनन्द प्राप्त होता है।

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