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वैदिक दर्शन : क्रांति वृत्त, मनुष्य वृत्ति और लेवल-7 

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      डॉ  विकास मानव 

पृथ्वी एक निष्चित मार्ग पर चलती हुई सूर्य के चारों ओर नित्य परिक्रमा करती है। इस परिक्रमा मार्ग को क्रान्ति वृत्त कहा जाता है. यह वृत्त दीर्घ वृत्ताकार है।

     जिस प्रकार पृथ्वी का सूर्य के चतुर्दिक् दीर्घ वृत्ताकार परिभ्रमण मार्ग है, ठीक उसी प्रकार चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों ओर एक परिभ्रमण मार्ग है। इस चन्द्र परिभ्रमण वृत्त को दक्षवृत्त कहा गया है। 

       दक्षवृत्त चन्द्रमा के सम्बन्ध से सोममय है। सौम्यप्राण स्त्री (योषा) कहे गए हैं। इस सौम्य प्राण की स्थिति दक्ष मार्ग पर है। इसीलिये पुराणों में वैदिक विज्ञान को समझाते हुये इसे दक्ष की कन्या बताया गया है। इसके विपरीत वृषा प्राण यानि पुरूष प्राण हैं। जैसे सूर्य, चंद्र अरिष्टनेमि, धर्म, अंगिरा, कृशाश्वा, भार्गव आदि ये देवताप्राण हैं, ऋषिप्राण हैं, इस दक्षवृत्त के जिस पर योषा प्राण स्थित है उसके साठ स्वरूप प्रकट होते हैं।

     पुराणों की भाषा में इस दिव्य ज्ञान को सहज ही समझाया गया है कि दक्ष की साठ कन्याएँ थीं जिनका विभिन्न देवताओं व ऋषियों के साथ विवाह हुआ। वस्तुतः पुराणों में वर्णित वह चर्चा स्पष्ट रूप से भूलोक व अन्तरिक्षलोक का इतिवृत्त है। 

     जो घटना अन्तरिक्ष में अदृश्य प्राणात्मक शक्तियों द्वारा हुई उसी का निदर्शन आदर्श रूप में प्रस्तुत करने हेतु उन प्राणशक्तियों द्वारा ही दिव्य देह धारण की गई तथा उस अन्तरिक्ष्य शक्ति प्रक्रिया की भौतिक रूप में प्रतिकृति हुई, इसका ही उल्लेख हमें पुराणों में मिलता है। 

       चन्द्रमा का परिभ्रमण वृत्त दक्षवृत्त जिस पर सौम्य योषा प्राण अवस्थित है उसके साठ भाग एक ही प्रकार से नहीं हुए अपितु भिन्न भिन्न प्रकार से हुए। दक्षवृत्त पर स्थित प्राण के सत्ताइस भाग हुए तथा सत्ताइस भागों का समुच्चय चन्द्र पत्नि बना पुनः उस प्राणात्मक शक्ति ने स्वयं चार भागों में बाँटा तब उसके साथ अरिष्टनेमि का विवाह हुआ। 

      दक्षवृत्त द्विधा विभक्त होकर नये योषा प्राणात्मक स्वरूप में प्रकट हुआ, तब उन दोनों का सम्बन्ध अंगिरा से हुआ। धर्म के सम्बन्ध में दस विभाग हुए। भार्गव के सम्बन्ध में दो विभाग हुए। मलिम्लुच (अधिकमास) के सम्बन्ध से सौर सम्वत्सर के तरह विभाग हो जाते अतः सूर्य का सम्बन्ध सोलह से है।

       सूर्य कश्यप रूप में परिणीत होकर ही प्रजा का निर्माण करता है। सूर्य से निकलकर त्रैलोक्य में फैलने वाला सौरप्राण जो जीव की उत्पत्ति में सर्वथा प्रमुख है वह ही कश्यप कहलाता है। 

    सूर्यरश्मियाँ मरीचि नाम से प्रसिद्ध है। इन मरीचियों में परस्पर घर्षण होता है। ये मरीचियाँ अग्निमयीं हैं। अग्नेरापः अग्नि ही जल है, इस सिद्धान्त से इस आग्नेय घर्षण यानि मरीचियों के घर्षण से पानी उत्पन्न हो जाता है। यह पानी रूद्रवायु के सम्पर्क से घनभाव अर्थात् ठोस में बदलता है, जैसे दूध अत्यधिक ताप से तथा ऊपर हवा लगने के कारण ऊपरी भाग में जमकर मलाई बनता है।

      इसे वैदिक विज्ञान की तकनीकी भाषा में कहा जायेगा कि दूध का द्रवभाग और बाहर की वायु दोनों प्रतिमूर्छित होकर अर्थात् आपस में एक दूसरे से मिलकर अलग नहीं होकर एक ही साथ स्थित रही ऐसी स्थिति होकर वे घन बन जाते है। 

     इसी प्रकार सूर्य से उत्पन्न मरीचियों के घर्षण से उत्पन्न पानी और आन्तरिक्ष्य वायु दोनों प्रतिमूर्छित होकर घन बन जाते है। इसे अपांशर कहा जाता है। 

       पुनः  यदि दूध को और अधिक अग्नि दी जाय तो वह मावा बन जाता है। तथा पिण्डरूप धारण करता है। यही अवस्था यहाँ भी होती है। यही प्रक्रिया पृथ्वी निर्माण के सन्दर्भ में होती है कि आन्तरिक्ष्य एमूष वराह नामक वायु व सौर रश्मियों द्वारा इसका सम्पादन होता है। 

     इसकी प्रक्रिया वैदिक विज्ञान की भाषा में इस प्रकार है की एमूषवराह की कृपा से आपोमय महासमुद्र में परमाणुरूप से यहाँ वहाँ बिखरे हुए पार्थिव परमाणुओं का संहनन होता है। यानि परस्पर टक्कर होती है, अतएव वे परमाणु आगे जाकर भूपिण्ड रूप में परिणत हो जाते हैं।

      पृथ्वीपिण्ड यद्यपि मरीचि यानी पानी से बना है, परन्तु ठोस भाव अग्नि के कारण आया है। अग्नि की रूक्षता ने ही पानी को पिण्डरूप में परिवर्तीत किया है। जिससे पृथ्वी का निर्माण हुआ।

     दक्षवृत्त पर स्थित सौम्यप्राण रूप दक्ष की साठ कन्याओं के कश्यप के साथ सम्बन्ध रखने वाली 13 दाक्षायणियों (दक्ष की पुत्रियाँ) में से अदिति नाम की स्थिर दाक्षायणि है। सम्पूर्ण प्रजा का प्रभव-प्रतिष्ठा-परायण-भूत कूर्म प्रजापति को सम्वत्सर प्रजापति कहते है। 

     इस आदित्यात्मक सम्वत्सररूप कूर्म प्रजापति के तेरह अवयव है। इसके सम्बन्ध में उस दक्षवृत्त के तेरह विभाग हो जाते है। वे तेरहों ही देव, दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, मनुश्य, कीट, पशु, पक्षी, औषधि, वनस्पति, धातु, दिव, रस आदि आदि यच्चायावत् स्थावर जङ्गम् प्रजाओं की जननियाँ हैं। पिता सूर्य रूप कूर्म है।

    नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः 

निश्चय ही सारी प्रजा सूर्य के द्वारा उत्पन्न है। यदि पूर्वोक्त सभी दाक्षायणियों का संकलन किया जाय तो इनके साठ विभाग हो जाते है। ये ही दक्षप्रजापति की साठ कन्याएँ हैं,जो कि तत्तत देवताओं, ऋषिप्राणों से संयुक्त होकर तत्तत प्रजा का निमार्ण करती हैं, यह है अधिदैविक चरित्र।

      इसी से अध्यात्मसृष्टि होती है। एवं इसी से अधिभूत सृष्टि होती है। अतएव यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार जो व्यवस्था अधिदैवत में है, वही अध्यात्म एवं वह ही अधिभूत में भी। इसी भूमण्डल पर आदित्यादि मनुष्य देवता थे। 

    दक्ष प्रजापति थे उनकी साठ कन्याएँ थीं तथा उनको भूलोकस्थ देव ऋषियों से विवाह हुआ। पुराण का श्लोक है।

         दक्षस्तु षष्टि कन्यास्तु सप्तविंशतिमिन्दवे।

         ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।।

         द्वे चैवाङ्गिरसे प्रदाद् द्वे कशाष्याय धीमते।

         द्वे चैव भृगुपुत्राय चतस्रोऽरिष्टनेमिने इति।।

     इस प्रकार सम्वत्सर के तेरह विभाग सर्वथा नियत हैं। इनमें एक विभाग दिति है। एवं एक अदिति है। सम्वत्सर प्रजापति का दिति के साथ संयोग होने से यज्ञ विरोधी दैत्य उत्पन्न होते है, तथा अदिति के साथ संयोग से यज्ञमूलक आदित्य उत्पन्न होते हैं, जो कि बुद्धिमान् हैं, ज्योतिर्धन है, सत्यानुयायी है, आधे खगोल में देवताओं का राज्य हैं, इस खगोल मण्डल को यज्ञीय मण्डल कहा गया है। 

     एक ओर स्वाती नक्षत्र है दूसरी ओर अश्विनी नक्षत्र है। रेवती नक्षत्र दोनों के मध्य की बिन्दू है। आकाश का यह प्रदेश ही अदिति है। इस स्थान पर पुनर्वसु नक्षत्र है। पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण पर ही अदिति बिन्दू है। पूर्व में स्वाती नक्षत्र पर्यन्त इसकी व्याप्ति है। पश्चिम में अश्विनी, रेवती नक्षत्र की मध्य बिन्दू पर्यन्त इसकी स्थिति है। 

     इस देवमण्डल में स्वाति से रेवती पर्यन्त तेरह नक्षत्रों का भोग है। जिसे नक्षत्र अदिति कहा जाता है।

   *क्या है लेवल – 7?*

  मेडिकल साइंस के आधार पर पीनल ग्लैंड को अभी चिकित्सा विज्ञान पूरा समझ नहीं पाया है। कुछ वैज्ञानिक इसका अस्तित्व मानते हैं, कुछ नहीं। 

      वैदिक ज्ञान के अनुसार इसको सहस्रार चक्र कहते हैं। मैने इसको level-7 का नाम दिया है। जैसे अपनी मानसिक शक्ति को किसी दूसरे में कैसे ट्रांसफर कर सकते है या ध्यान शक्ति से भूकंप या मौसम का पता कैसे लगा सकते है इसके अलावा और भी कई विषय।

  इस लेवल पर दुनिया के बहुत ही कम व्यक्ति फोकस कर सकते हैं। हालांकि योग द्वारा जैसे Sudershan क्रिया द्वारा इसकी झलक मात्र कुछ गिने चुने व्यक्ति प्राप्त कर पाते हैं, या देवी देवताओं के गुरु भी इसकी झलक मात्र प्राप्त कर पाते हैं। लेकिन uncontrolled तरीके से।  क्योंकि जैसे कुछ लोग जब किसी यौगिक क्रिया से इस लेवल कि झलक मात्र प्राप्त करते हैं तो उस समय उनका विवेक समाप्त हो जाता है।

      वे कुछ और नहीं सोच पाते। जैसे अपने देखा होगा Sudershan क्रिया या खेल आने पर कोई भी व्यक्ति अपने होशो हवास खो देता है। कुछ लोग सिर्फ आनंद कि अवस्था में चले जाते हैं या कुछ लोग उस समय अजीबोगरीब हरकते करने लग जाते हैं। 

     कई बार यौन क्रिया के चरम बिन्दु पर भी यह लेवल एक क्षण के लिए महसूस होता है जिसका जिक्र ओशो भी करते थे।  लेकिन ये सारे तरीके सिर्फ झलक दिखा सकते है उसमे आपको स्थित नहीं कर सकते। अगर आप यौन क्रिया के चरम बिन्दु पर विवेक के साथ उस चरम बिन्दु पर टिक कर कोई बात सोचेंगे तो वह बात सत्य साबित होती है। पर उस चरम बिन्दु पर विवेक कायम रखना बहुत ही मुश्किल होता है।

     इस लेवल की झलक एक क्षण के लिए उस समय भी महसूस होती है अगर आप जिस गाड़ी में सफर कर रहे हो और वह गाड़ी किसी पुल से गिर पड़े। 

     इस समय विश्व के अधिकतम गुरु लोग किसी भी व्यक्ति को सिर्फ अनियंत्रित तरीके से लेवल सात की झलक मात्र दिखा पाते हैं। 

    अगर कोई ऐसी क्रिया बिना गुरु के कर ले तो वह किसी बीच की स्टेज में लटक कर पागल अवस्था में पड़ा रह सकता है।

       अगर कोई व्यक्ति लेवल सात में विवेक के साथ फोकस कर सके तो वह उस लेवल में रह कर अपनी सारी शारीरिक मानसिक स्थितियों पर नियंत्रण प्राप्त करके कोई भी ऐसे काम कर सकता है जिनको कोई आम आदमी नहीं कर पाता। 

   ज्योतिष और वैदिक ज्ञान में कई ऐसे तरीके हैं जिनका प्रयोग कर के कोई व्यक्ति लेवल सात में विवेक के साथ फाेक्स कर सकता है। 

    जब कोई व्यक्ति इस लेवल में फोकस विवेक के साथ कर लेे तो वह व्यक्ति अपनी ध्यान शक्ति से किसी भी व्यक्ति की कोई भी ऐसी इच्छा जो प्रकृति के नियमों के अन्तर्गत हो पूरी कर सकता है।

      जो व्यक्ति विवेक के साथ लेवल सात में फोकस कर सकता हो और जब मर्जी चाहे जिस मर्जी लेवल या ग्लैंड या चक्र पर फोकस करके जो मर्जी हार्मोन जब मर्जी अपनी इच्छा से रिलीज करवा दे या रोक लेे। उसी व्यक्ति को हम कह सकते हैं कि इसकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत है।

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