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*वैदिक दर्शन : क्या है कृष्ण की अर्थवत्ता?*

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           ~ डॉ. विकास मानव

     परमसत्ता अचिंत्यशक्ति व्यापक एवं सर्वग तत्व का नाम कृष्ण है। कृष् कर्षणे + नक् = कृष्ण-जो खींचता है, अपनी ओर झुकाता है, दूर वा बाहर की ओर जाने से रोकता है। जो कण-कण में है, अणु-अणु में है, परमाणु से लेकर अण्ड एवं ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। यह अदृश्य एवं प्रभावकारी शक्ति है। पदार्थ से इसका घनिष्ठ संबन्ध है। पदार्थ है तो उस में कृष्ण है। कृष्ण से गुरुत्व (भारीपन होता है। आकर्षण शक्ति का नाम कृष्ण है। जितने कण उतने कृष्ण। जितने परमाणु उतने कृष्ण। जितने पिण्ड उतने कृष्ण। जितने ब्रह्माण्ड उत्तने कृष्ण।

       यह शून्य है। यह पूरक है। यह सूक्ष्मातिसूक्ष्म आकाश है जो सब के भीतर घुसा हुआ है तथा सब को अपने भीतर घुसाये हुए है। एक कृष्ण अनेक रूपों में है। यह स्वरूपतः एक होकर अनेक है। सूर्य मण्डल में कृष्ण है। चन्द्र मण्डल में कृष्ण है। पृथ्वीमण्डल में कृष्ण है। अन्यान्य ग्रहों के केन्द्र में कृष्ण वर्तमान है। गोचर के भीतर जो अगोचर है, वह कृष्ण है।

      कृष्ण गुरु है। यह गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। जितनी ज्योतियाँ, उतने कृष्ण रहस्यमय जो कुछ भी है, वह कृष्ण है। अन्धकार कृष्ण है। कालापन कृष्ण है। ज्योति के भीतर जो कालापन है, वह असत् कृष्ण है। इस असत् (अन्धकार) रूप कृष्ण से सत् (ज्योति) रूप कृष्ण व्यापता हुआ दिखता है।

      विन्ध्यवीथी (नक्षत्रमण्डल) में सूर्य कृष्ण है। ‘विन्ध्यवीथी प्लवंगमः’। आदित्य हृदय, बाल्मीकि रामायण। यह कृष्ण ही स्त्री-पुरुष बन कर सर्वत्र वर्त रहा है। नक्षत्र मण्डल (राशिचक्र) को वृन्दावन कहते हैं। काले रंग का विस्तृत आकाश यमुना (यम् + उनन् + टाप) है। यमयति सर्वान् ग्रहान् तेन यमुना। यही यम (मृत्यु) है। आकाश के ज्योतिर्मय पिण्ड यमुना की रेती (रेतस् तत्व) हैं।

    【राशिचक्र की पुरुष राशियाँ (१, ३, ५, ७, ९, ११) कृष्ण हैं। भवन की स्त्री राशियाँ (२.४,६, ८, १०, १२) गोपी हैं।】

    इनका पारस्परिक सन्निकर्ष रासलीला है। इस ब्रह्माण्ड में अहर्निश रासलीला हो रही है। इस का नियामक केवल कृष्ण सूर्य है। इस कृष्ण को मेरा नमस्कार।

राशिचक्र गोवर्धन पर्वत है। गो= प्रकाश, वर्धन= बढ़ाने वाला, पर्वत = गांठों वाला। राशिचक्र में जितने नक्षत्र हैं, वे सब प्रकाश के खोत हैं। राशि में इनका प्रकाश बढ़ा हुआ होता है। दो राशियों के मिलने (जुड़ने) का स्थान पर्व (गांठ) है। १२ राशियाँ होने से १२ पर्व हैं। इन पर्वो को धारण करने से यह राशिचक्र ही गोवर्धन पर्वत कहलाता है।

      आकाश (कृष्ण) इस पर्वत (राशिचक्र) को धारण करता है। सप्त = ७ तथा दिन प्रकाश वा रश्मि। कृष्ण ने ७ दिनों तक गोवर्धन पर्वत धारण किया, का अर्थ है- सप्तरश्मियों को यह आकाश सतत धारण करता है।   

      आकाशीय ज्योतियाँ सप्तरश्मिवान् हैं। कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर धारण किया था, का अर्थ है-प्रकृति के प्रथम विकार महत्वत्व के आधार पर यह राशिचक्र रूप गोवर्धन पर्वत टिका हुआ है। महत्वत्व =वैश्वबुद्धि। कनिष्ठिका अंगुली बुध को अंगुली = बुद्धितत्व = महत् = प्रकृति। यह ब्रह्मज्ञान है। यह आर्षबुद्धि का उपहार है। जो इसे जानता है, वह ब्रह्मज्ञानी है। उसे मेरा नमस्कार।

नदी = प्रकाश = नदि = दिन (वर्ण विपर्यय) = प्रकाश, रश्मिप्रवाह, किरणसमूह। यमुना नदी=नियामक प्रकाश= आकाशीय रश्मियाँ। यह चिन्तन की वैदिक पद्धति है। परमपिता परमात्मा को मानुष कृष्ण रूप  में प्रस्तुत कर उस से ७ दिनों तक एक पहाड़ को उठवाना, उस को भगवत्ता को अपमानित करना है। जो सर्वसमर्थ है, वह ऐसी माया (छल प्रपञ्च) क्यों करेगा ?

      यमुना तट पर पौर्णमासों की रात्रि में गोपांगनाओं के साथ रास रचना (संश्लिष्ट होना), (वह भी एक अवयस्क कृष्ण बालक के साथ) कहाँ तक समीचीन है? ज्ञान के कथोपकथन की यह आर्पशैली अत्यंत गूढ है, सर्वसाधारण की समझ से परे है। लोग अपनी बालबुद्धि से इस का अर्थ लगा कर स्वयं भ्रमित होते हैं तथा सब को भ्रमित करते हैं। इस के माध्यम से जो तत्वज्ञान कहा गया है, उसे कौन जानता है?

     ज्ञान शुद्ध रूप में कहीं नहीं है। प्रकृति में कोई भी वस्तु शुद्ध रूप में कहाँ है? ज्ञान छिपा हुआ। उस पर अज्ञान का आवरण पड़ा हुआ है। ज्ञान एवं अज्ञान सहोदर हैं। प्रकाश एवं अन्धकार सहजात हैं। विद्या एवं अविद्या एक योनिज हैं ये परस्पर मिश्र हैं। इस मिश्रण में से विवेक बुद्धि द्वारा जिसे जो प्राप्त करना होता है, पाता है। भागवत को झूठा कहना, गप्प कहना नितान्त अनुचित है।

       कृष्ण लीला को असत् ठहराना उचित नहीं है। सब सच है। समझने का फेर है। जो लोग बुद्धि विलास के चक्र में फँसे हैं, उनको सच नहीं दिखे गा। इसे जिस ने जाना, वह सत्य को पाया जिसने नहीं जाना वह विनष्ट पाया।

     इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन् महती विनष्टिः। 

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥

     ~केन उपनिषद् (२ / ५)

गह= यहाँ, इस में, इस लोक में, इस जन्म में। 

चेत् = यदि। अवेदीत् = जान लिया। अथ=तो। सत्यम् अस्ति = यह मानना पड़ेगा कि यह  सत्य (लाभ) है। न चेत् =यदि नहीं। इह =इस जन्म में।अवेदीत् =जाना। महती= बहुत बड़ी। विनष्टः = क्षति (हानि) है। भूतेषु भूतेषु= जगत् के जड़ चेतन प्राणियों में। विचित्य= भली प्रकार चिन्तन (विचार) करके।

    धीराः= ज्ञानी जन। प्रेत्य = प्रेत होकर मर कर के ।अस्मात् लोकात् = इस लोक (जन्म)  से ।अमृतः= अमर (मुक्त) भवन्ति= हो जाते हैं।

     पुराणों में विश्व वास्तु (सृष्टिचक्र) का वर्णन यत्र-तत्र सर्वत्र हुआ है। बालकों की दृष्टि में यह कथा कहानी है। बुद्धिपिशाचों की दृष्टि में यह गप्प है। किन्तु तपोबुद्धि के परिप्रेक्ष में यह विज्ञान / गुह्यज्ञान / कृष्णज्योति है। इस को इस जन्म में यदि हम ने जान लिया तो ठीक है, वास्तविक लाभ है, आनन्द है। यदि इस लोक में इसे नहीं जान पाया तो निश्चय ही महाविनाश (बड़ा घाटा) है।

      अर्थात् जन्म लेना एवं शास्त्र चिन्तन हो व्यर्थ है। धीर पुरुष, जो कुछ घटित हो चुका है, जो कहा गया है, इस पर विचार कर के इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं-सब कृष्ण (महाबल) की लीला है। यह महाबल / गुरुत्वाकर्षण / निहितकाल सर्वत्र पुरुष-स्वी, सौम्य कृच्छ्र, जन्म-मृत्यु, लाभ-हानि बन कर नृत्य कर रहा है। इस को जानने में मोष (महदानन्द) है। इसे न जानने में विकटदुःख (अमर विषाद) है।

     अषियों ने इस सत्य को जाना, कथाओं के रूप में इसे छिपा कर व्यक्त किया- ज्ञान पर आवरण डालकर सत्पात्रों के लिये सुरक्षित रखा। 

    इस लिये इस कृष्ण (सूर्य) को ‘सप्तसप्तिर्मरीचियान्’ ७ x ७ =४९ राश्मियों (वा) वाला कहा = = (वाक्) गया है। लोकों की संख्या ३३ है। ये लोक ही देवता हैं। इन की रचना प्रजापति ब्रह्मा ने की है। 

एतस्माद् वा ओदनात् त्रयस्त्रिंशतं लोकान् निरमिमीत प्रजापतिः॥

    ~ अथर्व वेद (११ / ३ / ५२)

    वा =वै निश्चय ही। 

एतस्मात् ओदनात् =इन अन्नात्मक पदार्थों अवयवों गुणों से। 

त्रयः त्रिंशतम् लोकान्= ३३ विस्तृत लोकों (देवताओं को।

निए-अमिमीत= निर्मित किया, रचा।

 प्रजापतिमापति = ब्रह्मा ने

 तन् +ड=त- बृहद्। 

    तेषां प्रज्ञानाय यज्ञमसृजत।

    ~अथर्व वेद (११ / ३ / ५३)

तेषाम् प्रज्ञानाय= उन लोकों के ज्ञान के लिये।

 यज्ञम् असृजत = प्रजापति ने यज्ञों की रचना की।

    ये ३३ लोक क्या हैं? प्रजापति द्वारा निर्मित वास्तु लोकों प्रकाशन करने वाले ३३ व्यञ्जन। इन के ज्ञान के लिये प्रजापति ने यज्ञ (मुख, वाक्स्थान) की रचना किया। सूर्य मण्डल ही यज्ञ (वाक् वा रश्मि स्थान) है। अस्मै नमः| 

      ब्रह्माण्ड में ३३ देवता हैं। मुख में ३३ देवता हैं। इस लिये घर की वास्तु भूमि में भी ३३ देवताओं को स्थान देना चाहिये। यहीं वैदिक वास्तु है। हमारे पास जो भूखण्ड है, उस में से जितने भाग में हमें निर्माण कराना वा करना है, उसे चतुष्कोण रूप दे कर उस के ६ x ६ भाग करें।

     मध्य के चार भागों को ब्रह्म स्थान के लिये अनिर्मेय रख कर शेष में चतुर्दिक निर्माण कार्य का सम्पादन करें। यह सरल एवं श्रेष्ठ वास्तु है।

  प्रशस्त वैदिक वास्तु 

वास्तु में ब्रह्मस्थान का महत्व-ब्रह्मस्थान हकार है।

 ह = हन्ति पापम् अन्धकारम् वा विसर्ग भी हकार का रूप है।

 (:) =विसर्ग = असृष्टि, अनिर्माण, रिक्तता, शून्य, मुक्ति।

ब्रह्मस्थान सदैव खाली रखना चाहिये। यहाँ प्रकाश सदैव रहना चाहिये। इस लिये ऊपर से इसे ढकना नहीं चाहिये। इसे आँगन कहते है। यह वास्तु देवता का उदर होने से अत्यन्त मर्म स्थान है। यहाँ वास्तु की नाभि होती है। इस स्थान से घर के कोने-कोने का अप्रत्यक्ष संबन्ध होता है।

     यहाँ यज्ञ की वेदी स्थापित करना उचित है। इस से यज्ञ का धूआँ ऊपर उठ कर आकाश में चला जाता है तथा यज्ञ की गन्य घर के प्रत्येक भाग में फैलती है। यहाँ पर अयाजिक लोग तुलसी का पौधा भी रोप सकते हैं। तुलसी को नित्य दीप देने से यज्ञ की पूर्ति भी हो जाती है।

      समस्त मांगलिक कार्यों का सम्पादन गृहस्थ यहीं करता है। इस स्थान से धूप (रश्मि) एवं हवा का प्रवेश घर के प्रत्येक कक्ष में होता है। जैसे गर्भगत शिशु माता के गर्भ में सुरक्षित रहता है, वैसे ही इस स्थान में मंगलमूर्ति धर्म का वास रहता है।

      यहाँ विष्णुवास होता है। ब्रह्मस्थान की भूमि को ईंट, पत्थर से नहीं ढकना चाहिये। यहाँ की मिट्टी शुद्ध होनी चाहिये इसे गाय के गोबर से लीपते रहना चाहिए। इस से आरोग्य की सिद्धि होती है तथा परिवार में सौमनस्य रहता है।

     व्रत, पर्व एवं उत्सव के सम्पादन के लिये यह उपयुक्त, प्रशस्त एवं सर्वोत्तम स्थान है।

ब्रह्मस्थान (आँगन) में क्या-क्या किस स्थान पर रखना उचित है? इसके लिये ब्रह्मस्थान के चार भाग कर चारों कोणों में तदनुकूल स्थापन करना चाहिये। 

     यदि पानी का नल लगाना हो तो उसे ईशान कोण में, अग्गियार करना हो तो अग्नि कोण में, ध्वज लगाना हो तो वायव्य में, तुलसी लगाना हो अथवा सिल लोढ़ा रखना हो तो उसे नैर्ऋत्य कोण में रखना चाहिये।

     ब्रह्मस्थान के जल का निकास ईशान कोण से होना चाहिये। ब्रह्मस्थान घर का मध्यक्षेत्र / नाभि / केन्द्र है। इस का तल घर के कक्षों के तल की अपेक्षा नौचा होना चाहिये। आँगन सदैव स्वच्छ एवं अप्रदूषित होना (रखना) चाहिये। इससे घर का भाग्य जाना जाता है। जैसे हथेली का मध्यभाग अवतल (गहरा होता है, वैसे ही ब्रह्मस्थान का तल अव (नीचा) होना शुभ है।

     मध्यस्थान की मिट्टी में कंकड़ पत्थर नहीं होना चाहिये। यहाँ की भूमि में कोई शल्य (कठोर वस्तु) न हो। मध्यस्थान की मिट्टी फिसलने वालो भी नही होनी चाहिये। मध्यस्थान घर का हृदय है। मध्यस्थान इतना बड़ा एवं विस्तृत हो कि वहाँ से आकाश का अधिकांश भाग (क्षितिज को छोड़ कर) दिखाई देता हो। आकाश परम सत्ता, देवतायन है।

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