डॉ. विकास मानव
ब्रह्माणाग्निः संविदानो रक्षोहा बाधतामितः।
अमीवा यस्ते गर्भं दुर्गामा योनिमाशये॥ १॥
यस्ते गर्भममीवा दुर्णामा योनिमाशये। अग्निष्टं ब्रह्मणा सह निष्क्रिव्यादमनीनशत्॥ २॥
यस्ते हन्ति पतयन्तं निषत्स्नुं निषत्स्नुं सरीसृपम्।
जातं यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि॥ ३॥
यस्त ऊरू विहरत्यन्तरा विहरत्यन्तरा दम्पत्ती दम्पत्ती शये।
योनि यो अन्तरेल्हि तमितो नाशयामसि॥ ४॥
यस्त्वा भ्राता पतिर्भूत्वा जारो भूत्वा निपद्यते।
प्रजा यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि॥ ५॥
यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते।
प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि॥ ६॥
~अथर्व वेद (२० । ९६ ।११-१६ )
गर्भ की सेवा रक्षा बचाव अवलम्बन सहारा ही गर्भ संभाव है। गर्भ के दो शत्रु हैं-भीतरी एवं बाहरी इन दोनों शत्रुओं से बचाव की बात यहाँ इन मन्त्रों में की गई है।
१. अन्वय- यः दुर्गामा अमीवा ते योनिम् गर्भम् आशये, (तम्) इतः अपि बह्मणा संविदानः बाघताम् रक्षोह।यः=जो। दुर् नामा- बुरे नाम वाला हानिकारक । अमीवा =अति सूक्ष्म जीवाणु। योनिम् =योनि मार्ग को गर्भम् गर्भाशय को। आशये= आच्छादित/ प्रभावित किये हुए है।
(तम्) इतः =उस को यहाँ (योनि, गर्भाशय) से ।अग्निः = चित्रक ओषधि। ब्रह्मणा= ब्रह्म (उदुम्बुर) ओषधि के साथ। संविदानः = सावधानी रखते हुए। बाधताम् = हटाए, उसके दुष्प्रभाव को नष्ट करे। रक्षोहा = राक्षसघ्न।
नम् (झुकना नमति-ते )- नामा= झुकने वाला ।दुर् + नामा= दुर्गामा कठिनता से झुकने वाला, अधिकार में आने वाला, दुष्ट, हानिप्रद ।मीव् (मवति स्थौल्ये मोटा होना)- मीवा = मोटा, स्थूल। नञ् + मीवा =अमीवा = अस्थूल, सूक्ष्म, अणुरूप। ब्रह्मि (उदुम्बुर नाम का पेड़) + टा (तू. एक .व) अग्नि = चित्रक लता ।
चित्रकोऽनल नामा-निघण्टु तथा चित्रको बह्निसंज्ञकः- अमरकोश। सम् + विद् + शानच् =संविदानः = अच्छी तरह जानते हुए, प्रभाव को समझते हुए, सावधान होते हुए।
स्त्री की योनि में उसके गर्भाशय में अतिसूक्ष्म हानिकारक जीवाणु होते हैं। ये गर्भ को खा जाते, नष्ट कर देते हैं। इसलिये ये राक्षस हैं। उदुम्बर के साथ चित्रक का पुट इसे नष्ट कर देता है। इसलिये इस ओषधि को रक्षोहा कहा गया है। ठीक से समझ कर इसका प्रयोग करना है। यह ओषधि खिलाई न जाकर योनि द्वार पर भीतर रखी जाती है।
उक्त वेदमन्त्र में एक अन्य रहस्य है। ब्रह्मणा = प्रणव ओंकार। अग्निः = विष्णुः । रक्षोहा ब्रह्मणानिः बाधताम् = राक्षस रूप अमीता का हनन करने वाला व्यापक अग्नि उसके दुष्प्रभाव को बाधित करे। तात्पर्य यह है कि बिना किसी ओषधीय प्रयोग के इस मन्त्र को अच्छी तरह समझ कर इस के अर्थ को हृदयंगम कर पढ़ने मात्र से योनि संबंधी विकार नष्ट हो जाता है। यह मन्त्र की महत्ता है।
यौनरोग से पीड़ित गर्भपातादि से त्रस्त स्त्रियों के लिये यह रामवाण उपाय है।
२. अन्वय-यः ते गर्भम् योनिम् आ-शये दुर्णामा क्रव्यादम् अमीवा, तम् ब्रह्मणा सह अग्निः निः अनीनशत्।
क्रव्यादम् = कच्चामांस खाने वाले कृमि जीवाणु को।
क्रव्यम् = कच्चा मांस । [ क्लव (भये) + यत्, रस्य लः] अद् भक्षणे अत्ति> आदम् = खाने वाला। क्रव्य + आद = क्रव्यादम् (नपुंसक लिंग प्र. एक व) जो कच्चा मांस को खा जाता है, ऐसा जीवाणु। निः अनीनशत् = पूर्णतया नष्ट कर चुका है। [नश् नाशने + लङ्]।
ब्रह्मणा सह अग्निः = उदुम्बुर (गूलर) के साथ चित्रक (चीता) का रसीय योग [अग्निष्ट + तम्।]
भाव यह भी है कि ओंकार के साथ अग्नि शब्द क्रव्याद अमीवा को नष्ट कर देता है। ‘ओं अग्निः मन्त्र मात्र के उच्चारण से क्या नहीं ध्वस्त होता ?
३. अन्वय- यः ते निषत्तनुम् हन्ति यः ते पतयन्तम् जातम् जिघांसति यः सरीसृपम् । तम् इतः नाशयामसि ।
नि +सद् +स्नु+ क्विप् =निषत्नु = कन्दरा में पलते हुए सुस्थित भ्रूण को। स्नु (स्नौति प्रस्रवणे) + क्विप् = स्नु = कन्दरा, गर्भस्थान, एकान्त स्थान ।नि +सद् (पालने सम्हालना)- निषत्= पालते हुए, स्थित रहते हुए। पतयन्तम् =गर्भ से बाहर भ्रूण का प्रसव के समय योनि से नीचे गिरते हुए। योनि में फंसते हुए निकलने में अटकते हुए।
जातम् = उत्पन्न, योनि से बाहर निकलता हुआ नव्य शिशु, जन्म ले चुका शिशु।
हन्ति = जिघांसति= हत्या करता है। नष्ट करता है।
सरीसृपम् = गर्भाशय / योनि में सरकते रहने वाला जीवाणु।
तम् इतः नाशयामसि = उस सरीसृप / अमीबा / जीवाणु को हम यहाँ (गर्भाशय / योनि क्षेत्र) से नष्ट करते हैं।
४. अन्वय- यः ते करू अन्तर विहरति दम्पत्ती आशये, यः योनिम् अन्तर् आरेल्हि, तम् इतः नाश्यामसि।
आरेल्हि = आर (आ + ऋ + घञ्) + इल् + हि।
आर = क्षतशलाका, चाकू, काटने कुतरने वाला।
इल् = गतिशील। हि = निश्चयतः।
यः योनिम् अन्तर् आरेल्हि = जो योनि के भीतर घाव करता हुआ चलता रहता है।
यः ते ऊरू अन्तर् विहरति= जो तेरी (स्त्री की) दोनों जांघों के मध्य में चलता फिरता रहता है।
दम्पत्ती आशये =स्त्री-पुरुष के सहवास के समय में।
तम् इतः नाशयामसि = उसे इस स्थान से हम निकाल बाहर करते हैं, नष्ट करते हैं।
यौन रोग के कारण गर्भ नष्ट होता देखा गया है। इस रोग के जीवाणु योनि के बाहर दोनों जाँघों के मध्य अपना दुष्प्रभाव दिखाते हैं, योनि के अन्दर प्रवेश कर गर्भ का नाश करते हैं। ये पुरुष से स्त्री में सहवास काल में संक्रमण करते हैं। इस मंत्र में इसी दुस्साध्य रोग के नाश का वर्णन है।
गर्भवती स्त्री पर व्यभिचारी पुरुष धोखे से बलात्कार करता है। उससे गर्भ की क्षति होती है। इस हानि की संभावना से बचने के लिये बलात्कारी को मारना आवश्यक है। यह नाशन कर्म स्त्री जाति के सम्मान में तथा आने वाले शिशु की रक्षा के लिये करना पड़ता है। आगे के दो मंत्र इसी से संबंधित हैं।
५. अन्वय-य: जारः भ्राता भूत्वा पतिः भूत्वा त्वा निपद्यते, यः ते प्रजाम् जिघांसति, तम् इतः नाशयामसि।
नि-पद्यते = बलात्कार करता है। जारः = व्यभिचारी पुरुष प्रजाम् = गर्भस्थ शिशु को। जिघांसति = चोट पहुँचाता है।
जो जार पुरुष स्त्री का भाई बन कर अथवा स्त्री का पति (पोषणकर्ता) बनकर हे नारी । जो तुझसे सहवास/ बलात्कार करता है तथा जो तेरे गर्भस्थ शिशु की हानि करता है, उसे मैं इस लोक से समाप्त करता हूँ।
अग्नि की साक्षी में श्रोत्रिय ब्राह्मण इस मन्त्र को पढ़े तो स्त्रीद्विष् का नाश होना निश्चित है।
६. अन्वय- यः त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते, यः ते प्रजाम् जिघांसति, तम् इतः नाशयामसि।
हे स्त्री । जो तुझे अंधेरे में विस्तर पर लेटे होने से संज्ञा शून्य कर, तेरे साथ सहवास करता है तथा जो ऐसा करके तेरी गर्भस्थ सन्तान को क्षति पहुँचाता है, उस व्यभिचारी पुरुष को हम इस लोक से मिटा रहे हैं।
अथर्ववेद में ही काण्ड ८ सूक्त ६ ‘गर्भदोषनिवारणम्’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके कुछ मन्त्रों को यहाँ उद्धृत करता हूँ।
यः कृणोति मृतवत्सामवतकामियां स्त्रियम्।
तमोषधे त्वं नाशयास्याः कमलमञ्जिवम्॥”
(अथर्व. ८ । ६।९)
अन्वय-यः इमाम् स्त्रियम् मृतवत्साम् अवतोकाम् कृणोति अस्याः तम् कमलमञ्जिवम् ओषधे त्वम् नाशय।
मृतवत्साम् = मरे हुए बच्चे को जन्म देने वाली।
अवतोकाम् = अवपतितं तोकम् अस्याः। [तोक = अपत्य, सन्तान लिएका गर्भ गिर जाया करता है। वह स्त्री जिस का किसी भी कारण से गर्भपात हो जाता हो। गर्भस्खलन रोग वाली।
कृणोतु = करे, करता है।
कमलः = कमल पुष्प, तांबा, जल, हिरणपशु, हिरण्य (सोना), आकाश। अमरकोशे
मज्जिवम् = मञ्जु + इन्+ वन्। सौन्दर्य, सार, रस, मल, पुष्प, फल, बीज, मूल, गुण।
कमलमञ्ञिवम् = कमलपुष्प, कमलबीज, कमल मूल, कमलदण्ड, ताम्रमल (भस्म), स्वर्णमल (भस्म), हरिणनाभिमंथि (कस्तूरी) मृतवत्सता एवं अवतोकता रोग के निवारणार्थ इस कमलमञ्जिवम् ओषधि का प्रयोग किया जाता है।
जो इस स्त्री को मृतवत्सता का रोग करता है अवतोकता का रोग करता है, इस स्त्री सम्बन्धी उस रोग को, हे कलमञ्जियम् ओषधे। तू नष्ट कर दो।
यस्ते गर्भ प्रतिशत वा मारयति ते।
पिंगस्तमुग्रधन्वा कृणोतु हृदयाविधम्॥
(अथर्व ८ । ६ । १८)
अन्वय- यः ते गर्भम् प्रतिमृशात् वा ते जातम् मारयति, तम् उग्रधन्वा (कीटम्) पिंग: हृदयाविधम् कृणोतु।
प्रति-मृश् = आक्रमण करना, दूषित करना, भ्रष्ट करना, पीड़ित करना। प्रतिमुशात् नष्ट करे, पीड़ित करे, दूषित करे।
उपधन्वा = हिंसक रोगाणु। पिंग =पीली सरसों।
हृदय-आ-विधम् कृणोतु = हृदय (ग) भीतर) नष्ट कर दे।
जो रोगाणु तेरे गर्भस्थ शिशु को नष्ट करे अथवा तेरे पैदा हुए बच्चे को मारे, मार डालता है, उस उग्रधन्वा (अत्यन्तविषैले) जीवाणु को पीली सरसों भीतर ही नष्ट कर दे।
इस मन्त्र में पीली सरसों के प्रयोग द्वारा स्त्री के सभी गर्भाशय के दोष नष्ट करने की बात कही गई है।
परिसृष्टं धारयतु यद्धितं माव पादि तत्।
गर्भ त उग्रौ रक्षतां भेषजौ नीविभार्यौ॥
( अथर्व ८ । ६ । २०)
अन्वय- परिसृष्टम् गर्भं धारयतु। यद् हितम् तत् मा अवपादि उपौ भेषजौ नौविभार्थी ते (गर्भ)रक्षताम्।
मा अपवादि = नीचे न गिरे।
उम्रौ भेषजी = दोनों प्रकार की काली एवं पीली सरसों के बीज।
निविः भार्यौ= नीवी (कटि के नीचे भाग में) धारण करने योग्य हैं। भृञ् धारणपोषणयो:- भार्यौ।
हितम् = गर्भ में अवस्थित, निहित।
परिसृष्टम् = सम्पूर्ण अंगों से युक्त, विकसित शिशु।
गर्भ के भीतर सुविकसित शिशु को तू धारण करे। जो शिशु तुम्हारे गर्भ के भीतर पल रहा है, उसे नीचे गिरने न दे-गर्भपात न होने दे। इसके लिये तू अपनी कमर के नीचे उपस्थ स्थान पर काली एवं पीली सरसों के बीजों की पोटली बाँधकर धारण करे। इससे तेरे गर्भस्थ जीव की रक्षा होती है।
य आम मांसमदन्ति पौरुषेयं च ये क्रविः।
गर्भान् खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि॥
( अथर्व ८ । ६ । २४)
अन्वय-ये आमम् मांसम् अदन्ति च ये पौरुषेयम् क्रविः (अदन्ति), केशवाः गर्भान् खादन्ति, तान् इतः नाशयामसि।
आमम् = कच्चा।
पौरुषेयम् = पुरुष / परुष सम्बन्धी वा कठोर अवयवों के।
क्रविः = ऊतक, जीवित कोशिका।
केशवाः = केश के समान कृष्ण / श्वेत लम्बे पतले सूक्ष्म विषाणु / जीवाणु/ कीटाणु।
आदन्ति = खादन्ति = भक्षण करते हैं।
तान् इतः = उन कीटाणुओं को इस (गर्भ) स्थान से।
नाशयामसि = हम नष्ट करते हैं।
जो जीवाणु कच्चे मांस को खाते हैं, तथा जो कठोर ऊतकों का भक्षण करते हैं, जो विषाणु केश के समान लम्बे पतले सूक्ष्म काले वा श्वेत रंग के होकर स्त्री के भूण को चट कर जाते हैं, उन सबको हम इस स्थान से उच्छिन्न करते हैं।
इस मन्त्र में भी सरसों का प्रयोग अपेक्षित है।
पिंग रक्ष जायमानं मा पुमांसं स्त्रियं क्रन्।
आण्डादो गर्भान्मा दभन् बाधस्वेतः किमीदिनः।।
(अथर्व. ८ । ६ । २५)
अन्वय-पिंग ! जायमानम् रक्ष पुमांसम् स्वियम् मा छन्। आण्डादः गर्भान् मा दभन्। किमीदिनः इतः बाधस्व।
जायमानम् = पैदा होतु हुए शिशु को।
आण्डादः आण्ड + आदः । आण्ड भक्षक कीटाणु।अण्ड = डिम्ब ।आण्ड = शुक्र युक्त डिम्ब, कललादि अवस्था को प्राप्त गर्भ।
मादभन् = क्षति न पहुँचाये। [दभ् दर्भाति दभ्नोति हानि पहुँचाना नष्ट करना चोट करना।
किमीदिनः =मांस भक्षी / पिशुन कीटों को।
वाचस्व = रोको, नष्ट करो।
हे पिंग (पीली सरसों)। गर्भ में स्थित पैदा होने वाले शिशु की रक्षा करो। पुरुष शिशु को स्त्री शिशु में न परिवर्तित होने दो- पुरुष में स्त्री गुणों का प्रवेश न हो नपुंसक सन्तान का जन्म न होवे। कलल पक्षी कीटाणु गर्भ को नष्ट न करें। इस स्थान (गर्भाशय) से गर्भनाशक जीवाणुओं को मार डालो।
इस मन्त्र में पीली सरसों को महत्व देकर उससे प्रार्थना की गई है।
सन्तान का न होना, गर्भ का न ठहरना, ठहरे हुए गर्भ का च्युत हो जाना, मृत सन्तान का जन्म होना, जन्म होते ही सन्तान का मर जाना आदि किसी न किसी पाप का परिणाम है। इसके परिमार्जन से सन्तान की प्राप्ति होती है।
अप्रजास्त्वं मार्तवत्समाद् रोदमघमावयम्।.
वृक्षादिव स्रजं कृत्वत्रिये प्रति मुञ्च तत्।।
(अथर्व ८ । ६ । २६)
अप्रजास्त्वम् मार्तवत्सम् आत् रोदम् अपम् आवयम्। वृक्षात् इव सजम् कृत्वा अप्रिये प्रतिमुञ्च तत्।
अप्रजास्त्वम् = सन्तान का न होना।
मार्तवत्सम् = मरे हुए बच्चे का पैदा होना।
आत् रोदम् । = तदनन्तर रुदन करना।
अघम् = पाप के फलस्वरूप होते हैं।
आ-वयम् = सब ओर से वा सदैव बुनते रहना।
[वे वयति-ते बुनना, पट बुनना ]।
वृक्षात् = वृक्ष से प्राप्त फूलों से)
स्रजं कृत्वा इव =माला बन करके।
तत् = उसे उस माला को।
अप्रिये = अप्रिय पक्ष में, अमाहा भाग में
प्रति मुञ्च= डाल दे, छोड़ देवे।
प्रजा / पुत्र का न होना, मृत पुत्र का पैदा होना, तदनन्तर (पुत्र के अभाव में) रुदन करना- ये सब पाप के परिणाम हैं। इतना होने पर भी (पाप का) उम्म बुनते रहना अर्थात् पाप कर्मों में प्रवृत्त रहना, (पाप रूपी) वृक्ष के फूलों) से पाप कर्मों की पा निर्मित करके पहनने के समान है। उसे (पाप माला को) गर्हित पक्ष में डाल पाप करना छोड़ दो पापमयी प्रवृत्ति एवं क्रियाओं को त्याग दो।
अथर्ववेद के अनेकों मंत्र सरसों के प्रयोग से निबद्ध हैं। गर्भाशय सम्बन्धी विकार, राक्षस बाधा, प्रेत पौड़ा, कृमिनाश में लाल एवं पीली सरसों का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है। क्षव, क्षुताभिजनन, राजिका, कृष्णिका, आसुरी, पिंग, वज आदि इसके नाम हैं।
सरसों को पीसकर पीठी बनाकर मासिक धर्म के स्नान के पश्चात् योनि में रखने से गर्भधारण होता है, गर्भ के विकार नष्ट होते हैं तथा गर्भ की रक्षा होती है।
ऐसा नहीं है कि जिस स्त्री के गर्भ गिरे, नष्ट हों, जात संतान मर जाय तो वह पापिनी है और उसका पति पापी है। यह उस जीव को जो गर्भ में आता है, उसके भी कर्म का फल है। वसुदेव-देवको को सात सन्तानें मर गई। आठवीं संतान कृष्ण जीवित रहे। क्या ये दोनों पापी थे ? पाप-पुण्य तो सब के साथ लगा हुआ है। इसके भोग से कोई बच नहीं सकता। मनुष्य को सब प्रकार से धर्म करना चाहिये। धर्म क्या है ?
राम (दसरथ पुत्र नहीं, जो रोम- रोम मे वसा है) ही साक्षात् धर्म है। कथन है-‘रामो विमहवान् धर्मः।
वाल्मीकि रामायण ३ । ३७। १३ राम ने दो सन्तानों को जन्म दिया-लव, कुश। इसलिये दो बच्चा पैदा करो। गर्भपात से बचो। गर्भ बचाओ। परिस्थितिवश गर्भपात हुआ वा करना पड़ा तो बचाव के लिये राम की शरण जाओ।

