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अन्हातर्राष्ट्रीय महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, वर्धा में वीर सावरकर का प्रतिरोध !

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 -सुसंस्कृति परिहार 

ज्ञानार्जन के महत्वपूर्ण केंद्र होते हैं विश्वविद्यालय।अभी तक तो सिर्फ जेएनयू से संघवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ सुनाई देती थी जिसे संघ और भाजपा एक बड़े शत्रु के रुप में देखकर वहां अपने तरीके से केन्द्रीय सरकार कसावट करती रहती है। लेकिन वहां वाममार्गी छात्र संगठन की चारों महत्वपूर्ण पदों की जीत ने ये जाहिर कर दिया कि विश्व विद्यालयीन बहुसंख्यक छात्र, संघ की धमाचौकड़ी से ख़फ़ा हैं और वे विश्वविद्यालय को एक बार फिर ऊंचाई पर पहुंचाने प्रतिबद्ध हुए हैं।

हालांकि लगता है बहुसंख्यक विश्वविद्यालय के छात्रों में यह समझ शायद विकसित नहीं हो पाई है या उनकी आवाज़ बुरी तरह कुचली जा रही है।जो भी हो केन्द्रीय सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियों का भंडाफोड़ करने में जेएनयू अग्रणी भूमिका में है।

इसी श्रंखला में महाराष्ट्र के वर्धा स्थित अन्तर्राष्ट्रीय महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय में शामिल हो चुका है जो स्वागतेय है। जहां भारत माता तो विराजमान हो चुकी  हैं । वीर सावरकर ने भी वहां ज़मीन हथिया ली है।इतना ही नहीं यहां की कुलपति जो संघ के रंग में पूरी तरह रंगी हुई है।इस विश्वविद्यालय को वीर सावरकर विश्वविद्यालय बनाने पर तुली हुई हैं।ये आचार विचार कई बार विश्वविद्यालय के छात्रों ने महसूस किए किंतु विरोध की क्षमता नहीं जुटा पाए। यहां के वाम विचारधारा से प्रभावित प्राध्यापक भी संघी धारा लहालोट में हैं। इसलिए जब छात्रों ने मिलकर जेएनयू की जीत का जश्न मनाना चाहा तो उन्हें  अनुमति  नहीं दी गई।तब छात्रों ने केन्द्रीय सरकार के ख़िलाफ़ डफली बजाकर नारे लगाए उससे पहले उन्होंने  हो सारी सावरकर कर क्षमा भी मांगी पर संघ भक्ति में  लीन कुलपति महोदया ने छात्रों पर मामला दर्ज करा दिया। इससे साफ़  ज़ाहिर कि विश्व विद्यालय महात्मा गांधी की विरासत सावरकर को नहीं देना चाहते। ये कोई नया प्रसंग नहीं था इससे पूर्व भी कई छात्रों पर मामले दर्ज़ हुए हैं। प्रतिरोध भी हुआ लेकिन कुचल दिया गया।

 ज्ञातव्य हो, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में सन् 2019 में संघ की विचारधारा के पोषक प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल की नियुक्ति के उपरांत हिंदी विश्वविद्यालय पर आरएसएस की विशेष नजर पड़ गयी। जिसका परिणाम यह हुआ कि यहां शिक्षक की नियुक्ति हो या किसी अधिकारी, कर्मचारी का पद हो बिना आरएसएस की सिफारिश के कोई भी नियुक्ति असंभव सा हो गया। 2019 से लेकर अब तक जितनी भी नियुक्तियां यहां की गयी सब के पीछे आरएसएस के बैकग्राउंड का होना आवश्यक था। रजनीश कुमार शुक्ल के शासनकाल में 50 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की गयी है।

आरोप है कि सभी की नियुक्ति में पैसों का भारी खेल और भाई-भतीजावाद किया गया है। यहां तक कि शिक्षा विद्यापीठ के शिक्षक हरीश चन्द्र पाण्डेय की नियुक्ति रजनीश शुक्ला के कार्यकाल में हुआ और वो अभी रजनीश शुक्ल के दमाद बन गया।बिना किसी नियमावली के स्थलों के नाम तेजी से बदले जा रहे हैं । गोरख पांडे छात्रावास से जनकवि गोरख पांडे की प्रतिमा रातों रात गायब करवा दी गयी और उस छात्रावास का नाम छत्रपति संभाजी महराज कर दिया गया, नजीर हाट नामक स्थान को सावरकर के नाम पर कर दिया गया, एकलव्य पथ का नाम बदलने की फिराक में एकलव्य पथ के बोर्ड को उखाड़ फेका गया, विनोबा हिल्स को विवेकानंद हिल्स के नाम से परिवर्तित कर दिया गया, श्रमिक पथ का नाम अब्दुल कलाम पथ कर दिया गया, प्रबंधन विद्यापीठ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दूरवर्ती शिक्षा का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय कर दिया गया है।

इन तमाम गतिविधियों से छात्र ख़फ़ा हैं आए दिन छात्रों के बीच टकराव बना हुआ है। पंडित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाद अन्तर्राष्ट्रीय महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय की अस्मिता को जो ठेस पहुंचाई जा रही है वह आगे चलकर बड़ा स्वरुप ले सकती है। क्योंकि गांधी और नेहरू के नाम और काम को बर्बाद कर ये देश ग़द्दारों को स्थापित करने में लगे हैं। सोचने की बात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह कथित महात्मा वीर सावरकर कैसे प्रतिस्थापित हो सकते हैं।ये गंभीर चुनौती है जिसका सामना करने गांधी के तमाम अनुयायियों को भी आगे  आना चाहिए।

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