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किस बात के लिए आंसू थे वैंकैया जी के….!

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सुसंस्कृति परिहार
रोने धोने में माहिर भाजपा नेताओं में मोदी जी सबसे अव्वल हैं। उन्होंने सदन की सीढ़ियों से रुदन शुरू किया था वह अब तक जारी है पता नहीं कब कौन सी बात उन्हें रुला दे । उनके परम मित्र योगी भी सदन में रो चुकने की शानदार यादगार प्रस्तुति दे चुके हैं ये किस बात का प्रतीक है इसकी कोई  अवधारणा अब सामने नहीं आई है।कहा जाता है कि रोना ख़ुशी और ग़म दोनों को इंगित करता है । ख़ासतौर से शराब का सेवन करने वाले कोई ना कोई बहाना ढूंढ लेते हैं । आजकल सत्ता का नशा भी ऐसा ही हो चला है जिसमें ये जानना मुश्किल है कि फलां फलां क्यों रोया ?


बहरहाल लोग नेताओं के आंसुओं को  घड़ियाली आंसू की संज्ञा देते हैं जिसका आशय ये होता है कि जबरन ये प्रर्दशन करना कि वे दुखी या ख़ुश हैं।जैसा कलाकार करते हैं। दोनों में कितना अंतर्विरोध है पर आंसू तो आंसू हैं बह निकलते हैं। पिछले दिनों राज्यसभा के सभापति सदन में कांग्रेस और मार्शलों के बीच दंगल देखकर रो पड़े। वे सदन के उस वक्त सर्वेसर्वा थे सदन को चलाने का दायित्व उनका था उनसे सदन नहीं चल रहा था तो  विपक्ष को सुन लेते तो क्या बिगड़ जाता ,बहुमत जिसका था उस पर मुहर  तो लगनी ही थी। भाजपा को कोई नुक्सान नहीं होता।बात ना सुनी जाए ये तो सरासर ग़लत था फिर जो हुआ वह उत्तेजित कर किया गया मामला है। सम्माननीय जनप्रतिनिधियों जिनमें महिलाएं भी थीं उनके साथ जो सलूक हुआ वह भी आपके आदेश से यह घोर निंदनीय है।संसद के हंगामेदार मानसून सत्र के बीच राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडू  भावुक हो गए। उन्होंने सदन में विपक्ष के बर्ताव की निंदा की। उन्होंने कहा कि संसद में जो हुआ, उससे मैं बहुत दुखी हूं। कल जब कुछ सदस्य टेबल पर आए, तो सदन की गरिमा को चोट पहुंची और मैं पूरी रात नहीं सो पाया। राज्यसभा चेयरमैन ने विपक्ष की लगातार मांग पर कहा कि आप सरकार को इस बात के लिए फोर्स नहीं कर सकते कि वो क्या करे, क्या नहीं? आप भाजपा के दो साल अध्यक्ष  रहे हैं उसके तौर तरीके अच्छे से जानते हैं यह मामला सुलझ सकता था। लगता है यह पूर्व नियोजित कार्यक्रम आपने दबाव में किया है इसलिए आप भावुक हो गए।इस ग़म में आपके आंसू निकल पड़े हों।अगर ऐसी बात थी तो आप त्यागपत्र दे सकते थे कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि आगत उपराष्ट्रपति चुनाव या राष्ट्र पति चुनाव से भाजपा ने आपको हटाने की तैयारी कर ली है आगे अब अडवाणी ,जोशी वगैरह की लाइन में आपकी बारी है ही।तब सत्ता लोभ के वशीभूत उपराष्ट्रपति का रोना जो दुनिया ने देखा उचित नहीं था। इससे राज्यसभा की गरिमा भी आहत हुई है।पहली बार उपराष्ट्रपति रोया है जो निष्पक्ष और निर्भीक निर्णय देने के लिए राज्यसभा का सभापति होता है।अभी भी वक्त है बेझिझक अपने ग़म को अभिव्यक्त करने का।
दूसरी बात ये कि सदन में आपको लगता है कि विपक्ष के तेवर सदन की गरिमा के प्रतिकूल थे तो उन पर कार्रवाई का हक आपके पास सुरक्षित था। जिस तरह माननीय न्यायालयों का अब व्यवस्थापिका से मोह भंग हो रहा है क्या कार्यपालिका के उच्चस्थ पदाधिकारी ऐसा नहीं कर सकते भले वे भाजपाई रहे हों, भाजपा ने उन्हें आसन दिलाया हो । प्रेमचंद के पंच परमेश्वर की तरह साफ़ दिल रखकर सोचिए। लोकतंत्र बचाने में इस वक्त आपका अवदान भी इतिहास में भी दर्ज़ होगा ।ये वक्त की पुकार है और आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ पर एक शानदार उपहार भी होगा।
विनय सहित यह अपील अब आप से है कैसा फील करते है  ये आप पर निर्भर है। उम्मीद करती हूं दक्षिण भारत से लोकतंत्र की हिफाजत के लिए एक नई पहल शुरू वैंकैया जी से होगी। तथास्तु।

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