-तेजपाल सिंह ‘तेज’
क्या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत पूर्व भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर को फिर से जेल भेजेंगे? या क्या पूरी व्यवस्था ने अमृत काल को नष्ट करने की शपथ ले ली है? जब विश्वगुरु की सरकार ने सत्ता के लिए अमृत काल शब्द का इस्तेमाल किया, तब लोग पूछ रहे थे कि इस अमृत काल का क्या अर्थ है? इसकी परिभाषा क्या है? तो आज आप इसे बहुत ही सरल शब्दों में देख सकते हैं। एक तरफ कुलदीप सिंह सेंगर, राम रहीम, आसाराम जैसे लोग हैं जिन्हें जघन्य अपराधों और हत्याओं के आरोप में भी उनकी इच्छा अनुसार जमानत मिल जाती है। फिर भी वे अमृत काल का आनंद ले रहे हैं।
दूसरी ओर, सोनम वांगचुक जैसे कार्यकर्ता जेल में बंद हैं। अमिताभ ठाकुर जैसे ईमानदार अधिकारियों को एक छोटे से मामले में समाज से अलग कर दिया जाता है, वो भी ट्रेन के रूप में। और पुलिस हिरासत में उन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं दी जाती।
इसके लिए पुलिस को सीटी बजाने और शोर मचाने का आदेश दिया जाता है ताकि अमिताभ ठाकुर की आवाज कोई न सुन सके। इसके साथ ही संजीव भट्ट जैसे ईमानदार अधिकारियों को जेल में रखा जाता है। वे उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक भागते रहते हैं। लेकिन अमृत काल का सारा आनंद केवल बलात्कारियों को मिलता है, ईमानदार कार्यकर्ताओं को नहीं।
इतना ही नहीं, गुजरात उच्च न्यायालय ने एक और ऐसा काम किया है जो अमृत काल का उदाहरण बनता जा रहा है। अंकिता भंडारी मामले में, अंकिता की व्हाट्सएप चैट एक बार फिर सोशल मीडिया पर सामने आई है। और सेंगर मामले में, जब पीड़िता दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करने बैठी, तो पुलिस ने उसे कचरे की तरह उठाया और गाड़ी में फेंक दिया। सवाल यह है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय को इन सब बातों की जानकारी है? क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इन सब मामलों पर नजर रख रहे हैं? या फिर उन्हें अमृत काल की भली-भांति जानकारी है? दूसरी ओर, भारत के आर्थिक दिग्गज लंदन से 15 करोड़ भारतीयों को लुभा रहे हैं।
यह लेख केवल घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि भारतीय गणराज्य के संवैधानिक मूल्यों—न्याय, समानता, स्वतंत्रता और गरिमा—पर एक गहन प्रश्नचिह्न है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है, और अनुच्छेद 15 राज्य को भेदभाव से रोकता है। किंतु जिन घटनाओं और मामलों का उल्लेख इस पाठ में है, वे दर्शाते हैं कि व्यवहार में ये संवैधानिक आश्वासन कई बार प्रभावशाली वर्गों के सामने निष्प्रभावी हो जाते हैं।
यह दस्तावेज़ सत्ता–संरक्षित अपराध, न्यायिक विलंब, चयनात्मक कठोरता और पीड़ित–विरोधी व्यवस्था की उस वास्तविकता को सामने लाता है, जहाँ कानून की भाषा तो समान होती है, पर उसका प्रयोग समान नहीं दिखता। यहाँ पीड़ित केवल व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि स्वयं संविधान है—जिसकी आत्मा को बार–बार आहत किया गया है।
1. उन्नाव कांड: कुलदीप सिंह सेंगर मामले की पीड़िता:
इस प्रकरण में पीड़िता ने न केवल बलात्कार का आरोप झेला, बल्कि न्याय की लड़ाई के दौरान अपने पूरे परिवार को लगभग खो दिया। पिता की हिरासत में मौत, चाचा की हत्या, सड़क दुर्घटना में परिवार के सदस्यों की मृत्यु और वकील की हत्या—ये सभी घटनाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि सत्ता–समर्थित अपराधी किस तरह भय और हिंसा का तंत्र खड़ा कर सकते हैं। पीड़िता की सबसे बड़ी पीड़ा यह रही कि जिनसे सुरक्षा की अपेक्षा थी, वही संस्थाएँ या तो असहाय दिखीं या मौन रहीं। जमानत जैसे फैसलों ने पीड़ित परिवार की असुरक्षा को और गहरा किया।
2. अंकिता भंडारी हत्याकांड: एक कामकाजी युवती की असुरक्षा:
अंकिता भंडारी का मामला केवल एक हत्या नहीं, बल्कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। व्हाट्सएप चैट में सामने आई उसकी आशंका यह दर्शाती है कि वह स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रही थी और वीआईपी दबाव की बात कर रही थी। पीड़िता की कथावस्तु यह बताती है कि किस तरह प्रभावशाली लोगों के नाम जांच से बाहर रखे जाने की आशंका बनी रही। यहाँ पीड़ा केवल परिवार की नहीं, बल्कि उन तमाम युवतियों की है जो रोजगार के लिए ऐसे स्थानों पर काम करती हैं, जहाँ सत्ता और पैसे का दबाव उनकी सुरक्षा पर भारी पड़ता है।
3. सामाजिक कार्यकर्ता और असहमत आवाज़ें:
लेख में सोनम वांगचुक, अमिताभ ठाकुर, संजीव भट्ट जैसे नाम यह संकेत देते हैं कि जो लोग सत्ता से सवाल करते हैं, उन्हें कठोर कानूनी प्रक्रिया, हिरासत और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है। इनकी कथावस्तु किसी एक अपराध की नहीं, बल्कि एक पैटर्न की ओर इशारा करती है—जहाँ सवाल पूछना अपराध बन जाता है और न्याय की प्रक्रिया स्वयं दंड का रूप ले लेती है।
4. सड़क दुर्घटना पीड़ित: रक्षित चौरसिया मामला:
वडोदरा की घटना में एक महिला की मृत्यु और कई लोगों के घायल होने के बावजूद आरोपी को जमानत मिलना पीड़ितों के लिए गहरे आघात का कारण बना। यहाँ कथावस्तु उन आम नागरिकों की है, जिनकी जान तेज रफ्तार, नशे और लापरवाही से चली जाती है, जबकि आरोपी की उम्र, पारिवारिक पृष्ठभूमि और ‘कोई आपराधिक इतिहास न होना’ जैसे तर्क राहत का आधार बन जाते हैं। मृतका और घायलों की पीड़ा निर्णयों में गौण होती दिखती है।
5. आसाराम, राम रहीम, रामपाल जैसे बाबाओं का संदर्भ:
इन बाबाओं के मामले भारतीय समाज में धर्म, आस्था और सत्ता के खतरनाक गठजोड़ को उजागर करते हैं। गंभीर अपराधों—बलात्कार, शोषण और हिंसा—के आरोपों के बावजूद इन्हें लंबे समय तक संरक्षण, सुविधाएँ और विलंबित न्याय मिला। इन मामलों में पीड़ितों की कथावस्तु भय, सामाजिक दबाव और बदनामी से भरी रही। सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों की ढिलाई ने यह संदेश दिया कि आस्था का चोला ओढ़ लेने से कानून का शिकंजा ढीला पड़ सकता है।
6. न्यायालयों की भूमिका पर आलोचनात्मक दृष्टि:
न्यायालयों से अपेक्षा होती है कि वे अंतिम सहारा बनें, परंतु जमानत, सुनवाई में देरी और पीड़ित सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उठते सवाल भरोसे को कमजोर करते हैं। निर्णय भले ही तकनीकी आधार पर हों, लेकिन उनका मानवीय प्रभाव पीड़ितों के जीवन को सीधे प्रभावित करता है। जब न्याय की प्रक्रिया पीड़ित को ही असुरक्षित छोड़ दे, तो व्यवस्था पर विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।
7. सरकार और सुरक्षा इकाइयों की कार्यशैली: सरकार और पुलिस की भूमिका पर यह पाठ तीखा सवाल उठाता है। प्रभावशाली आरोपियों के मामलों में नरमी और आम नागरिक या कार्यकर्ता के प्रति कठोरता—यह द्वैध नीति पीड़ितों की पीड़ा को बढ़ाती है। सुरक्षा इकाइयों का दायित्व केवल कानून–व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि पीड़ितों में भरोसा पैदा करना भी है, जो इन मामलों में अक्सर अनुपस्थित दिखता है।
सारांशत: इन सभी कथावस्तुओं का साझा निष्कर्ष यह है कि भारत में न्याय की समस्या केवल कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके चयनात्मक प्रयोग की है। जब संविधान का अनुच्छेद 21 पीड़ित को सुरक्षित जीवन देने में असफल हो जाता है, जब अनुच्छेद 14 प्रभावशाली और साधारण नागरिक के बीच अदृश्य रेखा खींच देता है, और जब अनुच्छेद 39A के अंतर्गत समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता का वादा व्यवहार में खोखला प्रतीत होता है—तब यह स्थिति मात्र प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवैधानिक संकट का रूप ले लेती है।
न्यायालय, सरकार और सुरक्षा एजेंसियां संविधान की संरक्षक हैं, उसके स्वामी नहीं। जमानत, सुनवाई और सुरक्षा जैसे निर्णय केवल विधिक विवेक का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता की परीक्षा होते हैं। यदि पीड़ित भय में जीने को विवश हो और आरोपी शक्ति के संरक्षण में निर्भय घूमे, तो यह ‘कानून का राज’ नहीं, बल्कि ‘प्रभाव का राज’ कहलाएगा।
इस लेख का उद्देश्य न्यायपालिका या राज्य को कमजोर करना नहीं, बल्कि उन्हें उनकी संवैधानिक भूमिका का स्मरण कराना है। जब तक पीड़ित–केंद्रित दृष्टिकोण, जवाबदेह शासन और संवैधानिक संवेदनशीलता को व्यवहार में नहीं उतारा जाएगा, तब तक न्याय एक निर्णय तो रहेगा, पर न्याय का अनुभव आम नागरिक के लिए दूर की वस्तु बना रहेगा। संविधान की सच्ची रक्षा तभी संभव है, जब उसकी आत्मा को काग़ज़ से निकालकर पीड़ित के जीवन में उतारा जाए।

