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सांसदों के गोद लिए गांव ‘अनाथ’

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-केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में सामने आई हकीकत
-77,457 परियोजनाओं में से 48,988 ही हुई पूरी
-मप्र के 101 गांवों की 2,828 परियोजनाओं में से 1,894 पूरी

कोरोना वायरस महामारी की मार केंद्र और राज्य सरकार की विकास योजनाओं पर भी पड़ा है। इन्हीं में से एक है सांसद आदर्श ग्राम योजना। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना के कारण सांसद निधि बंद होने का सबसे अधिक असर सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों पर पड़ा है। अगर यह कहा जाए की फंड के अभाव में सांसदों के गोद लिए गांव ‘अनाथ’ हो गए हैं तो इसमें अतिश्योक्ति नहीं होगी।

विनोद उपाध्याय

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएम बनने के कुछ महीनों के भीतर ही सांसद आदर्श ग्राम योजना का ऐलान किया था। योजना के तहत 2014 से 2019 के बीच चरणबद्ध तरीके से सांसदों को तीन गांव गोद लेने थे और 2019 से 2024 के बीच पांच गांव गोद लेने की बात कही गई है। लेकिन अपने क्षेत्र में विकास के बड़े-बड़े वादे करने वाले सांसदों ने इसमें कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई। वहीं रही सही कसर कोरोना ने निकाल दी। इस कारण सांसदों के गोद लिए गांव भी विकास के लिए तरस रहे हैं।
ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा लोकसभा में 16 मार्च 2021 को दिए एक प्रश्न के जवाब में यह जानकारी सामने आई है कि पिछले 6 साल में देश भर में सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत 77,457 परियोजनाएं शुरु की गई थी जिनमें से 63.25 फीसदी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। अगर मप्र्र की बात करें तो यहां के 101 गांवों में संचालित 2,828 परियोजनाओं में से 1,894 यानी 66.9 प्रतिशत ही पूरी हो सकी हैं। ऐसे में गांवों में विकास आधे-अधूरे हैं।

1,753 गांवों में 77,457 परियोजनाएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 से 2019 के बीच 2500 गांवों को गोद लेकर उनका विकास करने का लक्ष्य सांसदों को दिया था। लेकिन जब से यह योजना चली है तब से केवल 1,753 ग्राम पंचायतों को चार चरणों में चुना गया है जो प्रत्याशा से कम है। यही नहीं माननीयों ने अपने गांवों के विकास पर जोर भी नहीं दिया। जबकि योजना की शुरूआत बड़े ही उत्साह से हुई थी। देश भर में सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत चयनित ग्रामों में कुल 77,457 परियोजनाएं शुरु की गई थी जिनमें से 11 मार्च 2021 तक जारी आंकड़ों के अनुसार 63.25 फीसदी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इन पूरी हो चुकी योजनाओं की कुल संख्या 48,988 है। यदि इससे जुड़े राज्यवार आंकड़ों को देखें तो सबसे ज्यादा परियोजनाएं कर्नाटक में शुरू की गई थी, जहां अब तक 10372 परियोजनाओं को शुरु किया गया था जिनमें से करीब 76.3 फीसदी मतलब 7917 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।
वहीं इसके बाद उत्तरप्रदेश में 7,817 परियोजनाएं, महाराष्ट्र में 7,231, केरल में 6,074, तमिलनाडु में 5,897 और राजस्थान में 5,223 परियोजनाएं शुरु की गई थी। जबकि इसके विपरीत दिल्ली में इस योजना के तहत कोई परियोजना शुरु नहीं की गई थी। हालांकि दिल्ली में भी 13 ग्रामों को आदर्श ग्राम योजना के तहत चयनित किया गया था। इसी तरह पश्चिम बंगाल में केवल 61 परियोजनाएं ही शुरु की गई थी। यदि इन परियोजनाओं की सफलता की बात करें तो देश में सबसे सफल राज्य तमिलनाडु है जहां शुरु की गई 5,897 परियोजनाओं में से 91.5 फीसदी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इसके बाद उत्तरप्रदेश में 90.9, गुजरात में 77.3, कर्नाटक में 76.3, उत्तराखंड में 73.8, छत्तीसगढ़ में 71.1, मिजोरम में 70 फीसदी, मध्य प्रदेश में 66.9, हरियाणा में 66.8, सिक्किम में 62.7 और केरल में 6,074 परियोजनाएं शुरु की गई थी जिनमें से 62.4 फीसदी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। वहीं यदि पश्चिम बंगाल को देखें तो यहां कुल 61 परियोजनाएं शुरु की गई थी जिनमें से एक भी परियोजना पूरी नहीं हुई है। इसी तरह मेघालय में सिर्फ 25.7 फीसदी, पुडुचेरी में 25 फीसदी, असम में 24.8 फीसदी, गोवा में 24.6, अरुणाचल प्रदेश में 17.1 और नागालैंड में 134 में से 16, मतलब सिर्फ 11.9 फीसदी परियोजनाएं ही पूरी हुई हैं।

आदर्श गांवों में कितनी परियोजनाएं हो चुकी हैं पूरी
राज्य कुल परियोजनाएं पूरी हो चुकी परियोजनाएं
महाराष्ट्र 7,231 3,160
बिहार 4,824 1,829
कर्नाटक 10,372 7,917
केरल 6,074 3,789
राजस्थान 5,223 3,110
झारखंड 4,358 2,289
असम 2,430 603
छत्तीसगढ़ 3,577 2,544
ओडिशा 1,614 651
मध्य प्रदेश 2,828 1,894
तेलंगाना 1,840 934
उत्तरप्रदेश 7,817 7,107
आंध्र प्रदेश 1,466 802
हिमाचल प्रदेश 1,364 806
पंजाब 852 311
हरियाणा 1,594 1,065
गुजरात 2,292 1,772
तमिलनाडु 5,897 5,398
गोवा 597 147
मणिपुर 960 548
जम्मू और कश्मीर 845 488
उत्तराखंड 1,007 744
मेघालय 338 87
अरुणाचल प्रदेश 216 37
मिजोरम 514 360
नागालैंड 134 16
सिक्किम 239 150
त्रिपुरा 159 86
पश्चिम बंगाल 61 0
पुडुचेरी 72 18
लक्षद्वीप 79 29
लद्दाख 91 53
चंडीगढ़ 31 15

अब तक 2046 गांवों को गोद
देश में गांवों के विकास के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2014 को सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुवात की थी। इस योजना के तहत देश के सभी सांसदों को एक साल के लिए एक गांव गोद लेकर वहां विकास कार्य करना होता है। इस योजना के तहत गांव में बुनियादी सुविधाओं के साथ ही कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग, रोजगार आदि पर भी जोर दिया जाता है। इस सबका मकसद ग्रामों का सर्वांगीण विकास करना है। इस योजना के लक्ष्य ऐसे ग्रामों का विकास करना है जो अन्य गांवों के लिए एक आदर्श साबित हों और उनको देखकर वो भी सीखें। इस तरह यह गांव आस-पास की अन्य ग्राम पंचायतों के लिए भी आदर्श बनते हैं। 11 मार्च 2021 तक के लिए जारी आंकड़ों के अनुसार देश में अब तक 2,046 ग्राम पंचायतों को गोद लिया जा चुका है। देश भर में अब तक सबसे ज्यादा उत्तरप्रदेश में 361 गांवों को गोद लिया गया है। इसके बाद तमिलनाडु में 203, महाराष्ट्र में 179, गुजरात में 129, राजस्थान में 120, आंध्र प्रदेश में 110, केरल में 104 और फिर मध्य प्रदेश का नंबर आता है जहां 101 गांवों को गोद लिया गया है।

सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत ग्राम पंचायतों की संख्या
राज्य गांवों की संख्या
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 4
अरुणाचल प्रदेश 7
असम 45
आंध्र प्रदेश 110
उत्तरप्रदेश 361
उत्तराखंड 24
ओडिशा 63
कर्नाटक 76
केरल 104
गुजरात 129
गोवा 5
चंडीगढ़ 2
छत्तीसगढ़ 58
जम्मू और कश्मीर 15
झारखंड 71
तमिलनाडु 203
तेलंगाना 59
त्रिपुरा 14
दिल्ली 13
नागालैंड 8
पंजाब 38
पश्चिम बंगाल 10
पुडुचेरी 2
बिहार 89
मणिपुर 12
मध्य प्रदेश 101
महाराष्ट्र 179
मिजोरम 6
मेघालय 6
राजस्थान 120
लक्षद्वीप 1
लद्दाख 1
सिक्किम 8
हरियाणा 58
हिमाचल प्रदेश 18

2024 तक 8 गांवों का विकास
हालांकि हाल ही में केंद्र सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत आने वाली विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रभाव के आंकलन के लिए एक साझा समीक्षा मिशन (सीआरएम) का गठन किया था। जिसके अनुसार इस महत्वाकांक्षी सांसद आदर्श ग्राम योजना का गांवों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है और न ही इनके उद्देश्य की प्राप्ति हुई है। ऐसे में इस रिपोर्ट में योजना की समीक्षा करने की सिफारिश की गई है। इस योजना में 2016 तक प्रत्येक सांसद को एक-एक गांव को गोद लेकर उसे विकसित करना था। 2019 तक दो और गांवों और 2024 तक आठ गांवों का विकास किया जाना था। प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से भी अपील की थी कि वे विधायकों को इस योजना के लिए प्रोत्साहित करें, तो हर निर्वाचन क्षेत्र में 5 से 6 और गांव विकसित हो सकते हैं। मप्र में लोकसभा के 29 और राज्यसभा के 11 सांसद हैं। इनमें से लोकसभा के 28 और राज्यसभा के 8 सांसद भाजपा के हैं। यानी 40 में से 36 सांसद भाजपा के हैं, लेकिन इनमें से मात्र 7 सांसदों ने ही आदर्श ग्राम योजना के चौथे चरण में गांवों को गोद लिया है। इस कारण मप्र बड़े राज्यों में फीसड्डी साबित हुआ है। मप्र के सांसदों ने पांच चरणों में कुल 101 गांवों को गोद लिया है। इनमें सबसे कम चौथे चरण में अब तक मात्र 7 गांवों को गोद लिया है। जबकि चौथे चरण में उत्तर प्रदेश के 52, तमिलनाडु के 36, महाराष्ट्र के 32, गुजरात के 28, राजस्थान के 20, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ के सांसदों ने 9-9 गांवों को गोद लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वकांक्षी योजनाओं में शामिल सांसद आदर्श ग्राम योजना में मध्य प्रदेश के सांसदों की रुचि नहीं दिखाई दे रही है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग तक अभी सात सांसदों का प्रस्ताव पहुंचा है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने जबलपुर के ग्राम घाना को आदर्श ग्राम बनाने के लिए चुना है। इनके अलाव सागर के सांसद राज बहादुर सिंह ने नरयावली विधानसभा क्षेत्र व सागर जनपद के तहत आने वाली पंचायत बदौना को, इंदौर सांसद शंकर लालवानी में तिल्लौर खुर्द, राज्य सभा सांसद व पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सीहोर जिले के बुदनी विकासखंड के ग्राम पंचायत डोबी का चयन किया है। वहीं राज्य सभा सांसद अजय प्रताप सिंह ने सिंगरौली के पोड़ी नौगाई गांव को गोद लिया है।

मप्र की परफॉर्मेंस देश से अच्छी
कोरोना संक्रमण के कारण सांसदों द्वारा गोद लिए गांवों में विकास का पहिया थम सा गया है। इसके बावजुद मप्र के गांवों में विकास की दर राष्ट्रीय दर से अधिक है। 11 मार्च 2021 तक जारी आंकड़ों के अनुसार देशभर में आदर्श ग्राम योजना की 63.25 फीसदी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। वहीं मप्र में 66.9 प्रतिशत परियोजनाएं पूरी हुई हैं। मप्र के 101 गांवों की 2,828 परियोजनाओं में से 1,894 पूरी हो चुकी है। मप्र के किसान कल्याण तथा कृषि विकास मंत्री कमल पटेल कहते हैं की प्रदेश के गांवों के विकास के लिए हमारी सरकार लगातार तत्पर रही है। बेहतर नीति और सही नीयत से ही गांव, प्रदेश और देश का विकास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना ने गांव के विकास के द्वार खोल दिए हैं। इस योजना में 6 राज्यों के चुनिंदा जिलों को पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया। इनमें हरदा, सीहोर और डिंडोरी सम्मिलित हैं। इस योजना द्वारा गांव के विकास के द्वार खुल गए हैं। इस योजना से गांव की दिशा और दशा बदलेगी। गौरतलब है कि सांसदों द्वारा गोद लिए गांवों में सोशल कॉरपोरेट रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत कई काम कराए गए थे, जिनकी गुणवत्ता कुछ महीनों बाद ही सामने आने लगी। इन गांवों में से अधिकांश में सडक़, सफाई, बिजली, पानी, रोजगार और स्वास्थ्य की स्थिति खराब है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अपनी नई परफॉरमेंस और एक्शन प्लान रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर जारी की है। इस रिपोर्ट में मंत्रालय ने बताया है कि इस प्रोजेक्ट के अंदर आने वाले 35 प्रतिशत प्रोजेक्ट अभी तक शुरू नहीं हो सके हैं। इसके अलावा मंत्रालय ने खुद ही जानकारी दी है कि सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत 13 प्रतिशत प्रोजेक्ट अभी भी अधूरे हैं। गणित के हिसाब से देखें तो लगभग 66.9 प्रतिशत यानी लगभग आधे प्रोजेक्ट ही पूरे हो सके हैं।
देशभर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रथम कार्यकाल की अति-महत्वाकाक्षी सांसद आदर्श ग्राम योजना को लेकर जो नतीजे आ रहे हैं, वह हताश करने वालें हैं। सांसदों की अरूचि के चलते यह योजना हासिए पर नजर आ रही है, जिससे गांवों के विकास की मोदी सरकार की अवधारणा पर तो ग्रहण लगा ही है। गांवों के विकास का पहिया भी ठहर सा गया है। बहरहाल, सांसद ग्राम आदर्श योजना के सही ढंग से आगे न बढऩे के आसार तभी से सामने आने लगे थे, जबकि प्रधानमंत्री की इच्छानुसार संसद सदस्यों ने गांवों को गोद लेने में रुचि नहीं दिखाई थी। विरोधी दलों के सांसद तो सरकार की विकास योजनाओं में अड़ंगा लगाते ही रहते हैं,लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि सख्त शासक माने जाने वाले पीएम मोदी अपनी पार्टी भाजपा के सांसदों और यहां तक कि केंद्रीय मंत्रियों पर भी इस योजना के तहत गांवों के विकास का दबाव नहीं बना पाए। प्रधानमंत्री ने कई बार सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र का कोई एक गांव गोद लेकर उसका आदर्श ग्राम योजना के तहत विकास कराए जाने की योजना की याद भी दिलाई, लेकिन किसी ने उनकी सुनी नहीं।

फंडिंग का विशेष इंतजाम नहीं
सांसद आदर्श ग्राम योजना का सर्वे करने वाला आयोग इस योजना की असफलता के पीछे की जो सबसे बड़ी वजह बता रहा है, उसके अनुसार इस योजना के लिए पृथक फंड निर्धारित न किया जाना इस योजना के असफल होने की सबसे बड़ी वजह बना, लेकिन इसके विपरीत यह भी पाया गया कि कुछ सांसदों ने सांसद आदर्श ग्राम योजना में रूचि दिखाई तो अतिरिक्त सक्रियता दिखाई वहां गांवों के आधारभूत ढांचे में सुधार हुआ। इसका मतलब है कि यदि इस योजना की कमियां दूर की जा सकें तो अभी भी देश के गांव आदर्श रूप ले सकते हैं। यह काम इसलिए प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए था क्योंकि कोरोना संकट के इस दौर में इसकी जरूरत और अधिक महसूस हो रही है कि हमारे गांव आत्मनिर्भर बनें।
गांवों को विकसित बनाने की सांसद आदर्श ग्राम योजना माननीयों को नहीं भायी। कई सांसद आदर्श गांवों का दौरा करने पर पता चलता है कि ऐसे गांवों के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ज्यादातर सांसद ऐसे हैं जिन्होंने गांवों को चुन तो लिया है लेकिन तरक्की के कामों में वे फिसड्डी साबित हुए। जो छोटे-मोटे काम हुए भी हैं, उस का फायदा दबंगों तक ही सिमट कर रह गया। सडक़ों पर बजबजाती नालियों का गंदा पानी व कूड़े का ढेर आदर्श गांवों की साफ सफाई व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहे हंै। जिन सांसदों ने प्रधानमंत्री के दबाव में गांवों को चुन भी लिया, अभी उन के द्वारा चुने गए पहले चरण के गांवों में ही तरक्की को रफ्तार नहीं मिल पाई है। सांसदों की समस्या यह है कि योजना के लिए अलग से कोई पैसा नहीं दिया गया है। ऐसे में सांसद के पास ले-देकर अपनी सांसद निधि बचती है, अगर वह इसे एक गांव पर खर्च कर देगा तो संसदीय क्षेत्र के बाकी के गांवों और दर्जनभर कस्बों में वह क्या खर्च करेगा।

ऑडिट रिपोर्ट में उठाए गए सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गांवों के विकास की योजना सांसद आदर्श ग्राम योजना का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा है और न ही लक्षित मकसद को हासिल कर पाई है। ग्रामीण विकास विभाग की योजनाओं के प्रदर्शन से संबंधित रिपोर्ट में यह जानकारी देते हुए कहा गया है कि इस योजना की समीक्षा की जानी चाहिए। सूत्रों के मुताबिक 5 चरण के बाद भी मंत्रियों समेत कई सांसदों ने अब तक गांवों को गोद नहीं लिया है। केंद्र ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत आने वाली विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के समुचित क्रियान्वयन और उनके प्रभाव के आकलन के लिये एक साझा समीक्षा आयोग (सीआरएम) का गठन किया था। अपनी रिपोर्ट में सीआरएम ने कहा कि एसएजीवाई के लिए कोई समर्पित कोष नहीं है। किसी और मद की रकम के जरिये इसके लिये कोष जुटाया जाता है। सीआरएम के मुताबिक उसके दलों ने राज्यों का दौरा किया और उन्हें योजना का कोई अहम प्रभाव नजर नहीं आया। सीआरएम ने कहा कि इस योजना के तहत सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों में भी, सांसदों ने अपनी क्षेत्र विकास निधि से इसके लिये पर्याप्त रकम आबंटित नहीं की। सीआरएम ने एक रिपोर्ट में कहा, कुछ मामलों में जहां सांसद सक्रिय हैं, कुछ आधारभूत विकास हुआ है, लेकिन योजना का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा है।ज् सीआरएम के मुताबिक, ऐसे में इन गांवों को आदर्श ग्राम नहीं कहा जा सकता और इस योजना की समीक्षा की जानी चाहिए।

अलग से निधि आवंटित करने की मांग
17 मार्च को राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के एक सदस्य ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी सांसद आदर्श ग्राम योजना के लिए अलग से निधि जारी करने की मांग उठाई। उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान इस मामले को उठाते हुए सपा के सुखराम सिंह यादव ने कहा कि यह योजना सांसदों के लिए सम्मान का विषय बन गया है क्योंकि उन्होंने इसके तहत गांव तो गोद ले लिए गए किंतु धन की कमी के कारण उनका विकास नहीं हो पा रहा है। यादव ने बताया कि उन्होंने चार सालों में उत्तर प्रदेश के चार गांवों को गोद लिया लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इन गांवों में विकास का कोई काम नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, गांव वाले परेशान करते हैं कि विकास नहीं हो रहा है और हम कहते हैं कि हमारे पास धन नहीं है। सांसदों के लिए यह समस्या पैदा हो गई है। उन्होंने सभापति से इस मामले में निर्णय लेने या व्यवस्था देने का आग्रह किया ताकि जिन गांवों को गोद लिया गया है उनका विकास हो सके। उन्होंने कहा कि तभी गांवों का विकास हो सकेगा और हम लोगों का मान सम्मान भी रहेगा। उन्होंने कहा, सांसद आदर्श ग्राम योजना के लिए अलग से निधि जारी करने का नीतिगत निर्णय अविलंब हो।
अलग से निधि नहीं होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी सांसद आदर्श ग्राम योजना के प्रति सांसदों की दिलचस्पी में नरमी आई है। रिकार्ड से पता चलता है कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में करीब आधे सांसदों ने अभी तक 2019-2024 में योजना के तहत किसी गांव को गोद नहीं लिया है। इस योजना के पहले चरण में सांसदों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। बाद के वर्षो में सांसदों ने इसे लेकर रुचि नहीं दिखाई। सांसदों की उदासीनता को देखते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने सांसदों से चौतरफा विकास के लिए गांवों को गोद लेने के बारे में लिखा था। गत वर्ष 19-20 दिसंबर को हुई बैठक में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पाया कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में सांसदों ने केवल 250 गांव ही गोद लिए हैं। सांसदों की उदासीनता को देखते हुए ग्रामीण मंत्रालय ने कई पत्र लिखा। ग्रामीण मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार इससे सांसद विचार करने पर बाध्य हुए और करीब 300 गांव गोद लिए गए। इससे मामूली वृद्धि हुई। लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर सांसदों की कुल संख्या 788 है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने सभी सांसदों को दिशानिर्देश जारी किए हैं। राज्यों के मुख्य सचिवों को सांसदों के लिए ओरीएंटेशन प्रोग्राम आयोजित करने के लिए कहा है ताकि वे गांव गोद लेने के लिए प्रेरित हो सकें। ग्रामीण विकास मंत्रालय में नीति, योजना एवं निगरानी के उप निदेशक डॉ. आशीष सक्सेना के पत्र के मुताबिक, गांव गोद लेने के कार्यक्रम में तेजी लाने के लिए कलेक्टरों से इस दिशा में प्रगति की समीक्षा करने को कहा गया है। एसएजीवाई के तहत हर लोकसभा सदस्य को अपने क्षेत्र का एक गांव गोद लेना है और उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए उसके विकास पर ध्यान रखना है।

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