~ पुष्पा गुप्ता
अंग्रेजी शासन काल से २ प्रकार के विपरीत और मिथ्या शोध आरम्भ हुए हैं-आर्य बाहर से थे, किन्तु जितने महापुरुष थे वे मेरे गांव के थे।
(१) पहला मिथ्या शोध जयमन्त मिश्र का देखा था। मण्डन मिश्र से सम्बन्धित विभिन्न शंकर दिग्विजयों से १५ श्लोक उद्धृत कर प्रमाणित किया था कि मण्डन मिश्र मिथिला के थे। सभी श्लोकों में उनका घर शोण तट, मगध या उसकी सीमा, साल वन में लिखा था। मिथिला शब्द का कही प्रयोग तक नहीं हुआ था। शोध पूर्ण करने के लिए मण्डन मिश्र के गांव से मिलते जुलते महिषी गांव में मण्डन मिश्र की कुलदेवी तारा का मन्दिर बनाना चाहते थे, पर दरभंगा राजा ने जालसाजी में सहायता से मना कर दिया।
अतः चन्दा कर मन्दिर बनवाना पड़ा, जिसमें मन्दिर बनने से २५०० वर्ष पूर्व मण्डन मिश्र पूजा करते थे। उनके शोधपत्र में एक शब्द था ’शोणाख्य पुं नद तटे’। यह पढ़ने के २ दिन पूर्व मेरे पिता जी ने मुझे डांटा था जब मैंने सोन को नद के बदले नदी कहा था।
(२) पूरे भारत में शङ्कराचार्य की जयन्ती वैशाख शुक्ल पञ्चमी को मनायी जाती है। यह जिन श्लोकों में लिखा है उनमें उनका जन्म वर्ष २६३१ युधिष्ठिर शक या २५९३ कलि संवत् लिखा है। किन्तु अन्य उत्तराधिकारी शंकराचार्यों की जन्मतिथि से सम्बन्धित उद्धृत कर बंगलोर वेंकट रामन ने जन्म वर्ष प्रथम सदी ईपू, (महत्वपूर्ण कुण्डली), अथावले ने ईसा की प्रथम सदी, तिलक ने ईसा की छठी सदी, के बी पाठक ने ७८८ ई। मानी है।
सबसे बाद की तिथि देखते ही इतिहासकार प्रसन्न हो गये और इसे स्वीकार कर लिया। किन्तु इनमें किसी के अनुसार वैशाख शुक्ल पञ्चमी को उनका जन्म नहीं हुआ था, जिस दिन यही लोग जयन्ती मनाते हैं।
(३) १९६४ में धर्मयुग साप्ताहिकी में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक वीरेन्द्र कुमार गुप्त चाणक्य पर सीरियल लिख रहे थे। रोचक था, किन्तु एक लेख में देखा कि पाटलिपुत्र का बड़ा बाजार (बृहद् हट्टी) मेरठ के बारहठ में है (अभी बारहठ स्वतन्त्र जिला है)।
आधुनिक युग में रेल तथा विमान होने पर भी लोग बाजार करने १,००० किलोमीटर दूर नहीं जाते हैं। हर नगर या उसमे मुहल्ले का बाजार उसी में होता है। कई पुराने नाम मिट गये हैं, किन्तु पाटलिपुत्र का बृहद् हट्टी अभी भी बिहटा के नाम से वर्तमान है। सम्पादक को विरोध के लिए पत्र लिखा तो बाकी सीरियल छापना बन्द हो गया। तब राजकमल प्रकाशन से वह पुस्तक रूप में छपी।
(४) १९६४ में मेरे पिता जी से पढ़ने गोस्वामी तुलसीदास के वंशज चन्द्रदेव द्विवेदी आते थे। एक बार उन्होंने अपनी वंशावली दिखायी थी। तुलसीदास के वंशज रामगुलाम द्विवेदी बक्सर के निकट राजापुर से मिर्जापुर चले गये थे। उनके प्रपौत्र चन्द्रदेव जी थे। स्वयं तुलसीदास ने अपने स्थान के विषय में लिखा है-काशी-मग सुरसरि क्रमनाशा।
केवल बक्सर निकट राजापुर के लिए काशी-मगध, गंगा कर्मनाशा विपरीत दिशाओं में हैं। बाल्यकाल से ही वे काशी में रहे जहां असी घाट पर रामचरितमानस लिखी। इसकी भाषा को अवधी बनाने के लिये भोजपुरी केन्द्र काशी की भाषा भोजपुरी नहीं मान कर रामचन्द्र शुक्ल ने अपने बलिया को भी भोजपुरी नहीं माना, सबसे दूर के शाहाबाद जिले को आदर्श भोजपुरी क्षेत्र कहा। भोजपुरी, अवधी के शब्द प्रायः समान हैं किन्तु सम्मान के लिए रवा शब्द का व्यवहार केवल भोजपुरी में है, जिसका तुलसीदास ने प्रायः प्रयोग किया। बाद के संस्करणों में रवा शब्द हटाने की बहुत चेष्टा हुई।
१८५७ विद्रोह के नरसंहार के बाद शाहाबाद से ७ लाख लोगों को मजदूर के रूप में मारीशस, गुयाना आदि भेजा गया। वे लोग अपने साथ केवल रामचरितमानस ले गये थे, जिससे उनकी संस्कृति आजतक बची है। अतः ग्रियर्सन ने तुलसीदास का जन्म स्थान भोजपुरी ही नही अवधी से यथासम्भव दूर बान्दा जिले में राजापुर गांव खोजा।
वहां उनको २ बूढ़ी स्त्रियों ने कहा कि तुलसीदास इसी गांव में पैदा हुए थे। यदि इन स्त्रियों को उद्धृत नही करते तो विश्वास हो सकता था। २ अविश्वसनीय हैं-पुरुषों के बदले महिलाओं ने बात की, महिलायें इतनी बूढ़ी नहीं थीं कि उनके सामने तुलसीदास का जन्म हुआ। इसे प्रमाणित करने के लिए यह कहानी १९१५ में नागरीप्रचारिणी सभा आरा द्वारा छपवायी गयी।
(५) श्री रामप्रकाश शर्मा की पुस्तक ’मिथिला का इतिहास’ का प्रकाशन संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा से हुआ। छपते ही उसके विरोध में दरभंगा के जितने शिक्षित परिवार थे उनका विरोध आरम्भ हुआ कि उनके परिवार तथा गांव का नाम नहीं है। कई विरोध पत्र उस पुस्तक के परिशिष्ट में भी छापने पड़े। किन्तु इतिहास शोध के एकमात्र उद्देश्य का पता चला कि किसी प्रकार अपने परिवार तथा गांव का महिमा मण्डन करना है, कितना भी झूठ लिखना पड़े।
(६) भारत में इतिहास के सभी विद्यार्थियों को पता है कि वे पूर्ण रूप से झूठ लिख पर ही परीक्षा पास कर सकते हैं। बी.ए, में इतिहास विषय में वे लोग पढ़ते हैं कि ७१२ ई में सिन्ध पर मुस्लिम अधिकार होने के बाद शंकराचार्य उनके बदले बौद्धों के विरुद्ध अभियान चला रहे थे। पश्चिम भारत के मुस्लिम शासन में भी वे संस्कृत में शास्त्रार्थ कर रहे थे।
उलटा इतिहास का अर्थ है कि या तो वे शंकराचार्य को पागल मानते हैं, या स्वयं पागल हैं। सभी इतिहास छात्र अन्य विषय हिन्दी या अन्य लोक भाषा रखते हैं। उनके इतिहास में पढ़ते हैं कि मुस्लिम आक्रमण के प्रतिकार के लिए गोरखनाथ ने नागभट प्रतिहार तथा मेवाड़ के बप्पा रावल का संघ बनवाया, पूर्णा, जालन्धर, जाजपुर तथा कामाख्या में पीठ बनवाये और राष्ट्र चेतना के लिए लोकभाषा में साहित्य बनाया।
उन राजाओं के प्रभाव क्षेत्र में कश्मीर का शारदा पीठ, बद्रीनाथ, पुरी तथा शृङ्गेरी पीठ नहीं थे जहां वे मठ बनवा सकते थे। सभी लोकभाषाओं का इतिहास गोरखनाथ द्वारा ८वीं सदी से ही आरम्भ होता है। ओड़िशा, गोरखपुर आदि में उनके शिष्य परिवारों की आज भी नाथ उपाधि है। इसी इतिहास में बंगला तथा ओड़िया में किसका साहित्य २-३ दिन पूर्व आरम्भ हुआ इस पर एक सेमिनार में विवाद हो रहा था।
इसके तुरन्त बाद ७८८ ई. में गोरखनाथ के बदले शङ्कराचार्य काल की चर्चा आरम्भ हो गयी। १९६४ में बीए के एक छात्र मुझसे संस्कृत पढ़ रहे थे तो उनकी इतिहास तथा हिन्दी साहित्य की पुस्तकें देखने का अवसर मिला। पूछा के एक साथ २ विपरीत चीजें कैसे रट रहे हैं। उन्हों ने कहा कि नकल कर पूरी तरह झूठ नहीं लिखें तो कभी परीक्षा नहीं पास कर सकते।
(७) सुनीति कुमार चटर्जी ने विद्यापति तथा जयदेव-दोनों को अपने जिले का बताया है। इस पर गर्व करने के अतिरिक्त उनको संस्कृत समझने से कोई मतलब नहीं था। वासुदेव मीरासी ने मेघदूत के रामगिरि को अपने घर के निकट नागपुर का रामटेक कर दिया। मीरासी जी कितने भी विद्वान् हों, मौनसून का आरम्भ नागपुर से नहीं करा सकते है। यह विदर्भ या आज के भूगोल की भाषा में वृष्टि छाया का क्षेत्र है।
(८) प्राचीन पितामह ज्योतिष दक्षिण भारत में तथा बाद का सूर्य सिद्धान्त उत्तर भारत में है (बार्हस्पत्य संवत्सर प्रसंग में)। वेद शाखा में भी प्राचीन तैत्तिरीय शाखा कर्णाटक में तथा बाद की वाजसनेयि शाखा उत्तर भारत में प्रचलित है। किन्तु इनका जीवन भर अध्ययन करने के बाद अंग्रेजी आदेश के अनुसार यही निष्कर्ष होता है कि उत्तर भारत के आर्यों ने दक्षिण भारत पर संस्कृत थोप दी।
भागवत प्रवचन के आरम्भ में उसका माहात्म्य कहते हैं कि भक्ति और ज्ञान का जन्म द्रविड़ में, वृद्धि कर्णाटक में तथा प्रसार महाराष्ट्र तक हुआ। कर्णाटक तथा महाराष्ट्र नामों का यही आधार है। एक प्रोफेसर इमेरिटस ने तो अति कर दी।
२००१ के श्रीशैलम वैदिक सम्मेलन में उत्तर भारत के आर्यों द्वारा द्रविड़ क्षेत्र पर संस्कृत तथा वेद थोपने के प्रमाण में ऋग्वेद का एक श्लोक कहा जिसके २ शब्दों का प्रयोग केवल तेलुगू में होता है-कृषक के लिए रेड्डी, नौसेना मुख्य के लिए सुपर्ण नायक। अपने मत का उलटा उद्धृत करने पर पूछा तो नाराज हो गये तथा कहा कि उनके अधीन ४० व्यक्ति शोध करचुके हैं, मैं उनका शिष्य बनने योग्य भी नहीं हूं। यह सत्य है, अगर उनके शिष्य रूप में सत्य लिखता तो कभी पास नहीं करता।
(९) देवासुर के समुद्र मन्थन के लिए अफ्रीका के लोग खनन में सहायता के लिए खनिज क्षेत्र झारखण्ड, उत्तर ओड़िशा, छत्तीसगढ़ आये थे। आज भी उनके वंशजों का चेहरा स्पष्ट रूप से अफ्रीकी लोगों जैसा है। बाद में उसी भाषा क्षेत्र के यवनों को राजा सगर ने भगाया तो वे भाग कर ग्रीस चले गये जिससे उसका नाम ग्रीस के बदले इयोनिया (यूनान) हो गया (हेरोडोटस)। आज भी यूनानी दवा का अर्थ अरबी दवा है, ग्रीस का नहीं।
अतः अफ्रीकी मूल के लोगों की आज भी वही उपाधि है, जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं-खालको (खालकोपाइराइट), सिंकू (स्टैनिक), हेम्ब्रम (हाइग्रेरियम), ओराम (औरम), टोप्पो (टोपाज) आदि। किन्तु बाहर से आये लोगों को मूल निवासी या आदिवासी बना दिया तथा भारतीय लोगों को विदेशी आर्य।
(१०) संस्कृत तथा तमिल दोनों विश्व भाषायें हैं। वस्तुतः ब्राह्मी लिपि के शार्टहैण्ड रूप में तमिल का निर्माण ही विश्व भाषा प्रयोग के लिए हुआ था क्योंकि कार्तिकेय को क्रौञ्च द्वीप (क्रौञ्च पक्षी आकार में क्रौञ्च द्वीप तथा क्रौञ्च पर्वत) पर आक्रमण करने के लिए अपनी नौसेना मयूरी बनानी थी। उनके वंशज माओरी लोगों की भाषा आज तक हवाई द्वीप, न्यूजीलैण्ड, तथा आस्ट्रेलिया में एक ही है।
पर लिपि तथा भाषा की विविधता का कारण समझने के बदले प्रचार हुआ कि वेद काल में लिपि नहीं थी, सुन कर याद करते थे। श्रुति का अर्थ वेद है, स्मृति का अर्थ धर्मशास्त्र। एक विषय सुनने पर दूसरा विषय कैसे याद हो सकता है? क्या भौतिक विज्ञान पढ़ने पर रसायन विज्ञान याद होगा? इसके अतिरिक्त वंश परम्परा से केवल अपने परिवार के सूक्त रटे जा सकते हैं, अन्य परिवारों के ऋषियों के सूक्तों का संकलन कैसे हो सकता है?
(११) ज्योतिष में सभी लोग बृहत् संहिता (१३/३) उद्धृत करते हैं कि वराहमिहिर प्रयुक्त शक में २५२६ जोड़ने पर युधिष्ठिर शक होता है। युधिष्ठिर वर्ष को सदा शक कहा गया है, इसका निष्कर्ष निकाला कि शक का अर्थ विदेशी शकों का कैलेण्डर है। वराहमिहिर ने भी युधिष्ठिर शक में अपनी जन्मतिथि ३०४२ चैत्र शुक्ल अष्टमी (६-३-९५ ईपू) दी है।
उत्पल भट्ट के अनुसार वे ९० वर्ष की आयु में अर्थात् ५ ईपू में परलोक गये। किन्तु सभी इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने अपनी मृत्यु के ८३ वर्ष बाद आरम्भ हुए शालिवाहन शक का प्रयोग किया है। उनके समकालीन कालिदास, जिष्णुगुप्त के पुत्र ब्रह्मगुप्त ने भी इसी शक का प्रयोग किया है। किन्तु सबकी गणना शालिवाहन शक में कर ब्रह्मगुप्त के ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त का काल ६२६ ई कर दिया है।
उन्हीं लोगों के अनुसार इस पुस्तक के ४ वर्ष पूर्व ही हिजरी सन् की गणना इसके अनुसार होने लगी थी। शालिवाहन शक को भी विदेशी बनाने के लिए कश्मीर का एक राजा कनिष्क खोजा गया जो गोनन्द वंश का ५१वां राजा था (राजतरंगिणी, तरंग १) जो १२९४ ईपू में राजा बना। उसके शिलालेखों को बिना प्रमाण के ७८ ई के बाद का बना कर उसे विदेशी शक बनाया गया। शक और संवत्सर के अज्ञान के कारण विश्व इतिहास में पहली बार ऐसा अशिक्षित शासक हुआ जो १९५७ में तथाकथित राष्ट्रीय शक आरम्भ नहीं कर सका।
(१२) भारतीय ज्योतिष की गणना का आधार समझने के बदले उसे न्यूगेबायर ने चतुर अनुमान कहा है। फिर उनको क्वाण्टम मेकानिक्स,आदि की पुस्तकें लिखने की क्या आवश्यकता थी? हर बात में बिना गणना या प्रयोग के चतुर अनुमान करते?
केवल एक ही विवाद हुआ कि भारत में सूर्य केन्द्रित या पृथ्वी केन्द्रित ग्रह कक्षा मानते थे। दीर्घवृत्तीय गणना या ग्रहण गणना, अक्षांश-देशान्तर की माप कैसे होती थी, यह सोचने का कभी अवसर ही नही आया।
(१३) शुरु से पढ़ाया गया कि भारतीय लोग तिथि नहीं देते थे। जहां कहीं तिथि का उल्लेख देखा उसे झूठा कहने का अभियान आरम्भ हो गया-जैसे शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने भारतीय ज्योतिष का इतिहास में वराहमिहिर, कालिदास की तिथियां उद्धृत कर उनको जाली सिद्ध करने की पूरी चेष्टा की है। ग्रीक लेखकों ने भारतीय साहित्य को उद्धृत कर तिथियां दी हैं।
उनके यहां कैलेण्डर नहीं था, टालेमी के अनुसार राजाओं के शासन काल से वे इतिहास का हिसाब करते थे। पर वे बिना कैलेण्डर तिथि देते थे, भारत के लोग कैलेण्डर रखते थे पर प्रयोग नहीं करते थे? पह्ली बार नकली इतिहास देखने पर १९६१ में पूछा कि ग्रीक लेखकों को यह कैसे पता चला कि सिकन्दर आक्रमण के ३२६ वर्ष बाद इसवी सन् आरम्भ होगा? अभी तक कोई इतिहासकार इसका उत्तर नहीं दे सका है।
(१४) राधाकृष्णन् ने भारतीय संस्कृति नष्ट करने में सबसे अधिक योग दिया अतः उनको अंग्रेज भक्तों ने राष्ट्रपति बनवाया। उन्होंने कहा कि व्यास काल्पनिक थे, अतः व्यास जयन्ती के बदले उनकी जन्मतिथि को गुरु दिवस मनाया गया। शंकराचार्य की प्रशंसा में लिखा कि रामानुज आदि मूर्ख थे, केवल शंकराचार्य विद्वान् थे जिन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया। भारत की एक भी पूजा देख लेते तो उनको पता चलता कि हर पूजा में शंकराचार्य का स्तोत्र व्यवहार होता है। रामानुज मठों में भी शंकराचार्य लिखित लक्ष्मीनृसिंह स्तोत्र का पाठ होता है।
राधाकृष्णन ने न कभी वेद देखा न उपनिषद्, अंग्रेजों की नकल कर लिखा कि वेद का बहुदेववाद इसाई तथा इस्लाम मतों का अनुकरण कर उपनिषद् में एकदेववाद हो गया। इसके लिए शंकराचार्य का समय ७८८ ई करना आवश्यक था। कालटी में शंकराचार्य के नाम पर संस्कृत विश्वविद्यालय खुला तो २० वर्षों तक केवल मुस्लिम प्राध्यापक ही अद्वैत वेदान्त पढ़ाने के लिए रखे गये, क्योंकि राधाकृष्णन् के अनुसार यह इस्लाम की नकल है।
उनका अन्य मत है कि मूल गीता में केवल ६८ श्लोक थे, १५०० वर्षों में लोगों ने जोड़ कर उसे ७०० कर दिया (वह वेद का आरम्भ १५०० ईपू कहते थे)। कई बार गीता का श्लोक उद्धृत करने पर लोग उसका विरोध करते हैं कि यह बाद का है।
राधाकृष्णन् के भक्तों से ४० वर्षों से पूछ रहा हूं कि कम से कम १ मूल श्लोक बता दें, मैं उसी का पाठ करूंगा। अभी तक पता नहीं चला, फिर उनको गिना कैसे?

