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*बरसात की रातों में भीगे हुए भादों के चाँद का दर्शन*

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        डॉ. नीलम ज्योति

नव ब्याहता के अधरों सा खिला हुआ, बादलों के मध्य का उदित होता छिपता ऐसे लगता है मानों नायिका के चेहरे पर स्वीकारोक्ति के पश्चात लज्जा, अनुराग  यानी षोडश कलाओं से परिपूर्ण भाव आ जा रहा हो।

    षोडश कला हो या षोडश श्रृंगार सबका अपना एक अलग सौंदर्य, गंध, स्पर्श, शब्द, संगीत और रस होता है।

आखिर ये षोडश है क्या?

षोडशी कन्या से क्या तात्पर्य है?

वह षोडश वर्ष की होने पर ही परिणय योग्य क्यूँ होती हैं?

    पिप्पलाद ऋषि ने आत्मा को षोडशी कहा है, अर्थात जो सोलह-कलाओं वाला है।

    षोडश कला : 

प्राण, श्रद्धा, पृथ्वी, आपः, अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य या रज, तप, मंत्र, लोक, नाम और कर्म !

     इसे आप चन्द्रमा की अर्थात मन की सोलह कलाएं भी कह सकते हैं (किन्तु इस और उस चन्द्रमा के भेद को भी समझें)।

     इसे विज्ञान की भाषा में आप कह सकते हैं कि- 

ऑक्सीजन- हाइड्रोजन-अर्थात प्रवाह 

नाइट्रोजन -कृष्णता, कालिमा 

कार्बन-ज्वलन शीलता के पश्चात 

अवशिष्ट सल्फर- गंध फॉस्फोरस स्पर्शानुभूति सोडियम पोटेशियम कैल्शियम – मैग्नीशियम लिथियम फ्लोरीन क्लोरीन आयोडीन सिलिकॉन है। 

     शिलाओं के कण आयरन अर्थात हमारा शरीर पदार्थ भेद से अस्थि, मज्जा, शोणित, शुक्र, रज, रक्त, वसा, कफ, मल, मांस, त्वक्आदि इन्हीं सोलह पदार्थों से आकृतिमय आभाषित अथवा इन्हीं में अदृश्य भी होता है।

इस आत्मा के दो भेद हैं :

१. ईश्वरीय-प्राजापत्य तथा 

२. जीवात्मक “अदृश्य, सूक्ष्म-दृश्य, स्थूल”.  

षोडशी पुरुष की व्याख्या ही परा-विद्या है तथा षोडशी कन्या ही अपरा-विद्या हैं। हमारे जितने भी “देवियाँ अथवा देवता” हैं वे सदैव ही षोडश वर्षीय युवा इसी कारण से कहे गये है। 

    षोडशी कला युक्त पुरुष ही षोडश कला युक्ता स्त्री के साथ षोडश- रूपात्मक सृष्टि की संरचना अथवा संहार करते हैं।

     दम्पत्ति शब्द द्विवचनात्मक है, पत् और पत्नी मिलकर पति बनते हैं। अकेले तुम पति बन ही नहीं सकते हो और न ही पत्नी। पति पत्नी से ही गृह का निर्माण होता है।तभी तो गृह को वेदों में “दम्” कहते हैं। जब एक यज्ञ हुआ तो कन्या उत्पन्न होती है वही द्वितीय यज्ञ में पत्नी बन जाती है। उसी दम् की पति, स्वामिनी, “पत्युर्नो यज्ञसंयोगे” जो अवकाश सूनापन था एक दूसरे के जीवन में जो रिक्तता थी 

   “सोऽयमाकाशः पत्न्या पूर्यते.” 

   नीरस जीवन में रसागमन के चार स्रोत होते है। अपने छोटों से वात्सल्य, बड़ों के प्रति श्रद्धा, सखी या सखा से स्नेह। ये तीनों रस जब मिलते हैं तो रति की प्रेमधारा निःसृत होती है। तभी तो स्त्री कहती है :

“मैं अपने लोकवेद के ह्रिदय को स्नेह श्रद्धा वात्सल्य और रति से सींचती हूँ”।

  “नात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथञ्चन.” 

    यह न तो नानात्व न तो आत्मस्वरूपसे है और न ही अपने स्वरूप से कुछ है। ये जितने भी रस हैं ये सभी न तो नानात्व हैं न तो मेरे हैं न उनके ही हैं।  ये रस हैं।

  “रसो वै सः.” 

इसका उस पुरुषोत्तम पुरुष से कोई भी सम्बंध नहीं है। वस्तुतः वे निर्विकार, निर्विशेष, निःशब्द, अगम अगोचर ही हैं।

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