शशिकांत गुप्ते
एक ओर भारत जोड़ी यात्रा चल रही है। दूसरी ओर चुनावों के नतीजों का इंतजार हो रहा है।
चुनाव की प्रक्रिया शुरू होते ही कुछ सर्वेक्षण एजेंसियां सक्रीय हो जाती है।
सर्वेक्षण एजेंसियां चुनाव के दौरान होने वाले प्रचार के आयोजित रैलियों में भीड़ की तादात के आधार पर अपने अपने कयास लगाती है। कुछ एजेंसियां जातिगत समीकरण के आधार पर अटकलें लगती है। हरएक चुनाव में विरोधी लहर (Anti incumbency) यह शब्द गूंजता है।
इस मुद्दे पर मैने अपने मित्र सीतारामजी की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो, सीतारामजी ने प्रक्रिया निम्नानुसार दी।
क्या कोई भी सर्वेक्षण एजेंसी इस मुद्दे पर सर्वेक्षण करती है कि, पूर्व चुनाव में विजय प्राप्त कर सत्तासिन होने वाले दल के द्वारा किए गए वादे पूरे किए हैं?
क्या सर्वेक्षण एजेंसी को सत्तारूढ़ दल से यह पूछने का साहस है कि, महंगाई पर हंगामा खड़ा कर सत्ता प्राप्त होने के बाद महंगाई कम क्यों नहीं हुई।
क्या बेरोजगरों को रोजगार मिला? क्या किसानों की उपज का दुगुना दाम मिला?
क्या देश के सविधान में कहीं बुलडोजर नामक तानाशाही पूर्ण कुसंस्कृति का उल्लेख है?
क्या पूर्व में किए गए वादों को पूरा नहीं कर पाने के बाद उस दल को पुनः जनता से वोट मांगने का नैतिक अधिकार है?
क्या दूसरें राजनैतिक दलों से स्वयं की अलग पहचान बताने बावजूद सत्तर वर्षो के इतिहास को शून्य कहना नैतिक आचरण है?
भ्रष्ट्राचार के चंद मामलों को प्रकाशित प्रसारित कर जनता की गाढ़ी कमाई को विज्ञापनों में फ़जुल खर्च कर वाह वाही लूटना कौनसी नैतिकता है?
चुनाव परिणामों के दूसरें दलों के बिकाऊ निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की गोपनिय तरीके से खरीद फ़रोख्त कर एनकेंनप्रकारेण सत्ता प्राप्त करना क्या पार्टी विथ डिफरेंट की परिभाषा है?
सर्वेक्षण एजेंसियां कभी इस अहम मुद्दे पर सर्वेक्षण करने का साहस करेंगी कि, चुनावों के दौरान प्रचार सामग्री,रैलियों, राजनेताओं और मंत्रियों के आवागमन पर होने वाला बेतहाशा खर्च का स्रोत क्या है?
नशाबंदी के राज्य में मादक पदार्थो का जखीरा कैसे बरामद होता है।
सीतारामजी ने कहा ऐसे अनेक व्यवहारिक और अहम मुद्दे है।
इनका जवाब कौन देगा?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

