-तेजपाल सिह ‘तेज’
जिस भारत ने जयप्रकाश नारायण (जेपी) को देखा है, वह आज के भारत को देखकर सन्न है। वह जेपी जो सत्ता नहीं, लोकनीति के प्रहरी थे। जिनकी पुकार पर विद्यार्थियों ने किताबें रख दीं और सड़कों पर उतर आए। जेपी का वह आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का प्रयास नहीं था, वह लोकतंत्र को बचाने की अंतिम पुकार थी। लेकिन आज जब वही लोकतंत्र एक बार फिर खतरे में है, तो न जेपी हैं, न उनके जैसे कोई जननेता, और न ही वह जनता जो बिना भय, बिना भ्रम सड़कों पर उतरती थी।
“उठो! जवानो, मुट्ठी खोलो, अब जेपी नहीं आएंगे” केवल एक काव्यात्मक भाव नहीं, यह आज के युवा की आत्मा पर लिखा गया आह्वान है। यह उस पीड़ा का बयान है जो चुपचाप ट्विटर और इंस्टाग्राम की दीवारों में सिसक रही है। यह उस देश की पुकार है जहाँ संविधान अब सत्ता के चरणों में रखी मूर्ति बन चुका है।
भारतीय लोकतंत्र के अधोषित अधिनायकवाद की यह कहानी न अचानक शुरू हुई है, न अचानक खत्म होगी। इसकी बुनियाद वर्षों पहले रखी गई, जब बहुमत को “सच” और विपक्ष को “रुकावट” कहकर प्रचारित किया जाने लगा। सत्ता धीरे-धीरे जनता की सेवा से हटकर जनता के नियंत्रण की आकांक्षा में बदलने लगी। सत्ता अब सेवा नहीं, स्वामित्व की भाषा बोलने लगी।
जेपी के समय में भी सत्ता का दमन था, लेकिन विपक्ष जीवंत था। विपक्ष की आवाज़ विश्वविद्यालयों, अख़बारों, लेखकों, शायरों और सबसे बढ़कर, जनता की सांसों में थी। आज का विपक्ष टूटे हुए काँच की तरह है— न तेज़ है, न सम्पूर्ण। केवल चमकता है कुछ जगहों पर, लेकिन हाथ में आता है तो लहूलुहान करता है।
आज युवा बेरोजगारी से जूझ रहा है, लेकिन सरकार की घोषणाओं में ‘अमृत काल’ चल रहा है। विश्वविद्यालयों में पढ़ाई से अधिक वैचारिक पहरेदारी हो रही है। युवाओं की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह रोज़ कुछ खोता है, लेकिन उसे बताया जाता है कि उसने कुछ पाया है। मोबाइल डेटा सस्ता है, पर विचार बहुत महंगे। कोई सोच भी नहीं सकता कि सरकार से सवाल करना भी एक नागरिक धर्म है।
जेपी का आंदोलन बिहार से उठा था— उसी बिहार में आज भी युवाओं की फौज बेरोजगारी की चक्की में पीस रही है। लेकिन आज का आंदोलन क्या केवल यूट्यूब चैनलों, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और ट्रेंडिंग हैशटैग्स तक सिमट कर रह गया है? क्या आज के युवाओं की मुट्ठी सच में बंद है? या उसे बंद कर दिया गया है— लालच, डर, और भ्रम के हथकंडों से? ‘मुट्ठी खोलो’ का आशय केवल क्रांतिकारी मुद्रा नहीं, वह चेतना है कि एक युवा अपनी आवाज़, अपने अधिकारों और अपने भविष्य के लिए उठ खड़ा हो। यह मुट्ठी जब बंद होती है तो दमन का मुक्का बनती है, लेकिन जब खुलती है तो लोकतंत्र का दीपक जला सकती है।
आज ज़रूरत किसी जेपी की नहीं, क्योंकि वह समय और परिस्थितियों में पैदा होते हैं। आज ज़रूरत इस देश के करोड़ों युवाओं में जेपी की चिंगारी खोजने की है। यह कहना सटीक है कि “अब जेपी नहीं आएंगे”, लेकिन यह भी सच है कि “अब जेपी बनना पड़ेगा”। आज सत्ता यह मान चुकी है कि युवाओं की स्मृति बेहद छोटी है, उन्हें चुनाव से पहले कुछ मुफ्त, कुछ ‘देशभक्ति’, और कुछ ‘धार्मिक शोर’ दे दिया जाए तो वे फिर से झुका दिए जाएंगे। यह सत्ता भूल रही है कि कोई भी सत्ता तब तक स्थायी नहीं होती जब तक जनता का विवेक सोया न हो। दुर्भाग्यवश आज का सबसे बड़ा संकट यही है— विवेक का अवसान।
जब एक पूरी पीढ़ी रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विचारों के बजाय इतिहास के झूठे गौरव में जीने लगती है, तो अधिनायकवाद को कोई चुनौती नहीं मिलती। ऐसे में न जेपी आते हैं, न भगत सिंह, न रोहित वेमुला। क्योंकि वे किसी सरकार से नहीं, किसी जनता की पुकार से जन्म लेते हैं। आज विपक्ष इस स्थिति में है कि वह खुद को बचाने में लगा है, जनता को बचाने की सोच भी शायद नहीं पा रहा। अधिकांश विपक्ष सत्तापरस्त पूंजी से संचालित लोकतंत्र का ही एक चरित्र बन चुका है। और जब विपक्ष अपने नैतिक कर्तव्यों से विमुख हो जाए, तब जनता को ही विपक्ष बनना पड़ता है।
“उठो! जवानो, मुट्ठी खोलो…” का अर्थ यही है कि अब संघर्ष किसी और पर टालने की नहीं, उसे अपने भीतर उठाने की घड़ी है। यह आह्वान है, कि जब सरकार सवाल पूछने पर राजद्रोह का आरोप लगाए, तब सवाल पूछने को ही नागरिक धर्म समझा जाए। याद रखिए, इतिहास गवाह है कि जब-जब युवा ने संकल्प लिया है, साम्राज्य झुके हैं, तानाशाह भागे हैं। लेकिन वह संकल्प केवल सोशल मीडिया पर नहीं, सड़कों पर, सोच में, और साहस में उतरता है।
अब जेपी नहीं आएंगे ….कोई गांधी, कोई अंबेडकर, कोई भगत सिंह— अब इतिहास बन चुके हैं। लेकिन अगर आज का युवा चाहे तो इतिहास फिर से लिखा जा सकता है। बस, उठो जवानों मुट्ठी खोलो अब जेपी नहीं आएंगे
यथोक्त के आलोक में अब यह सोचना ही होगा कि भारतीय अधिनायकवाद से लड़ने के लिए कौन सी युक्तियों को काम में लाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष तब अधिनायकवाद (authoritarianism) का संकट खड़ा होता है— जब सरकारें निर्वाचित होकर भी लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलती हैं, विपक्ष को कमजोर किया जाता है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता संकट में होती है, मीडिया की ज़ुबान बंद की जाती है और नागरिकों को भय, भ्रम और धार्मिक उन्माद में उलझाया जाता है— तो ऐसे समय में संविधान, जन-जागरूकता और संगठित प्रतिरोध ही सबसे प्रभावी हथियार बनते हैं। यहाँ नीचे बिंदुवार उन युक्तियों का खुलासा किया जा रहा है जिनके आधार पर अंदोलन के जरिए अधिनायवाद से लड़ा जा सकता है।
अधिनायकवाद से लड़ने की युक्तियाँ (तरीके):
1. संविधान और कानून का विवेकपूर्ण उपयोग
जनता को अपने संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 19, 21) की गहरी समझ होनी चाहिए। जनहित याचिकाएं, RTI, लोक अदालतों और लोकपाल जैसे साधनों का इस्तेमाल करके शासन को जवाबदेह बनाया जा सकता है। अधिनायकवादी शासन अक्सर संविधान को तोड़ने के लिए “लोकतांत्रिक भाषा” का इस्तेमाल करता है— जवाब इसमें है कि हम संविधान को उसकी मूल भावना में समझें और लागू करें।
2. स्वतंत्र, निर्भीक और जनपक्षधर मीडिया का निर्माण एवं सहयोग
वर्तमान में मुख्यधारा मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता का प्रचारक बन चुका है। इसके विकल्प में स्वतंत्र पत्रकारिता (जैसे: द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, ऑल्ट न्यूज़ आदि) को आर्थिक और नैतिक सहयोग ज़रूरी है। साथ ही, सोशल मीडिया को सूचना और जनचेतना का माध्यम बनाकर उपयोग करना, न कि केवल मनोरंजन का।
3. जनजागरण अभियान और वैचारिक प्रशिक्षण
गाँव-गाँव, मोहल्लों, स्कूलों, यूनिवर्सिटियों में संवैधानिक साक्षरता, अंधश्रद्धा विरोध, और तथ्य-आधारित विमर्श पर जनचर्चा शुरू होनी चाहिए। भीम पाठशालाएँ, पीपुल्स यूनिवर्सिटी, जनसंवाद यात्राएँ आदि इसके सफल उदाहरण हो सकते हैं।
4. शिक्षा में वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक सोच का विकास
जब शिक्षा का उद्देश्य केवल ‘नौकरी’ रह जाता है और उससे ‘चिंतन’ निकाल दिया जाता है, तो अधिनायकवाद को सबसे मुफ़ीद नागरिक मिलते हैं। ज़रूरत है कि शिक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक चिंतन और नागरिक शास्त्र को मज़बूती से पढ़ाया जाए। बुद्ध, कबीर, अंबेडकर, पेरियार, भगत सिंह जैसे विमर्श को युवाओं से जोड़ा जाए।
5. संगठित जनआंदोलन और प्रतिरोध की संस्कृति
अधिनायकवाद का सामना केवल चुनाव से नहीं, जनता के सचेत और संगठित प्रतिरोध से होता है। किसान आंदोलन, CAA विरोध, महिला मार्च, दलित आंदोलन, RTI आंदोलनों ने यही दिखाया है। ये आंदोलन विचार और नेतृत्व के स्तर पर सशक्त, अहिंसक और जनभागीदारी पर आधारित होने चाहिए।
6. कमजोर विपक्ष को दबाव में लाने के लिए जनता का वैकल्पिक मंच
जब संसदीय विपक्ष विफल हो जाए, तब जनता को नागरिक समाज, जन मंच, स्टूडेंट यूनियन, नारी और दलित संगठनों के माध्यम से विकल्प खड़ा करना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि हर लड़ाई संसद से लड़ी जाए, कई बार लड़ाई सड़कों, किताबों, गीतों और नाटकों से भी लड़ी जाती है।
7. सोशल मीडिया का जन-जागरूकता के लिए प्रयोग
ट्विटर, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम – इनका इस्तेमाल सूचना, तर्क और विवेक फैलाने के लिए किया जाए। इन्फ्लुएंसर संस्कृति के बजाय जन-विचारक और एक्टिविस्ट संस्कृति को आगे लाया जाए।
8. नफरत के खिलाफ भाईचारे की राजनीति
अधिनायकवादी ताकतें जनता को धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर बाँटती हैं। इस विभाजन को संविधान, मनुष्यता और समानता के भाव से चुनौती दी जा सकती है। “हमें हिंदू नहीं, इंसान बनना है। मुसलमान नहीं, नागरिक बनना है।” — यह धारणा फैलानी होगी।
9. स्वतंत्र न्यायपालिका और संस्थाओं के पक्ष में जनदबाव
जब न्यायपालिका, चुनाव आयोग, विश्वविद्यालय और पुलिस जैसी संस्थाएं सत्ता की कठपुतली बनें, तब जनता को उनके सुधार और स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। जैसे: कॉलेजियम प्रणाली, CBI की स्वतंत्रता, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की स्वायत्तता— इन पर जागरूकता फैलाना जरूरी है।
10. लोक कवि, कलाकार, साहित्यकार और सांस्कृतिक प्रतिरोध
सत्ता चाहे जितनी सख़्त हो, एक ईमानदार कविता, एक सच बोलता नाटक, एक प्रतिबद्ध ग़ज़ल पूरे समाज को झकझोर सकती है। “साहित्य और कला की भूमिका वही है जो युद्ध में एक मशाल की होती है।”
अधिनायकवाद की सबसे बड़ी ताक़त जनता की चुप्पी और युवाओं की निष्क्रियता है। और उसकी सबसे बड़ी हार होती है जब कोई किसान सड़कों पर उतरता है, कोई छात्र सवाल पूछता है, कोई औरत संविधान हाथ में लेकर खड़ी होती है, और जब कोई नागरिक कहता है:
“हमें डर नहीं लगता, हमें लोकतंत्र चाहिए।”
सबसे प्रभावी विरोध आंदोलन कौन से हैं?
भारत के इतिहास और समकालीन परिप्रेक्ष्य में विरोध आंदोलन (Protest Movements) लोकतंत्र की आत्मा रहे हैं। जब-जब संसद और सरकारें जनभावनाओं से कट गईं, तब-तब सड़कों, खेतों, विश्वविद्यालयों और जेलों से लोकतंत्र को पुनर्जीवन मिला। इनमें से कुछ आंदोलन इतिहास बदलने वाले साबित हुए, कुछ ने सत्ता की नींव हिला दी, और कुछ ने लंबे समय बाद बदलाव की दिशा तय की। नीचे सबसे प्रभावी विरोध आंदोलनों की सूची दी जा रही है, उनके प्रभाव और प्रकृति सहित:
1. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857–1947)
प्रकार: उपनिवेशवाद के विरुद्ध सर्वाधिक व्यापक आंदोलन
प्रमुख नेतृत्व: गांधी, नेहरू, पटेल, भगत सिंह, अंबेडकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस
प्रभाव: देश को आज़ादी मिली; जन चेतना और नागरिक अधिकारों की अवधारणा विकसित हुई; सत्याग्रह और असहयोग जैसे हिंसक आंदोलनों ने पूरी निया में नया रास्ता दिखाया
2. डॉ. अंबेडकर का दलित आंदोलन (1920s–1956)
प्रकार: सामाजिक न्याय और जाति-विरोधी संघर्ष
प्रमुख पहल: महाड़ सत्याग्रह, मंदिर प्रवेश आंदोलन, पूना समझौता, धर्म परिवर्तन (1956)
प्रभाव: जाति उत्पीड़न के खिलाफ जनसंगठित आवाज़; भारतीय संविधान में समानता, आरक्षण, मौलिक अधिकार;”दलितों की स्वतंत्र चेतना” का जन्म और राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन की धारा तैयार
3. जेपी आंदोलन (1974–75)
प्रकार: भ्रष्टाचार और तानाशाही के विरुद्ध व्यापक छात्र आंदोलन
प्रमुख नेतृत्व: जयप्रकाश नारायण (जेपी), बिहार के छात्र
प्रभाव: इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ़ जनता में असंतोष; आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार हुई तथा जनता पार्टी का उदय, 1977 में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार
4. मंडल विरोध और समर्थन आंदोलन (1990)
प्रकार: आरक्षण नीति को लेकर सामाजिक उबाल
प्रमुख पहल: वी. पी. सिंह द्वारा मंडल कमीशन लागू करना
प्रभाव: सामाजिक न्याय बनाम सवर्ण असंतोष का खुला टकराव; आरक्षण को राजनीतिक ध्रुवीकरण तथा पिछड़े वर्गों की राजनीति को नई ताकत
5. नर्मदा बचाओ आंदोलन (1985–)
प्रकार: विकास बनाम विस्थापन
नेता: मेधा पाटकर
प्रभाव: लाखों लोगों के विस्थापन पर राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय बहस; पुनर्वास नीति और ‘विकास’ की परिभाषा पर सवाल तथा राज्य की नीतियों के खिलाफ़ जन प्रतिरोध का पर्यावरणीय चेहरा
6. अन्ना हज़ारे का जनलोकपाल आंदोलन (2011)
प्रकार: भ्रष्टाचार के खिलाफ़ शहर-केंद्रित गांधीवादी आंदोलन
प्रमुख नेता: अन्ना हज़ारे, अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव: अराजनीतिक आंदोलन से राजनीतिक विकल्प (AAP) का जन्म; पहली बार सोशल मीडिया आधारित ‘जनक्रांति’ का अनुभव तथा लोकपाल कानून पारित हुआ, परंतु आंदोलन तात्कालिक रहा
7. नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA-NRC) विरोध आंदोलन (2019–20)
प्रकार: संविधान और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी विरोध
प्रमुख स्थल: शाहीन बाग़, जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
नेतृत्व: महिलाएँ, छात्र, बुद्धिजीवी
प्रभाव: भारत में पहली बार मुस्लिम महिलाओं का शांतिपूर्ण, संविधानवादी नेतृत्व; ‘संविधान बचाओ’ आंदोलन का जन्म तथा सत्ता के धार्मिक एजेंडे को चुनौती
8. किसान आंदोलन (2020–2021)
प्रकार: कृषि कानूनों के खिलाफ़ ऐतिहासिक विरोध
प्रमुख संगठन: संयुक्त किसान मोर्चा
प्रभाव: सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े (बिना हिंसा के!); लंबे समय बाद सिख, जाट, दलित किसान संगठनों की एकता एवं किसानों की आर्थिक मांगों के साथ लोकतंत्र की पुनर्रचना
9. भीमा-कोरेगांव आंदोलन और एल्गार परिषद (2018)
प्रकार: दलित-संविधानवादी विरासत का प्रतीक
प्रभाव: दलित चेतना और ब्राह्मणवादी सत्ता के बीच तनाव; सत्ता द्वारा बुद्धिजीवियों को आतंकवादी बताकर गिरफ्तारियाँ (Urban Naxal) और देशभर में असहमति के दमन की शुरुआत का प्रतीक
और भी न जाने , कितने ही आंदोलन रहे हैं, जिनके आधार पर अनेक सफलताए मिली हैं। सबसे प्रभावी आंदोलन वे ही रहे हैं जो जो संगठित थे, जिनकी राजनीतिक दृष्टि साफ़ थी, जो अहिंसक और लंबी लड़ाई के लिए तैयार थे, और जिन्होंने जनता के भीतर चेतना पैदा की।
आज जब लोकतंत्र के सामने अधिनायकवाद खड़ा है, तो इन्हीं आंदोलनों की प्रेरणा से एक नई प्रतिरोध संस्कृति रची जा सकती है—जहाँ जेपी, अंबेडकर, शाहीन बाग़, और किसान सब एक धारा में मिलते हैं।(मदद : chetgpt)
चलते –चलते…
“उठो! जवानो, मुट्ठी खोलो, अब जेपी नहीं आएंगे”
उठो! जवानो, मुट्ठी खोलो, अब जेपी नहीं आएंगे
जो कभी अंधेरे में मशाल थे,वो चेहरे अब न आएंगे
चुप रहने का समय नहीं ये समय है प्रश्न उठाने का,
जो भी खामोश रहेगा, वो गुनहगार कहलाएगा।
तुम्हारी आँखें मोबाइल में हैं, पर देश की आँखें सूखी हैं।
होठों पर है देशभक्ति , पर पेट में तुम्हारे खाली हैं।
कभी कोई जेपी होता था, जो युवाओं से देश माँगता था।
अब सरकार है जो तुमसे, केवल जयकार माँगती है।
“उठो! जवानो, मुट्ठी खोलो, अब जेपी नहीं आएंगे,
जेपी का आवाज तुम्हें अब खुद ही को बनना होगा।

