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हम आदिम युग की तरफ जा रहे हैं

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आरती

हमारे यहाँ संतो की एक परंपरा रही है कि उन्होंने अपने समाज ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को एक समान नजरों से देखा। मनुष्यों के बीच सामंजस्य बनाए रखने के लिए साहित्य लिखा। उपदेश दिया। लोगों के बीच जाकर उनकी खुशहाली के काम करते रहे।

उत्तर मध्यकाल का साहित्य का प्रमाण है। इसे समझने के उदाहरणों को समझने के लिये अधिक पीछे न जाएं, कबीर से ही शुरू करें तो भी कबीर, नानक, दादू, रविदास, तुकाराम, नरसी मेहता, मलूकदास, रज्जब रामदास, सहजोबाई और दयाबाई जैसी अनेक नाम जिन्होंने लोगों को जोड़ने का काम किया। 
यहाँ  तुलसी,  रहीम और मीराबाई के नाम भी गिने जाने चाहिए क्योंकि इन्होंने भले ही कबीर और नानक देव या रैदास की तरह लोगों के बीच में जाकर काम ना किया हो लेकिन उनका साहित्य लोगों में परस्पर विश्वास, प्रेम और सद्भाव जगाने का काम ही करता रहा है। नफरती  आख्यान इनकी रचनाओं की वर्णमालाओं के पास भी नही खटके।
ये संत समाज सुधारक और संत कवि भिन्न-भिन्न समाजों  के बीच फैली मानव विरोधी बुराइयों को खत्म करने के लिए प्रयास करते रहे। लोगों के को प्रेम करना सिखाया।
यह स्मरण इसलिए कि अभी 23 दिसंबर को हरिद्वार में हुए धर्म संसद में तथाकथित संतो को जिस भाषा में बोलते लगभग चिल्लाते, हिंसा के लिए उकसाते सुना। आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि पिछले तीन दशक से गेरुआ वस्त्र धारी तथाकथित साधुओं की भाषा लगभग ऐसी ही हो गई है। लेकिन चिंता है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा?
इतनी नफरत! इतना वैमनस्य! कौन सा फल खिलाएगा? क्या आने वाली पीढ़ियां दंगाइयाँ बनेगीं? हाथ में तलवार लेकर एक दूसरे को काटती फिरेगी?
हम आदिम युग की तरफ जा रहे हैं और यह सब कुछ दिनों में खत्म हो जाने वाला खेल नहीं है। न ही 100 – 200 के लोगों के बीच में घटा हुआ कुछ मिनटों का शब्द  उन्माद है।
यह जहर है और लावा की गति से फैल रहा है।हम सब उसके चपेट में आएंगे ही, आएंगे।
आरती

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