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*हम अग्रसर है जगतगुरु बनने की ओर…..?

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शशिकांत गुप्ते

अपना देश विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है। जो भी गुरु होता है उसे उदारमना होना चाहिए। इस बात को प्रगति ने विकास के घर जाकर सिद्ध कर दिया।कि प्र गति की स्वयं की वास्तविक स्थिति
गीतकार हसरत जयपुरजी लिखित इन पँक्तियो जैसी है, जख्मों से भरा सीना है मेरा,हँसती है मगर ये मस्त नज़र
प्रगति ने विकास के देश में चलने वाली मुद्रा की ना सिर्फ स्तुति की बल्कि वहाँ की मुद्रा को “मजबूत” विशेषण से विभूषित भी कर दिया। यह पहली बार हुआ है। इसलिए प्रशंसनीय है।
विश्वगुरु बनने की प्रक्रिया की शुरुआत में लोग भगवान की प्रतीकात्मक मूर्तियों के सिर्फ दर्शन ही नहीं करंगे। मंदिर परिसर में दर्शनीय दृश्यों का आनंद भी उठाएंगे। एक पंथ अनेक काम, एक तो मंदिर में भगवान के दर्शन करने वाले दर्शनार्थी स्वयं धार्मिक होने का प्रमाण प्राप्त कर लेंगे। दूसरा, मंदिर परिसर में भीक्षा की अभिलाषा में कतारबद्ध खड़े या बैठे हुए भिक्षुकों को भीक्षा देकर पुण्य प्राप्त करेंगे।
तीसरा लाभ, बहुत से लोग अपनी खून पसीने की गाढ़ी कमाई को गुप्त दान के रूप से दान पेटियों में डाल कर अपने पुण्य को द्विगुणित करंगे। इस बात के लिए भी आश्वश्त होना ही चाहिए, मंदिर की दान पेटियों में डाला जाने वाला धन एकदम सफेद ही होगा?
देश में पचपन करोड़ लोगों को छोड़ शेष अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन बांटा गया। इनलोगों को मुफ्तखोरी की आदत न लग जाए, इसलिए अब न्यूनतम मूल्य पर इन्हें राशन मिलेगा। यह गौरव की बात है, कारण यह भी पहली बार हुआ है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 8 नवंबर 2016 के ऐतिहासिक दिन के बाद से देश में सिर्फ और सिर्फ सफेद पैसा ही प्रचलन है।
कोई भी देशवासी जब अपनी जेब में से कोई भी मुद्रा निकालता है, वह मुद्रा देखकर आश्वश्त हो जाता है,यह मुद्रा सफेद ही है।
पहली बार महंगाई की परिभाषा बदल गई है।सिर्फ वस्तुएं महंगी हुई है कीमत नहीं बढ़ी है?
आपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए ना सिर्फ अपराधियों के हौसले पस्त किए जा रहे है,बल्कि उनके घरों पर ‘बे’ कायदा क्षमा करना स्लीप ऑफ टँग हो गया, “बा”कायदा बुलडोजर चलाकर उनके हौसलों को नेस्तनाबूद किया जा रहा है। बुलडोजर के चलाए जाने को भी संस्कृति कहा गया यह गौरव की बात है।
इस विश्व कीर्तिमान को प्राप्त कर हम स्वयं को गौरान्वित समझतें है। सम्भवतः विश्व में अन्य किसी भी देश में बुलडोजर संस्कृति प्रचलन में नहीं आई होगी?
तीज त्यौहार के दिन मोटर कार की बिक्री के आगे बेकारों की गिनती हो नहीं सकती है?
विलासिता की वस्तुओं की बिक्री के कारण देश की आर्थिक स्थिति को कमजोर नहीं कहा जा सकता है?
आगे प्रगति कुछ कहती, इसके पूर्व विकास ने उसे रोका। विकास ने कहा कितनी स्तुति करोगी। रुलाओगी क्या?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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