Site icon अग्नि आलोक

 हम स्त्रीवादी, पुरुषविरोधी नहीं*        

Share

         ~ डॉ. विकास मानव

कुछ पुरुष मित्रों का सवाल सामने आया है : “आपके शब्दशिल्पियों द्वारा स्त्री के हित में, ख़ासकर सेक्स को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है. लेकिन आप दोषी पुरुष को ही क्यों ठहराते हैं, पुरुष होकर भी?”

  हम न तो स्त्रीवादी हैं और न ही पुरुषविरोधी. हमारा लघुता-दीर्घता या किसी वाद से कोई सरोकार नहीं है. हम समता-पसंद हैं. हम ख़ालिस सच लिखते हैं. इसके लिए हम समाज पर उसका क्या असर पड़ेगा, इसकी फ़िक्र नहीं करते. इसलिए की हम समाज के ठेकेदार भी नहीं हैं. हम शून्य हैं. हमें खुद से अटैच कर आप अपना वेलल्यू बढ़ा सकते हैं.

      ज्यादातर पुरुष यह सोच रखते हैं कि, मैं ही सही हूं. किसी की बात क्यों मानूं. जो मैं चाहूं वो ही करूं। ऐसा ही व्यवहार उनका सेक्स एक्शन में भी रहता है। वो जब चाहें सेक्स करें, जैसे चाहें सेक्स करें, जिनसे चाहें सेक्स करें। पार्टनर की कोई राय नहीं, रजामंदी नहीं। अगर पार्टनर को शामिल करना है तो सिर्फ उस बता देना काफी है. उसकी इच्छा अनुसार करने, उसकी पूरी जरूरत जितना करने की सोच नदारात।

ज्यादातर पुरुष यौन सुख के बारे में सोचते और सेक्स एक्टिविटी फटाफट निपटा कर करवट बदल कर सो जाते हैं। ना कोई फोरप्ले, ना उसकी सेवा और ना स्त्री की क्या इच्छा है, उस पर ध्यान देना। उसको कितने सेक्स की जरूरत है, मै उतने के लिए असमर्थ हूँ तो क्यों ना समर्थ बनूं : यह सोचा तक नहीं जाता. बस अपनी हवस का कचरा उसमे उड़ेल देने के लिए थोड़ा सा सेक्स एक्शन किया और फुर्सत पाई।

    फिर भी स्त्री कभी भी कोई शिकवा-शिकायत नहीं करती। ऐसा काम अक्सर पुरुष/पति का रहता है।

हां, अपवाद स्वरूप मित्र और प्रेम भाव   वाला कोई पुरुष पार्टनर है तो वो स्त्री की भावनाओं की कद्र कर, उसे चरमसुख देने के प्रयास में जरूर पाया जाता है।

,साठ के दशक में नसबंदी के फेल करने में भूमिका सिर्फ और सिर्फ पुरुष की ही रही। जबकि कंडोम, गोली और ओप्रेशन की मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराई गई। ज्यादातर पुरुष कंडोम इस्तेमाल में दिलचस्पी नही रखते रहे क्योंकि उन्हें स्किन टू स्किन कोनटेक्ट चाहिए था। जब तक उनके सर पर नहीं पड़े की गर्भ ठहरने की स्थिति हो सकती है।

    गोलियों का यह भ्रम फैला हुआ था कि इससे पीरियड्स में फर्क पड़ता है। पुरुष ने इसको प्रोस्ताहन नहीं दिया. फिर भी कुछ ही स्त्री इसका इस्तेमाल करती थी। वो भी ना के बराबर ही रहा।

   पुरुष नसबंदी सरल रही फिर भी अवधारणा रही कि पुरुष नामर्द और बधिया हो जाता है भारी काम नहीं कर सकता है। सेक्स एक्शन में भी बेकार हो जाता है।  अगर फिर से बच्चे चाहिए तो सब खत्म, इसीलिए पुरुष नसबंदी नहीं कराते रहे।

 स्त्री नसबंदी बहुत कठिन रही. इसमें बच्चेदानी निकालनी पड़ती थी जिसे नलबंदी भी कहते हैं. इसलिए फेल हो गई।

इसके अलावा पुरुष द्वारा दूसरे तरीके भी फेल कर दिये गए या वो कारगर साबित नहीं हुए।

एक अंग्रेजी पुस्तक में पढ़ा हूँ कि तीन तरीके इस्तेमाल बहुत किए जा रहे थे।

पहला विड्रायल प्रेस्टिस यानी सीमेन डिस्चार्ज योनि से बाहर करना। यह हमारे यहां ना के बराबर रहा।

  दूसरा मुखमैथुन यानी सिक्स नाइन प्रेस्टिस,अमल में लाना। यह भी हमारे यहां ना के बराबर रहा।

तीसरा एनल मैथुन या गुदामैथुन का प्रेस्टिस में रहना। यह भी हमारे यहां ना के बराबर रहा। हाँ, यह पुरुष से पुरुष में जरूर रहा।

   गुदा और मुख मैथुन तो स्त्री उसी पुरुष को करने दे सकती जो उसके प्यार से अभिभूत हो, जिससे वह सुपर आर्गेज्म सुख पाती हो.

   पुरुष अपने एटीट्यूड की वजह से कुछ करता ही नहीं। सिर्फ मौज मस्ती मजा के लिए सेक्स अपनाना चाहता है। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है आज के जनसंख्या विस्फोट से।

सारत:

जरूरी नहीं कि मेरी सभी की सभी बातें ठीक लगें। कोई बात ठीक लगे, तो ठीक लगते ही सक्रिय हो जाती है। जो बात न ठीक लगे, वह बात खुद ही समाप्त हो जाती है।

Exit mobile version