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हम सुधरेंगे,युग बदलेगा,”काश”

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शशिकांत गुप्ते

देश-काल और स्थिति के नियमानुसार परिवर्तन अवश्यंभावी है। सामाजिक,आर्थिक,धार्मिक सांस्कृतिक और राजनीति क्षेत्र में समयानुसार परिभाषाएं बदलती है।
प्रख्यात साहित्यकार
स्व.महावीर प्रसाद द्विवेदी जी साहित्य की महत्ता की परिभाषा निम्नानुसार कही है। जो भाषा अपने निज का साहित्य नहीं रखती,वह भाषा रूपवती भिखारिन की तरह समाज में कदापि आदरणीय नहीं होती है
सामाजिक तानाबाना आधुनिकता की छद्म परिभाषा में बदल कर फैशन परस्त हो रहा है,ऐसी स्थिति में रूपवती अभिनेत्री भिखारिन का अभिनय करती है। वह भी बाकायदा अभिनय करने के पूर्व कीमती मानधन प्राप्त करने के इकरारनामे पर हस्ताक्षर करती है। हस्ताक्षर के साथ ही पेशगी रकम भी प्राप्त करती है,इसे ही फिल्मी भाषा में
Signing amount मतलब हस्ताक्षर राशि कहते हैं
फिल्म एक,सांकृतिक मोर्चा है।
दुर्भाग्य से फिल्मों में भारतीय संस्कृति के विपरित दृश्य फिल्माए जातें हैं। एक ओर फिल्म में सत्य,अहिंसा और धर्म का पग पग लगता डेरा
ये भारत देश है मेरा इस तरह फिल्मी गीत लिखा जाता है और उसे गाया और फिल्माया भी जाता है,दूसरी ओर फिल्मों हिंसा की पराकाष्ठा फिल्माई जाती है।
अभिनेत्रियों के Costume मतलब पोशाक देखकर तो सहज ही मुंह से ये उद्गार निकलते हैं।
चलो इसने कुछ तो पहना है
आश्चर्य फिल्म पटकथा लिखने वाले,अभिनय करने वाले कलाकार, गीत लिखने वाले और संवाद लिखने वाले सभी भारतीय होते हैं।
धार्मिक क्षेत्र पर कुछ कहना,बोलना,और लिखना
इनदिनों जोखिम का काम हो गया है?
गांधीजी के अनुयायी सर्वोदय के प्रणेता स्वतंत्रता संग्राम सैनानी आचार्य विनोबा भावे की एक सूक्ति का स्मरण होता है।
विनोबजी ने कहा है। साबुन को कीचड़ से क्या डराना
इस सूक्ति का अर्थ बहुत गहरा, गंभीर और महत्वपूर्ण है।
दुर्भाग्य आज सर्वत्र कीचड़ फैलाने का अभियान अनवर चल रहा है।
नहाने के साबुन का विज्ञापन सिर्फ और सिर्फ अभिनेत्री पर ही फिल्माया जाता है,और कपड़े धोने के साबुन का विज्ञापन देखकर तो आश्चर्य होता है।
नन्हे मुन्ने बालकों का कीचड़ में खेलने का दृश्य और किसी खाद्य पदार्थ का कपड़ों पर जानबूझ कर गिरना और बच्चों की मम्मियों का मुस्कराते हुए संवाद बोलना कोई बात नहीं, अमुक साबुन से सब धूल जाएगा।
उक्त विज्ञापन से समाज में यह संदेश जाता है कि,साबुन गंदे कपड़े साफ नहीं करता बल्कि जानबूझ कर गंदे किए गए कपड़े साफ करता है।
कपड़े धोने के साबुन के साथ वाशिंग मशीन का भी स्मरण होना जरूरी है, पिछले एक दशक से एक अदृश्य वाशिंग मशीन का भी अविष्कार हुआ है,यह वह सब कुछ धो देती है,जो भ्रष्ट आचरण की परिभाषा में आता है?
उक्त मुद्दों पर गीतकार गुलजार रचित गीत का स्मरण होता है।
हर सीधे रस्ते की एक टेढ़ी चाल है
अरे सब गोल माला है भाई सब गोल माला है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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