शैलेन्द्र चौहान
नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में अमेरिकी उपविदेश मंत्री लैंडाउ ने कहा, ‘हम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बेहद उत्साहित हैं, जो अब लगभग अंतिम चरण में है. हमें लगता है कि यह लगभग असीम संभावनाओं को खोलने का आधार बन सकता है. लेकिन भारत को समझना चाहिए कि हम भारत के साथ वही गलतियां नहीं करेंगे जो 20 साल पहले चीन के साथ की थीं.’
उस समय अमेरिका ने चीन को बहुत फायदा दिया, जिससे चीन तेजी से बड़ा हो गया और अब अमेरिका को चुनौती दे रहा है. लैंडाउ ने आगे कहा, ‘हम भारत को इतना बड़ा बाजार नहीं देंगे कि आप आगे चलकर कई बिजनेस में हमें ही पीछे छोड़ दें. हम ऐसा नहीं होने देंगे.’
रिचर्ड वर्मा लैंडाउ का बयान केवल एक सामान्य व्यापारिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि समकालीन वैश्विक कूटनीति में अमेरिकी रणनीतिक सोच की एक स्पष्ट झलक प्रस्तुत करता है। उनके कथन—कि अमेरिका भारत के साथ वह “गलती” नहीं दोहराएगा जो उसने 20 वर्ष पहले चीन के साथ की थी—वास्तव में विश्व अर्थव्यवस्था और शक्ति संतुलन के बदलते समीकरणों को उजागर करता है।
पहली बात यह है कि यह वक्तव्य अमेरिका की उस मानसिकता को दर्शाता है जिसमें वह आर्थिक साझेदारी को भी शक्ति-राजनीति (power politics) के चश्मे से देखता है। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में अमेरिका और पश्चिमी देशों ने वैश्विक बाज़ार में चीन के प्रवेश—विशेषकर विश्व व्यापार संगठन में उसके शामिल होने—का समर्थन किया। उस समय उम्मीद थी कि आर्थिक उदारीकरण से चीन राजनीतिक रूप से भी उदार होगा और वैश्विक व्यवस्था में “सहयोगी” बनेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। चीन ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था का लाभ उठाकर अपने औद्योगिक और तकनीकी ढाँचे को अत्यंत तेजी से मजबूत किया और आज वह अमेरिका की प्रमुख आर्थिक-सामरिक चुनौती बन चुका है।
यही ऐतिहासिक अनुभव अब अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए एक सबक बन गया है। इसलिए जब भारत के साथ व्यापार समझौते की बात होती है, तो अमेरिकी दृष्टिकोण केवल सहयोग का नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करने का भी होता है। लैंडाउ का यह कहना कि अमेरिका भारत को इतना बड़ा बाज़ार नहीं देगा कि वह आगे चलकर अमेरिकी कंपनियों को पीछे छोड़ दे—दरअसल “नियंत्रित साझेदारी” (controlled partnership) की नीति का संकेत है। इसका अर्थ है कि अमेरिका भारत को अपने रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है, लेकिन आर्थिक प्रतिस्पर्धी बनने की सीमा तक नहीं।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह बयान वैश्विक शक्ति-राजनीति के यथार्थ को भी सामने लाता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मित्रता अक्सर स्थायी नहीं होती; स्थायी होते हैं केवल राष्ट्रीय हित। अमेरिका की नज़र में भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार है, विशेषकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए। इसी संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप से निकटता रखने वाले सर्जियो गोर को भारत में राजदूत बनाना भी संकेत देता है कि वाशिंगटन नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावी और रणनीतिक बनाना चाहता है।
तीसरा आयाम भारत के लिए निहितार्थों का है। यह बयान भारत को यह याद दिलाता है कि वैश्विक कूटनीति में भावनात्मक मित्रता नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन और हितों का खेल चलता है। यदि अमेरिका भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को अपनी प्रतिस्पर्धात्मक सीमाओं के भीतर रखना चाहता है, तो भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी आर्थिक और तकनीकी क्षमताओं को स्वतंत्र रूप से विकसित करे, न कि केवल किसी एक वैश्विक शक्ति के बाज़ार या तकनीक पर निर्भर रहे।
अंततः, लैंडाउ का वक्तव्य एक प्रकार से स्पष्टवादी कूटनीति का उदाहरण है। यह बयान यह भी बताता है कि आने वाले समय में भारत-अमेरिका संबंध सहयोग और प्रतिस्पर्धा—दोनों के मिश्रण से निर्मित होंगे। भारत के लिए वास्तविक कूटनीतिक संतुलन यही होगा कि वह अमेरिका के साथ साझेदारी बनाए रखते हुए अपनी आर्थिक स्वायत्तता और रणनीतिक स्वतंत्रता को भी सुरक्षित रखे।
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