
निर्मल कुमार शर्मा
अंतरिक्ष के आंगन में हमारा सौरमंडल और अधिक विस्तृत फलक में कहें तो हमारा पूरा ब्रह्माण्ड बहुत से आश्चर्यचकित कर देने वाले नजारों,पिंडों,तुच्छ ग्रहों,ग्रहों,उपग्रहों,तारों, ब्लैकहोल्स,निहारिकाओं आदि से भरा पड़ा है ! हमारे सौरमंडल में ही सूर्य की परिक्रमा कर रहे शनि नामक ग्रह के अति खूबसूरत वलय हमारी पूरी आकाशगंगा का एक अद्भुत,अद्वितीय, अतुलनीय आकाशीय संरचना है ! हमारे सौरमंडल में ही लगभग सभी गैस से बने अतिविशाल ग्रहों के अपने वलय हैं,लेकिन शनि के वलयों की खूबसूरती सबसे अप्रतिम और बेहद शानदार है,शनि के वलय सबसे स्पष्ट,चमकदार,जटिल और अद्भुत वलय हैं। शनि के चारों तरफ बने वलय इतने शाही और शानदार है कि शनि को सौर मंडल का आभूषण धारी ग्रह भी माना जाता है !
अभी कुछ दिनों पूर्व खगोल वैज्ञानिकों ने लाखों प्रकाश वर्ष दूर एक ऐसे तारे की खोज किए थे,जो पूरा का पूरा तारा ही बेशकीमती हीरे से निर्मित है ! ऐसे ब्लैकहोल्स की खोज हो चुकी है,जो अपनी पूरी निहारिका को ही निगलने को तैयार हैं !
इसी क्रम में अंतरिक्ष में एक ऐसी अद्भुत आकाशीय संरचना दिखाई देती है,जिसे धूमकेतु या पुच्छल तारा या Comet कहते हैं ! धूमकेतु आकाश में सबसे शानदार वस्तुओं में से एक हैं, उनके चमकीले चमकते कोमा और उनके लंबे धूल से बनी आयनित पूंछ होती है। धूमकेतु किसी भी दिशा से अचानक ही प्रकट हो सकते हैं,जो रात्रि में दृश्यमान लाखों ग्रहों और तारों के बीच एक बहुत ही शानदार और दिलकश नज़ारा प्रस्तुत करते हैं ! वे आकाश में कई महीनों तक के लिए एक शानदार और हमेशा अपनी स्थिति बदलते रहनेवाला अतुलनीय नजारा दर्शित कर सकते हैं क्योंकि धूमकेतु सूर्य के चारों ओर अपनी अत्यधिक विलक्षण और अजीबोगरीब कक्षाओं में घूमते रहते हैं !
धूमकेतु एक सौरमण्डलीय संरचना है जो पत्थर,धूल,बर्फ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे पिंड होते हैं। ये भी सौरमंडल के अन्य सभी ग्रहों की तरह सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं। छोटे पथ में परिक्रमा करने वाले धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा एक अण्डाकार पथ में करते हैं,ऐसे धूमकेतु अपनी परिक्रमा पूरी करने में 6 से 200वर्ष तक लगा देते हैं ! लेकिन अत्यंत विस्तृत पथ वाले धूमकेतु सूर्य की एक परिक्रमा करने में हजारों वर्ष तक लगा देते हैं !
धूमकेतु भी एक ऐसे विशेष आकाशीय पिण्ड है जिनका केन्द्रीय भाग ठोस होता है और बाहरी भाग अत्यंत ठंडी जमी हुई गैंसों जैसे अमोनिया,मिथेन और जल वाष्प आदि से बना होता है। अधिकांश धूमकेतु अपने परिक्रमण काल का ज्यादेतर समय सूर्य से बहुत दूर रहते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं !
अधिकांश धूमकेतुओं की सौरमंडल में स्थिति
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अधिकांश धूमकेतुओं का द्रव्यमान बहुत ही कम होता है। इनका द्रव्यमान इतना कम होता है कि वह हमारी धरती के द्रव्यमान का एक अरब वाँ भाग तक भी हो सकता है ! खगोल वैज्ञानिकों द्वारा आज के आधुनिकतम् उपकरणों की मदद से अब तक लगभग 1000 धूमकेतुओ को देखा जा चुका है ! वैज्ञानिकों का कहना है कि सौरमंडल और पूरे ब्रह्माण्ड में धूमकेतुओं की संख्या 100 अरब से भी ज्यादा हो सकती है। अधिकांश धूमकेतुओं की कक्षाएं हमारे सौरमंडल के सबसे बाहरी ग्रह की कक्षा के भी बाहर है ! उदाहरणार्थ वरुण ग्रह हमारे सौर मण्डल में सूर्य से दूरी के क्रम में ज्ञात आठवाँ दूरस्थ ग्रह है,जो सूर्य से 4अरब 49करोड़ 50लाख किलोमीटर दूर है,इस हिसाब से अधिकांश धूमकेतुओं के परिक्रमा पथ हमारे सूर्य से लगभग 5अरब किलोमीटर के बाहर ही हैं ! धूमकेतु बहुल इस अंतरीक्षीय क्षेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ऊर्ट क्लाउड या Oort Cloud कहते हैं। इतनी असीमित दूरी की वजह से ये धूमकेतु सामान्यत : हमारी धरती पर से नंगी आंखों से या सामान्य दूरबीन से भी देखे ही नहीं जा सकते हैं !
धूमकेतुओं की पूंछ कैसे बनती है ?
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एक वैज्ञानिक तथ्य यह है कि जब वे सूर्य से बहुत अधिक दूरी पर होते हैं,तब इनकी पूंछ विलुप्त हो जाती है, इस स्थिति में ये आंखों तथा दूरदर्शी यंत्रों की नजर से भी अदृश्य हो जाते हैं ! लेकिन जब ये सूर्य के निकट आते हैं तब सूर्य के भीषण तापमान की वजह से इन पर उपस्थित पदार्थ वाष्पीकृत होने लगता है। तब यही वाष्पित पदार्थ सूर्य से परे धूमकेतु की पूंछ के रूप में दिखाई देने लगता है ! जैसै-जैसे इनकी सूर्य से निकटता बढ़ती है,इनके पदार्थ का वाष्पीकरण उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है। फलस्वरूप इनकी पूँछ की लम्बाई भी बढ़ती चली जाती है। इस पूँछ के कारण ही धूमकेतु पुच्छल तारे कहलाते हैं ! अधिकांश धूमकेतु हमें तभी दिखाई देते हैं,जब वे सूर्य के निकट होते हैं,क्योंकि इस स्थिति में वे हमारी धरती के भी सर्वाधिक निकट होते हैं। तभी ये सबसे लम्बी पूंछ वाले भी रहते हैं,वैज्ञानिकों के अनुसार धुमकेतुओं की पूंछ अरबों किलोमीटर तक लम्बी हो सकती है !
धूमकेतु सौरमंडल के आदिम पदार्थों से बने पिंड हैं !
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आधुनिक खगोल और भौतिक तथा रासायनिक वैज्ञानिकों के अनुसार धूमकेतुओं का निर्माण प्रारम्भिक सौर मंडल के निर्माण से बचे हुए आदिम पदार्थों से बना हुआ है ! क्योंकि इस सौरमंडल के सूर्य सहित सभी ग्रहों का निर्माण भी आदिम अवस्था में आकाश गंगा नामक निहारिका में उपस्थित धूल और गैस से ही हुआ है, धूमकेतुओं का निर्माण भी उसी धूल और गैस से हुआ है ! इसीलिए वैज्ञानिकों के लिए धूमकेतु सौरमंडल की आदिम अवस्था के अध्ययन के लिए एक सबसे बेहतर नमूने हैं ! ये एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं,क्योंकि धूमकेतुओं में उपस्थित पदार्थों के गहन रासायनिक विश्लेषण से इस बात की बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं कि हमारे सौरमंडल बनने के समय उस समय कौन-कौन से मूल पदार्थ रहे थे !
चूंकि धूमकेतु सौर निहारिका के बाहरी क्षेत्रों में बनते हैं जहाँ का तापमान वाष्पशील बर्फ को संघनित करने के लिए पर्याप्त ठंडा है। धूमकेतुओं की कक्षा बृहस्पति ग्रह की कक्षा से भी दूर है, इसलिए वे सौर मंडल में बड़े पिंडों को पिघलाने या बदलने वाली कुछ संशोधित प्रक्रियाओं से अवश्य गुजरे होंगे। इस प्रकार वे प्राथमिक सौर निहारिका और ग्रह प्रणालियों के निर्माण में शामिल प्रक्रियाओं का एक भौतिक और रासायनिक रिकॉर्ड बनाए रखे हो सकते हैं !
इस धरती पर जीवन धूमकेतुओं के द्वारा ही लाई गई है !
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वैज्ञानिकों ने धूमकेतुओं के टुकड़ों के अध्य्यन से पाया है कि इनमें हाईड्रोकार्बन यौगिक भी मौजूद हैं। ये वही केमिकल होते हैं जो जीवन का आधार माने जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के एक विश्वविद्यालय मिनेसेटा के शोध वैज्ञानिकों ने एक शोध से यह निष्कर्ष निकाला है कि सौरमंडल बनने के शुरूआती दिनों में हमारी पृथ्वी और मंगल पर एक धूमकेतु जीवन की सारी परिस्थितियों को लेकर आया ! हाल ही में हुए बहुत से वैज्ञानिक शोधों ने इस धारणा को बहुत मजबूत किया है कि हमारी धरती पर जीवन की शुरुआत किसी धूमकेतु से लाए गए जीवन के परमावश्यक तत्व के इस धरती पर आने के बाद ही शुरू हुआ है ! वैज्ञानिकों के अनुसार अत्यधिक गर्म चट्टानों पर पानी गिरने से दोनों के बीच रासायनिक क्रिया हुई और एक जटिल कार्बनिक अणु का निर्माण हुआ ! इस खोज के लिए शोधकर्ताओं ने उस विशेष घाटी के तत्वों को लेकर उसके रासायनिक व कार्बन समस्थानिक का गहन अध्ययन किया।
धूमकेतुओं की आंतरिक संरचना
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धूमकेतुओं के पांच भाग होते हैं। प्रथम मुख्य भाग जिसे नाभिक या Nucleus कहते हैं यह एक ठोस पिंड होता है,यह भाग धूमकेतु का मुख्य भाग होता हैं,यह आमतौर पर कुछ किलोमीटर व्यास तक का बना होता है,इसकी रचना बर्फ,गैस,सिलिकेट और कार्बनिक धूल कणों के मिश्रण से बनी होती है । दूसरा हाइड्रोजन के बादल होते हैं,तीसरा धूल का गुब्बार,चौथा कोमा जो पानी,कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरे गैसों के मिश्रण से बने घने बादलों के समूह होते हैं,कोमा नाभिक के चारों ओर स्वतंत्र रूप से भागने वाला वातावरण है जो तब बनता है जब धूमकेतु सूर्य के करीब आता है और वाष्पशील बर्फ अपने साथ धूल के कणों को ले जाती है और पांचवां आयन टेल + डस्ट टेल अर्थात पूंछ जो सूर्य के संपर्क में आने पर ही निर्मित होती है। एक लंबी घुमावदार पूंछ बनाने के लिए सौर विकिरण दबाव जो आमतौर पर सफेद या पीले रंग का होता है। कोमा में वाष्पशील गैसों से आयन टेल बनते हैं, जब वे सूर्य से पराबैंगनी फोटोन द्वारा आयनित होते हैं और सौर हवा द्वारा उड़ा दिए जाते हैं । आयन टेल्स सूर्य से लगभग बिल्कुल दूर इंगित करते हैं और CO + आयनों की उपस्थिति के कारण ये खूबसूरत नीले रंग में चमकते हैं ।
डायनोसोरों का सर्वनाश करनेवाला एक धूमकेतु ही था !
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भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व इस धरती के सबसे दैत्याकार छिपकलियों जिन्हें डायनासोर कह देते हैं उनके समेत इस धरती के 70 प्रतिशत अन्य स्तनधारी जीव-जंतुओं का सर्वनाश करने वाला आकाशीय पिंड उल्का पिंड नहीं अपितु एक बड़ा धूमकेतु ही था ! उसने धरती से तीव्र गति से टकराकर उस समय के सभी भूमि की सतह पर रहनेवाले और विशालकाय डायनोसोर सरीखे जीव जंतुओं का सफाया कर दिया था !
कुछ प्रसिद्ध धूमकेतुओं का क्रमबद्ध विवरण
1-हैली धूमकेतु Halley’s Comet- इस सुप्रसिद्ध धूमकेतु को सुविख्यात ब्रिटिश खगोलशास्त्री एडमंड हेली ने सन 1682 में खोजा था और उन्होंने अपने जीवन काल में ही सटीक गणना करके इसके वर्ष 1752 में दिखाई दिए जाने की भविष्यवाणी भी कर दी थी,हेली का धूमकेतु 75 साल में एक बार दिखाई देता है आखिरी बार यह सन 1986 में दिखाई दिया था ।
2- शोमेकर लेवी – Shoemaker Levy
Comet – यह धूमकेतु वर्ष 1992 में वृहस्पति ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर उस पर गिरकर उससे टकराकर 21टुकड़ों में बिखरकर नष्ट हो गया था !
3- हयाकुताके धूमकेतु Hyakutake Comet – यह धूमकेतु सन 1996 में पृथ्वी के पास से गुजरा था इस धूमकेतु की बहुत धुंधली पूंछ थी, इस धूमकेतु का परिक्रमा कल 9000 साल का होता है, इस धूमकेतु ने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया था क्योंकि इसमें से एक्सरे किरणें निकलती हुई दिखाई दीं थीं !
4- हेल बोप्प धूमकेतु Hale Bopp Comet – यह धूमकेतु वर्ष 1997 में पृथ्वी से दिखाई दिया, यह 4000 वर्षों में एक बार दिखाई देता है ! यह धूमकेतु हेली के धूमकेतु से भी अधिक चमकीला दिखनेवाला धूमकेतु है !
5-बोरेल्ली धूमकेतु Borrelly Comet –
हेली धूमकेतु के 12 वर्ष बाद नासा के वैज्ञानिकों ने Borrelly धूमकेतु का गहन अध्ययन किया,नासा ने अपना अंतरिक्ष यान डीप स्पेस 9 को इस धूमकेतु के पास भेजा था !
6- इन्के धूमकेतु Encke Comet – इसकी खोज वर्ष 1819 में जर्मन खगोल शास्त्री जोहान फ्रैंज इन्के Johann Franz Encke ने की थी इस धूमकेतु की वजह से ही हर वर्ष अक्टूबर और नवंबर के महीने में टोरिड उल्का बौछार या Taurid Meteor Shower दिखाई देते हैं !
7- टेम्पल टटल धूमकेतु Tempel-Tuttel Comet – इस धूमकेतु द्वारा छोड़े गए कणों से भी हमें प्रतिवर्ष टोरिड उल्का बौछार या Taurid Meteor Showers दिखाई देते हैं, वास्तविक में ये उल्का छोटे-छोटे धूल के कण होते हैं जो कि पृथ्वी के वायुमंडल में आकर जलते हैं और हमें टूटते हुए तारों के रूप में दिखाई देते हैं !
8- वाइल्ड -2 धूमकेतु Wild-2 Comet –
इस धूमकेतु का अध्यन नासा के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2004 में किया था,नासा का एक अंतरिक्ष यान इस धूमकेतु से सिर्फ 236 किलोमीटर की दूरी से गुजरा था तथा इस धूमकेतु के कई बेहतरीन तस्वीरों को खींचकर उसे पृथ्वी पर भेजा था, इस अंतरिक्ष यान ने पहली बार किसी धूमकेतु के धूल कणों के नमूने इकट्ठे किए थे !
9 -टेंपल- 1धूमकेतु Tempel-1 Comet – वर्ष 2005 के एक जुलाई को नासा के डीप इंपैक्ट अंतरिक्ष यान ने टेंपल -1 नामक इस धूमकेतु पर एक वाशिंग मशीन के आकार का एक गोला जो कि इस धूमकेतु की सतह से 37000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जा टकराया था,छोड़ा था,इस जोरदार टक्कर से इस धूमकेतु पर एक फुटबॉल के मैदान जितना बड़ा एक क्रेटर बन गया था !
10-चुर्युमोव गेरासिमेन्को धूमकेतु Churyumov-Gerasimenko Comet –
यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने अपना प्रसिद्ध Rosetta Space Probe नामक अंतरिक्ष यान को इस धूमकेतु की सतह पर उतारा है, इस धूमकेतु की लंबाई 5 किलोमीटर है तथा यह सूर्य की एक परिक्रमा लगभग साढे 6 वर्षों में करता है !
अभी तक का सबसे बड़ा धूमकेतु !
अभी हाल ही में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अब तक के सबसे बड़े धूमकेतु का पता लगाया है, खगोल वैज्ञानिकों ने इस धूमकेतु का नाम C/2014 UN271 रखा है वैज्ञानिकों द्वारा यह धूमकेतु सबसे पहले 2010में भी देखा गया था। उस समय यह सूर्य से 4.82 अरब किमी की दूरी पर था और सौर मंडल के किनारे से अपने केंद्र की ओर लौट रहा था। इसका द्रव्यमान अन्य धूमकेतुओं की तुलना में 100,000 गुना बड़ा है जो इस तरह के धूमकेतु आमतौर पर सूर्य के करीब पाए जाते हैं।
अब तक का सबसे बड़ा यह धूमकेतु 35,405 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी की तरफ बढ़ रहा है। इस धूमकेतु का द्रव्यमान करीब 500 ट्रिलियन टन है और इसका बर्फीला नाभिक 128 किमी चौड़ा है जो अन्य ज्ञात धूमकेतुओं के केंद्रों से 50 गुना बड़ा है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी के अनुसार हमारी धरती के लोगों को इस धूमकेतु से घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह सूर्य से करीब 1.60 अरब किमी से अधिक नजदीक आकर पुनः अंतरिक्ष की असीम गहराइयों में अंतर्धान हो आएगा।
इस विशाल धूमकेतु को हबल टेलीस्कोप ने ढूंढा !
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अंतरिक्ष की अंतहीन गहराइयों में हबल जैसे शक्तिशाली टेलिस्कोप द्वारा नजर गड़ाए रखनेवाले वैज्ञानिक तभी से इसकी निगरानी कर रहे हैं। उनका मानना है कि 2031में इसकी यात्रा हमसे शनि जितनी दूर स्थित एक बिंदु पर जाकर खत्म हो जाएगी ! इस पर नजर रखने वाले वैज्ञानिक जानते थे कि यह विशाल कॉमेट है लेकिन इसके विशालकाय आकार का अनुमान हबल स्पेस टेलिस्कोप द्वारा ली गई तस्वीरों से लगा है। धूमकेतुओं के आकार का पता लगाना बेहद मुश्किलभरा काम होता है क्योंकि इनके चारों ओर धूल के ढेर सारे कण होते हैं जिसके चलते इन्हें देख पाना बेहद मुश्किल काम होता है ! लेकिन धूमकेतु के केंद्र में चमकीले बिंदु को गौर से देखने पर और कंप्यूटर मॉडल्स का इस्तेमाल करके वैज्ञानिकों ने इसका पता लगा लिया है। यह कॉमेट अरबों साल पुराना है और हमारे सौर मंडल के शुरुआती दिनों का अवशेष है !
-निर्मल कुमार शर्मा ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक,सामाजिक, राजनैतिक,पर्यावरण आदि विषयों पर स्वतंत्र, निष्पक्ष,बेखौफ, आमजनहितैषी,न्यायोचित व समसामयिक लेखन,संपर्क-9910629632, ईमेल – nirmalkumarsharma3@gmail.com
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