पुष्पा गुप्ता
_प्रतिपक्ष से ऐसी उम्मीद नहीं दिखती कि वह कोई बड़ी सफलता हासिल कर पाएगा. प्रतिपक्ष जितना लुंज -पुंज है उतना कभी नहीं था. मुख्य प्रतिपक्षी राजनीतिक दल कांग्रेस है. यह बाह्य से अधिक अंदरूनी लड़ाइयों में उलझा हुआ है. रोज किसी न किसी के बाहर जाने का सिलसिला लगा हुआ है. नेतृत्व और संघटन दोनों स्तर पर पार्टी प्रथमदृष्टया कमजोर दिख रही है._
राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकलने वाले हैं,लेकिन जनता से संवाद करने के लिए इनके पास क्या है, यह स्पष्ट नहीं है. आज़ादी के संघर्ष के दौरान जब जवाहरलाल नेहरू ऐसी यात्राओं पर निकलते थे तब उनके पास बात करने केलिए बहुत कुछ होता था.
_उनके पास एक इतिहास- दृष्टि थी, समकालीन विश्व -राजनीति की गहरी समझ थी. कहीं पर वह लोगों को भारत माता के अर्थ समझा रहे होते थे, कहीं यूरोप में उठ रहे फासिज़्म के खतरों और अपने मुल्क पर उसकी परछाइयों की बात कर होते थे. जब वह पुरानी दुनिया और उसकी समझ से नौजवानों को बाहर निकलने का आह्वान करते थे तब उनकी बातें युवा पीढ़ी को आकर्षित करती थी. उनकी हिंदुस्तानी जुबान में एक राग होता था._
वह सभ्यता के शिखर से अपने मुल्क का भविष्य देखते थे. उनका भारत उनकी रगों में दौड़ रहा होता था. अपनी लगन और मिहनत से उन्होंने अपने इस भारत को हासिल किया था. उनके लिए भारत नदियों और पहाड़ों का एक भूगोल नहीं, देश के लोग थे. ख़ास कर नौजवानों से उन्हें बहुत उम्मीद होती थी कि वह खुद भी बदल सकते हैं और मुल्क को भी बदल सकते हैं.
_वह यूँ ही युवा ह्रदय सम्राट नहीं हो गए थे. उन्ही के शब्दों में ” धनी पिता का बिगड़ैल -सा बच्चा ” ,जिसने यूरोप में पढाई पूरी की थी, आमजनों के साथ घुलमिल कर उनकी धड़कन बन गया था. नौ साल तक जेलों में रह कर उनका एक अलग व्यक्तित्व बना था._
मैं नहीं कहती कि राहुल उन जैसा हो जावें. यह शायद संभव नहीं है. लेकिन उनसे कुछ सीखना तो पड़ेगा. एक भारत यात्रा चंद्रशेखर ने भी की थी 1980 के दशक में. राहुल गांधी को उनसे भी सीखना चाहिए.
_लेकिन इन सबके पहले उन्हें अपनी कार्य और जीवनशैली बदलनी पड़ेगी. एक जनमित्र व्यक्तित्व; जैसा एक राजनेता का होना चाहिए ,का अभाव उन तमाम नेताओं में देखने को मिलता है जिन्होंने राजनीति विरासत में हासिल की है. क्षेत्रीय दल के नेताओं के ऐसे आचरण का बहुत उल्लेख नहीं होता, राहुल का होता है, क्योंकि वह एक राष्ट्रीय दल का नेतृत्व कर रहे हैं._
इस आलोचना को उन्हें इस भाव से लेना चाहिए कि लोग उनसे बेहतर की उम्मीद कर रहे हैं.
इस बात में सच्चाई है कि कोई सशक्त प्रतिपक्ष 2024 के चुनाव में कांग्रेस को दरकिनार कर नहीं बन सकता. लेकिन कांग्रेस की समस्याओं का निराकरण दूसरे दल नहीं करेंगे. उसे खुद करना होगा.इसके लिए आवश्यक यह है कि कांग्रेस अपनी कमजोरियों का आकलन विरोध पक्ष की खामियां ढूंढने के पहले करे.
_उसे विपक्षी एकता जैसी बातों में नहीं उलझ कर कांग्रेस की एकता विकसित कैसे हो इसकी चिंता करनी चाहिए. देश में कई कांग्रेस काम कर रही हैं. सब इसी कांग्रेस से निकली हैं . ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस , जगन मोहन रेड्डी की वाई एस आर कांग्रेस के साथ सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस को सबसे पहले एकजुटता दिखानी होगी._
ये सब यदि एकजुट होकर एक पार्टी बन गई तब कांग्रेस में एक नई जान आ जाएगी. इससे कांग्रेस का नेतृत्व संकट भी दूर हो जाएगा और वहां दल का आंतरिक जनतंत्र भी विकसित होने लगेगा जो अभी पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है.
कांग्रेस यदि एकजुट हुई तो इसका सबसे अधिक प्रभाव समाजवादी विरासत की उन क्षेत्रीय पार्टियों पर होगा जो परिवारवाद की व्याधि से ग्रस्त हैं. बहुत संभव है इन पार्टियों में भी एकजुटता की बात उठे .
_इन दलों में राजनीतिक विद्रोह इसलिए नहीं उठेगा कि दलबदल कानून का प्रावधान है . इसी कानून के कारण इन पार्टियों में सुप्रीमोवाद विकसित हुआ. फिर इस सुप्रीमोवाद की गोद में परिवारवाद विकसित हो गया. इन सब के कारण इन दलों का आंतरिक लोकतंत्र मृतप्राय है. इसके फलस्वरूप इनका आकर्षण समाप्त हो चुका है._
भाजपा के लगातार विकसित होने का एक बड़ा कारण समाजवादी दलों का नैतिक पतन और लगातार का बिखराव है. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कम्युनिस्टों ने अपनी वैश्विक अपील खो दी है और बदली हुई परिस्थितियों में भारत में भी वह लगातार सिमटते जा रहे हैं.
कुल मिला कर कहने का आशय यह कि कांग्रेस के आत्मसुधार का सकारात्मक प्रभाव दूसरे इलाकाई दलों पर पड़ेगा और यह व्यापक राजनीतिक सुधार यदि हुआ तब भाजपा की मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी.
_यह तथ्य भी हमें कबूल करना होगा कि भारत जैसे विशाल देश में बिना नैतिक आभा अथवा शक्ति के कोई नायकत्व हासिल नहीं कर सकता. ताल-तिकड़म से कोई दो चार महीने केलिए सत्ता तो हासिल कर सकता है,टिक नहीं सकता_.
मैं नहीं समझती विपक्ष के पास ऐसा कोई नेता फिलहाल उपलब्ध है. प्रधानमंत्री मोदी यदि आज सब पर भारी पड़ रहे हैं,तो इसलिए कि उनकी नैतिक सत्ता फिलहाल विपक्ष के नेताओं से अधिक मजबूत है.
_अब जबकि लोकसभा चुनाव में कुल जमा बीस महीने की देर है, उन्हें एक ही चीज मुश्किल में डाल सकती है, वह है उन पर या उनकी पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप._
राजीव गांधी के शासन काल में सब कुछ ठीक चल रहा था. अचानक से बोफोर्स मामला उठा और राजीव बदनाम हो गए. बोफोर्स उन्हें ले डूबा. अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में भी ऐसा ही हुआ. 2004 की हार केलिए प्रायः लोग गोधरा के सांप्रदायिक दंगे को जिम्मेद्दार मानते हैं.
_लेकिन मुझे उस हार के लिए उससे अधिक जिम्मेद्दार भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण द्वारा लिया गया वह एक लाख रूपया था,जिसे तहलका ऑपरेशन के तहत घूस रूप में दिया जा रहा था._
भारतीय जनता को भ्रष्टाचार का मुद्दा तुरंत प्रभावित करता है. उसे दागदार नायक बिकुल पसंद नहीं होता. यदि भाजपा और उसके नेता भ्रष्टाचार मामले से विरत रहे ,तो प्रतिपक्ष केलिए उसे आगामी चुनाव में पराजित करना मुश्किल होगा. विपक्ष को अपनी सफलता केलिए जोड़तोड़ की राजनीति से अधिक जरूरी अपनी राजनीति के बीच नैतिक सत्ता की उपस्थिति विकसित करना है.
_बीस महीने बहुत होते हैं. राजनीति तो बीस रोज में भी संघनित होती है,जैसे 1977 में हुई थी. लेकिन उसे संयोजित करने केलिए जेपी थे. कुछ ऐसा ही संयोजन 1989 में वी पी सिंह के द्वारा भी हुआ था._
[चेतना विकास मिशन)

