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कर्नाटक में जीत के बाद कांग्रेस के लिए क्या बदला

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उमेश चतुर्वेदी

केंद्र की सत्ता में अपने बूते पिछले नौ वर्षों से काबिज बीजेपी के हाथ से कर्नाटक की सत्ता फिसल जाना साधारण राजनीतिक घटना नहीं है। दक्षिणी राज्यों में विस्तार की कोशिश में जुटी बीजेपी के लिए कर्नाटक की हार एक बड़ा झटका है और इससे कई सवाल खड़े होते हैं।

ज्यादा उम्मीद बेमानी

दुनिया विजेताओं की बलैया लेने में कंजूसी नहीं करती। इस लिहाज से कर्नाटक विजेता कांग्रेस और राहुल गांधी का गुणगान स्वाभाविक है। लेकिन यह मान लेना कि अगले चार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का विजय रथ ऐसे ही दौड़ता रहेगा, तर्कसंगत नहीं लगता।

खैर, कर्नाटक में बीजेपी की हार को उसके प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भले नहीं देख पा रहे थे, लेकिन उनका नेतृत्व देख रहा था। सवाल लाजिमी है कि ऐसे में मोदी और शाह की जोड़ी ने पूरी ताकत क्यों झोंकी? दरअसल, मोदी-शाह और दूसरे दलों के नेताओं में यही फर्क है। गुजरात में अवश्यंभावी हार देख राहुल प्रचार छोड़ देते हैं, लेकिन हार को जीत में बदलने के लिए प्राणपण लगाने में मोदी-शाह नहीं हिचकते।

अल्पसंख्यक वोट की भूमिका

कर्नाटक में अल्पसंख्यकों ने एकमुश्त कांग्रेस को वोट दिया है। शुरुआती आकलन के मुताबिक, करीब 16 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम समुदाय के 82 प्रतिशत वोटरों ने कांग्रेस पर भरोसा जताया है, जबकि बीजेपी को सिर्फ दो प्रतिशत मुसलमानों ने ही वोट दिया। बनारस हो या वड़ोदरा, कश्मीर हो या कन्याकुमारी, मुस्लिम मतदाता अब वोटिंग के लिए कमोबेश एक जैसा सोचने लगा है। कर्नाटक का संकेत यह है कि अब वह दूसरे दलों के बजाय कांग्रेस पर एकमुश्त भरोसा करेगा। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को कर्नाटक में एक प्रतिशत से कम वोट मिलना इसी संकेत का विस्तार है। कर्नाटक ने संकेत किया है कि अल्पसंख्यक वोट बैंक बीजेपी की ओर आकर्षित नहीं होने वाला। इससे बीजेपी-संघ के जमीनी कार्यकर्ता उनके लिए चलाई जा रही योजनाओं पर सवाल उठाने लगे हैं। कुछ अन्य संकेत भी आसानी से रेखांकित किए जा सकते हैं।

कर्नाटक में अपनी जीत से हिजाब और दूसरे अल्पसंख्यक मुद्दों पर बीजेपी के रुख को भी कांग्रेस जोड़ रही है। वह इसके लिए राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को भी श्रेय दे रही है। हालांकि जीत के एक बड़े कारक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे रहे। उन्हें पता था कि अगर कर्नाटक में कांग्रेस की हार हुई तो उनकी अध्यक्षता पर सवाल उठेंगे। समाजवादी पृष्ठभूमि के मोहन प्रकाश को उम्मीदवार चयन की स्क्रीनिंग कमिटी का चेयरमैन बनाया। इस समिति ने गुटबाजी पर लगाम लगाते हुए उम्मीदवारों के चयन में सावधानी बरती। चुनाव मैदान में कांग्रेस एकजुट नजर आई। नतीजा सामने है।

मोदी के सामने राहुल

कर्नाटक के नतीजों का पॉजिटिव असर आगामी विधानसभा चुनावों पर दिखेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हालांकि मोदी विरोधी गोलबंदी में अब तक नेपथ्य में रहने का दिखावा कर रही कांग्रेस अपने नेतृत्व के लिए खुलकर सामने आ सकती है। कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश भी करेगी कि राहुल की अगुआई में भी मोदी को चुनौती दी जा सकती है। लेकिन इसका आखिरकार कैसा असर होगा, उस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

आखिर में मुलायम सिंह यादव की बात याद आती है। वह कहा करते थे कि राजनेता हमेशा चुनाव में मसरूफ रहता है। नतीजों में जीत मिले या हार, वह अगले चुनाव में जुट जाता है। जीती हुई कांग्रेस हो या हारी हुई बीजेपी, दोनों कुछ ही समय में आगामी चुनावी तैयारियों में जुटी नजर आएंगी। यह बात बुरी भले न कही जाए लेकिन राजनीति में अगर खास गुणात्मक बदलाव नहीं आ रहा तो उसके लिए कुछ हद तक लोकतंत्र का यह चलन भी जिम्मेदार है। बहरहाल, कर्नाटक के नतीजों के बाद भी राजनीति बदलने नहीं जा रही, सत्ता के खेल के कुछ नए मोहरे भले सामने आ जाएं।

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