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*सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया?*

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विजय दलाल 

*जब महाराष्ट्र के चुनाव में बीजेपी को जिताने की सारी चोरियां पकड़ ली गई और राहुल गांधी ने सबूतों के साथ उसे स्पष्ट रूप से चुनाव आयोग की सारी कारस्तानियों का जवाब सार्वजनिक करते हुए चुनाव मंत्रालय से मांगा तो उठाए  गए एक भी प्रश्न का जवाब देने के बजाय केवल बिहार चुनाव ही नहीं वोटर लिस्ट के जरिए हर चुनाव हर हाल में जीतने के लिए नई तरकीब ले आए।*

*अभी तक तो मोदी सरकार पीछे के रास्ते से ही लोकतंत्र की हत्या और संविधान को बदलने के षड़यंत्र पीछे के रास्ते से यानी कहने का अभिनय क्या करना और असल में व्यवहार में करना यानी कथनी और करनी में अंतर से जनता को भ्रमित करती आयी है।*

*लेकिन इस बार तो लोकतंत्र रुपी द्रोपदी के चीरहरण का जनता दरबार ही लगा दिया।*

*जिस तरीके से चुनाव आयोग ने बिहार के चुनाव के केवल कुछ दिनों पूर्व चुनाव पूर्व जिसका निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है उसके अतिक्रमण के सवाल पर जब 11 विपक्षी दल के जिम्मेदार प्रतिनिधि उनसे मिलने गए और उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया वह ध्रतराष्ट्र (?) ने मामा शकुनि (?) की मदद से चुनाव आयोग को दुर्योधन की भूमिका में ला खड़ा किया।*

*और कल किस तरह से द्रोपदी के चीरहरण का दृश्य उपस्थित किया!*

*हां ये भी दिला देना जरूरी है कि मीडिया की भूमिका तो दरबारियों की जिन्हें राजा के हर हुक्म की तालीम करना है, क्योंकि वो राजा की रोटियों पर पल रहे हैं और सांस भी उसकी इजाजत से ले रहे हैं इसलिए उसे हर समय सत्ता के गुणगान ही करना है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भीष्म पितामह की है।*। *

*आज ईवीएम और चुनाव आयोग की इस तरह की भूमिका के बारे में जागरूक नागरिक और लोकतंत्र की रक्षा में संलग्न संस्थाएं तो लगातार लड़ रही थी, लेकिन विपक्षी पार्टियां उसके प्रति कतई गंभीर नहीं थी। आज जब उनके गाल पर चुनाव आयोग द्वारा सीधा तमाचा पड़ा है तब उनकी कुम्भकरणी नींद खुली है।*

*लेकिन अब यह सवाल और इस पर संघर्ष गले में गंडेरी फंसने के समान है?*

*क्या चुनाव का बहिष्कार करें?*

*अब जन-जागरूकता के लिए सड़कों पर उतरे और यदि हिंसा हो जाए तो सरकार आपातकाल लगा कर हमेशा के लिए सत्ता अपने पास तो न रखले?*

*फिरंगियों से आजादी का संघर्ष आज की परिस्थितियों की तुलना में बहुत आसान प्रतीत होता है।

*आज के हालातों में लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष जब सत्ता के पास जनता और उससे असहमति रखने वालों के तकनीक और सब कुछ खरीद कर घोर दमन का इंतजाम ही नहीं उसको न्यायोचित ठहराने का पुरा इंतजाम कर लिया गया हो तब?*

(आओ आज चुनाव आयोग के दरवाजे पर क्या घटा हम पत्रकार रविश कुमार और अशोक वानखेडे के वीडियो देखते हैं। कल और विस्तार और अन्य पहलुओं से पूण्य प्रसुन वाजपेई और श्रवण गर्ग को सुनेंगे।)

विजय दलाल 04/07/2025

*इस सरकार से असहमति रखने वालों से ये ” गमड़ेल सरकारी भांड” किस तरह से लोकतांत्रिक परंपराओं का मखौल उड़ा रहे हैं यह समाचार उसका एक नमूना है।

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