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हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के लोग आखिर क्या खाते थे ?

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-निर्मल कुमार शर्मा,

आधुनिक युग में भी हम सभी लोगों के मन-मस्तिष्क में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता रहता है कि आखिर हमारे पूर्वज लोग कैसे रहते थे ?या क्या खाते थे ? या अपने खाने में क्या-क्या सम्मिलित करते थे या उन्हें किस विधि से बनाते थे ? या उनके भोजन की सूची में खाने की कितने तरह के व्यंजनों की विविधता थी ? आदि-आदि तमाम तरह के प्रश्न घुमड़ते रहते हैं। इन बहुत से प्रश्नों और संशयों के समाधान खोजने के लिए नई दिल्ली स्थित भारतीय राष्ट्रीय संग्रहालय ने पिछले दिनों पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं की मदद से एक कार्यशाला का आयोजन किया था कि आखिर आज से लगभग 3300 से 5300 साल पूर्व मतलब ईसापूर्व 1300 से 3300 ईसापूर्व में रहनेवाले सिंधुघाटी के लोगों,जो सिन्धु और सरस्वती नदियों के किनारे या दोआब क्षेत्र में रहते थे,उनकी रसोई में क्या बनता था और पकता था ? इस महत्वपूर्ण शोधपरक कार्यशाला में किए शोध का निष्कर्ष बड़ा चौंकाने वाले व आश्चर्यचकित करने वाले रहे मसलन,इसमें इस बात का खुलासा हुआ कि हड़प्पा काल के भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के खाने में,उनके कब्रों के सूक्ष्म और वैज्ञानिक विश्लेषण करने से यह पता चला कि वे लोग भी अपने खाने में चना,मटर,मूंग,अरहर दाल,गेंहूँ की विभिन्न किस्में,बाजरा,रागी,चावल,चौलाई,पालक, आलू,टमाटर,मिर्च,पनीर का भी प्रयोग करते थे। आलू और टमाटर के प्रयोग करने को लेकर, पुरातात्विक वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं में आपस में थोड़ा मतभेद है कि हड़प्पा कालीन भारतीय उपमहाद्वीप के लोग इन सब्जियों को शायद न जानते हों,क्योंकि ये उक्त दोनों सब्जियां विदेशी मूल की हैं और ये सब्जियां तत्कालीन हड़प्पा सभ्यता के समय में विदेशों से भारत न आ पाईं हों।


वे लोग पास्ता जैसा व्यंजन भी बनाने में दक्ष थे,जिसमें मांस और सब्जियाँ भाप से पका दी जातीं थीं,वे जौ के आटे से बनी रोटी या पालक की पत्ती को उबालकर,उसे मसलकर उसे बाजरे के आटे के साथ गूँथकर,उसमें खमीर उठाकर उसकी रोटी बनाकर उसे चने या मूँग की दाल के साथ खाते थे,इसके अलावे वे अलसी के बीज भूनकर उसे शहद के साथ खाते थे या जौ के आटे में तिल मिलाकर उससे बनी रोटी गुड़ की डली के साथ भी खा लेते थे,वे चने के सत्तू को घोलकर भी पीते थे,चने की दाल और काली मिर्ची के साथ पीसकर बनाई गई चटनी से अपने खाने के स्वाद को चटपटा बना लिया करते थे। शोध में यह बात भी सामने आई है कि हड़प्पा कालीन हमारे पूर्वज लोग पालतू या शिकार करके लाए गए जानवरों यथा हिरन,कछुए,घड़ियाल,बटेर, देशी या विदेशी मुर्गे, नदी या समुद्री मछलियों,बकरे,भैंसे, गाय आदि के मांस को भी शाल के पत्ते में लपेटकर,उसे भूनकर खाते थे,इसी प्रकार बाटी और सूखी मछली,मांस का सूप,पकाया हुआ भेड़ का जिगर चने की दाल के साथ,भूनी मछली महुआ के तेल की चटनी के साथ खूब आराम से खुश होकर खाते थे,क्योंकि हड़प्पा कालीन मनुष्यों के शवों के साथ,उनके पास ही उक्त प्रकार के विभिन्न जीवों की हड्डियां भी बिखरी पड़ीं हैं।
इस प्रकार हम देखते है कि वर्तमान काल के भारत के लोगों जैसे प्राचीन हड़प्पा और मोहनजोदड़ो काल के भारतीय उपमहाद्वीप में रहनेवाले लोग भी शाकाहारी भोजन के साथ-साथ मांसाहारी भोजन की भी प्रचुर मात्रा उपभोग करते थे।

-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,उ.प्र.,

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