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दो सौ रुपये की कीमत तुम क्या जानो, खान बाबू

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(संदर्भ : शाहबानो केस)

        उन दो सौ की कीमत पूरी कौम ने चुकाई, सारे देश ने चुकाई। इतनी चुकाई कि किश्तें खत्म होने का नाम नहीं ले रही। देश पर राज करती एक पूरी पार्टी तबाह हो गई। गड्ढे में फँसा एक पूरा समाज खाई में धंस गया। बस, दो सौ रुपये की खातिर … 

अपने इंदौर में रहने वाले एक खान साहब ने, पकी उम्र में दूजा ब्याह किया। कुछ समय दो बीवियों को साथ रखा, और फिर पहली बीवी को तलाक दे दिया। अपनी बासठ साल की छोड़ी हुई बीवी को 200 रुपये मासिक खर्चा देना कबूल किया। कुछ दिनों तक दिया भी शायद..लेकिन फिर डिफाल्ट कर गए। 

बीवी, शाहबानों ने कोर्ट में नालिश कर दी। लोकल कोर्ट ने फैसला बीवी के हक में दिया। पतिदेव हाईकोर्ट चले गए। हाईकोर्ट भी बीवी के पक्ष में गया। पतिदेव सुप्रीम कोर्ट चले गए। कोर्ट ने वहां भी शाहबानों के पक्ष में फैसला दिया। होना ही था, कानून – कुरान- पर्सनल लॉ .. हर चीज का रेफरेंस देकर सुप्रीम कोर्ट ने गुजारे भत्ते को जायज ठहराया। 

मियां बीवी का झगड़ा था, कौम के ठेकेदारों ने नेशनल इश्यू बना दिया। पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप माना। पूरी कौम लग गयी खान साहब के 200 बचाने में। आंदोलन, धरना, प्रोटेस्ट, आवेदन, निवेदन, धनाधन सब। 

केंद्र सरकार का एक तगड़ा, प्रगतिशील, खुले दिमाग का मंत्री इस तमाशे के पुरजोर विरोध में था। आरिफ मुहम्मद खान ने एक घण्टे संसद में भाषण दिया। कुरान, कानून, संविधान औऱ औरत के हकों हकूक पर शानदार तकरीर की। जब भाषण देकर बाहर आये, तो पता चला सरकार झुक गयी है। प्रधानमंत्री ने कानून बदलकर उस महिला के हक को दबाना कबूल कर लिया है। 

आरिफ ने इस्तीफा पटक दिया। मनाने की बहुतेरी कोशिश हुई, न माने। आखरी कोशिश नरसिंहराव ने की। आरिफ के कंधे पर हाथ रखकर कहा- “आरिफ, हम पॉलिटीशियन हैं, समाज सुधारक नही। अगर मुसलमान गड्ढे में रहना चाहते है, तो रहें। तो तुम क्यों जिद में अपना भविष्य खराब करना चाहते हो।”

तो अछूतों को “हरिजन” कह मुख्य धारा में लाने की कोशिश करने वाले गांधी की कांग्रेस,  अब पॉलिटिशियन का जमावड़ा थी। वो समाज सुधारक नही थी। गांधी के मार्ग से हटने की सजा आने वाले वक्त में बखूबी मिलेगी, ये नरसिंहराव ने सोचा न होगा। आरिफ तो मानने वाले न थे, पद त्याग चलते बने।

राजीव ने कानून उलट दिया। गांधी-नेहरू-इंदिरा की धर्मनिरपेक्षता पर, शाहबानों मामले के बाद मुस्लिम तुष्टिकरण की कालिख पुत गयी। जब अहसास हुआ, तो शर्मिंदा सरकार को दूसरी सलाह मिली, हिन्दू तुष्टीकरण किया जाए। जन्मभूमि का ताला खोलो, अयोध्या का जिन्न निकालो, जिन्न हू-हू-हाहा करते हुए निकलेगा, और सारी समस्या छू-मंतर। मुस्लिम भी खुश-हिन्दू भी … 

राजीव ने चिराग घिसा। जिन्न निकला, कन्ट्रोल करते तब तक सरकार चली गयी। वीपी के बहाने सत्ता और चिराग का जिन्न भाजपा के हाथ लग गया। राजीव की शहादत से कांग्रेस ने सत्ता सम्भाली, मगर जिन्न वापस न मिला। वो जिन्न जमीन साफ करने लगा, बैठने और भजन करने के लिए पत्थर हटाने लगा। फिर एक धक्का और दिया, बाबरी मस्जिद तोड़ दिया। 

देश भर में दं*गे हुए, हजारों मा*रे गए। जिन्न पर चढ़कर गांधी के हत्यारे मकबूल हो गए। कांग्रेस की चूलें हिल गयी। सेकुलरिज्म गाली हो गया, मुसलमान गद्दार और बाबर की संतानें हो गयी। सरकार, मिडीया, कोर्ट, धर्म, और हम सब नंगे हो गए। 

उन दो सौ रुपयों की कीमत तुम क्या जानो खान बाबू.. !!!

साभार:

मुख्तार अहमद अंसारी 

सौजन्य:

Raja Pateria

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