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आज के इंसान को क्या हो गया है

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शशिकांत गुप्ते

आज मुल्क में जो भी अमानवीय हिंसक कृत्य हो रहा है।उसे देख,पढ़,सुन का प्रख्यात गीतकार प्रदीपजी के लिखे गीत की कुछ पंक्तियों का स्मरण हो रहा है।
आज के इस इंसान को यह क्या हो गया
इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
कैसी यह मनहूस घड़ी है,भाइओं में जंग छिड़ी है
कहीं पे खून कहीं पर ज्वाला,जाने क्या है होने वाला
अपना देश था वो देश था भाई, लाखों बार मुसीबत आई
इंसानों ने जान गवाई,पर बहनों की लाज बचाई
डस लिया सारे देश को जहरीले नागों ने
घर को लगा दी आग घर के चिरागों ने

यह पंक्तियां गीतकार स्व. प्रदीपजी की लिखी हुई है।
2 ऑक्टोबर भारत माँ के दो सपूतों की जयंती पर उन्हें स्मरण किया गया।
3 ऑक्टोबर को देश में जो कुछ घटित हुआ वह देश के सिर्फ संवेदनशील लोगों के लिए शर्मसार करने वाली घटनाएं हैं।
कार की चपेट में आने से कृषकों की मृत्यु होती है,और कुछ नागरिक हिंसा के शिकार होकर परलोक सिधार जातें हैं।
राजनैतिक नेताओं के एक दूसरे आरोप प्रत्यारोप शुरू हो जातें हैं।
जनहानि पर भी सियासत करना अमानवीय सोच का ही तो प्रमाण है?
आमजन जो अहिंसा में विश्वास रखता है वह क्या सोचता है? प्रख्यात शायर स्व.अनवर जलालपुरी के इस शेर को पढ़ने पर उक्त प्रश्न का जवाब मिलता है।
शादमान (प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति) लोगों मेरे जख्म से दिलचस्पी क्यों
उसका पत्थर है, मेरा सर है आपका क्या है

एक दूसरी खबर ने भी जेहन में हुए सवाल पैदा किए हैं।
फिल्मी कलाकार के सपूत ने कपूत होने का रोल अदा किया है।
फिल्मों की कहानी लिखने वाले लेखक,फिल्मों में नशीले पदार्थो का बेख़ौफ होकर व्यापार करने वाले खलनायकों का किरदार लिखते समय देश की कानून व्यवस्था को इतना कमजोर क्यों लिखतें हैं?
फिल्मी कहानी लिखने वाले लेखक फिल्मों में खलनायकों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अवैध धंधों को बखूबी आंजाम देने के लिए भ्रष्ट्राचार को प्रश्रय देने वाले दृश्य क्यो लिखतें हैं?
फ़िल्म का निर्माण सांस्कृतिक मौर्चे का एक माध्यम है।सांस्कृतिक मोर्चा सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से आमजन को शिक्षित करने वाला मोर्चा है।
फिल्मों में खलनायक के गुर्गों का अभिनय करने वाले कलाकरों के चेहरे मोहरे इतना डरावने क्यों दिखाए जातें हैं?खलनायक द्वारा अभिनेता को आतंकित करतें समय जो दर्शकों की भीड़ दिखाई देती है उस भीड़ को इतना सहमा हुआ,भयग्रस्त दर्शाने के पीछे लेखकों, फ़िल्म निर्माताओं को क्या मंशा होती है?
ऐसे अनेक प्रश्न जेहन में उभर कर आतें हैं?
गांधीजी के सत्य और अहिंसा क्या उपर्युक्त हश्र होना है?
लालबहादुर शास्त्रजी के जय जवान जय किसान के नारे का भी यही हश्र होना है?
इस नारे का स्मरण होते ही पुलवामा की दर्दनाक घटना और दस महीनों से चल रहे किसानों का आंदोलन सहज ही याद आ जाता है?
पुनः प्रदीपजी के गीत की यह पंक्तियां याद आती है।
किस के सर इलज़ाम धरें हम,आज कहाँ फरियाद करें हम
करतें हैं जो आज लड़ाई,सब के सब है अपने ही भाई
सब के सब हैं यहाँ अपराधी,है मोहोब्बत सबने भूलदी
आज बही है खून की धारा,दोषी उसका समाज है सारा
आपस की दुश्मनी का यह अंजाम हुआ
दुनिया हसने लगी देश बदनाम हुआ
गीत की पक्तियां प्रख्यात गीतकार स्व. प्रदीपजी की लिखी हुई है।यह स्पष्टीकरण बहुत जरूरी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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