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*जो ध्यान-तंत्र और संसर्ग-साधना से मुश्किल, वह सेवा से आसान*

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     ~आरती शर्मा

   कहा जाता है : “माँ बाप की सेवा करो, असहाय जरूरतमंदों की सेवा करो; मेवा मिलेगा.”

      मेवा और दिखावा को ध्यान में रखकर की जाने वाली सेवा कुछ देना तो दूर, आपको ही अपना कलेवा बना लेती.

    कामना-पूर्ति, अहंकार-तुष्टि या प्रसिद्धि के लिए किया जाने वाला काम कोई मुकाम नहीं देता, बस आपका काम तमाम कर देता है.

   और हाँ, माँ-बाप की सेवा नहीं की जा सकती. आप जो हैं, उन्हीं की बदौलत हैं. मातृ-पितृ ऋण से उऋण होने के लिए उनके प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह सेवा नहीं है.

     सेवा सिर्फ़ और सिर्फ़ असहाय जरूरतमंद की हो सकती है, वो भी कामना या दिखावे से अलग होकर. ऐसी सेवा करके देखें, डायनामिक रिजल्ट मिलेगा वो भी तुरंत. आपको देवत्व-ईश्वरत्व की अनुभूति होगी.

       भजन-कीर्तन, मंडल-कमंडल, व्रत-तीर्थ से कुछ नहीं मिलता. ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है, जिसे आपसे प्रसंशा की भूख हो. ईश्वर किसी स्थान विशेष पर भी नहीं है, जहाँ आपको जाना चाहिए. ईश्वर एक सत्ता है, जिसकी अनुभूति आपके भीतर ही आपको हो सकती है.

    जो मुकाम ध्यान साधना, तपस्या, तंत्र साधना और संभोग साधना से मिलता  है ; वही मुकाम सेवा से मिलता है. आप ईगोलेश, टाइमलेश, शून्य और अनंत होकर दिव्य आनंद का अनुभव करते हैं.

     ध्यान-तंत्र की साधना में जीवन खप जाता है. मंज़िल पाने में जन्मों का समय भी लग सकता है. संभोग साधना के लिए अपरिमेय पौरुष चाहिए, जो लुप्तप्राय है. सेवा सबसे सरल मार्ग है.

      सेवा कथित सदगुरू, ईश्वर की दलाली करने वाले धूर्त, जन्म आधारित ब्राह्मण, पाखंडी – भिखारी संत आदि की नहीं करें. सेवा उसकी करें जिसे सच में जरूरत हो और जो निराश्रित हो.

    यह सोचकर भी सेवा नहीं करें कि आप उसका उपकार कर रहे हैं. वह इंसान आपके लिए माध्यम बन रहा है. उसके जरिये आप अपना उद्धार कर रहे हैं : यह सच नहीं भूलें.

ऐसी सेवा का एक प्लेटफार्म चेतना मिशन प्रोवाइड कराता है.

*मरते बचपन को ‘उपेक्षा से’ कफ़न नहीं, ‘सेवा से’ जीवन दें :* 

     जीवन वाणी-लेखनी का विशेषण नहीं, क्रिया का विज्ञान है। हर कहीं बड़ी-बड़ी, अच्छी-अच्छी बातें हो रही हैं। इंसानियत के, घर्म के, प्रेम-परोपकार के और भलाई के उपदेश दिए जा रहे हैं। साधा सिर्फ़ अपना स्वार्थ जा रहा है.

     हम अपने को नेक बता रहे हैं,और आचरण? हम जो लिखते-बकते हैं उसका रत्ती-भर भर भी अपने चरित्र में नहीं लाते। इस तरह किसे छल रहे हैं हम? सिर्फ़ खुद को।

    हमारे़ इसी पाखंड के कारण आधुनिक इंसान दो-पाया जंगली जानवर बनता जा रहा है और उसका समाज मशीनी जंगल।

   अगर हमारे़ सामने कोई असहाय-मासूम इंसान मरता रहे और हम उसे अनदेखा कर के अपने में मस्त रहें तो क्या हम ईश्वर-विश्वासी हैं? क्या हम धार्मिक हैं? क्या हम इंसान कहलाने के हकदार हैं?

    अपने लिए तो पशु-पंछी कीड़े-मकोड़े, सैतान-हैवान भी जी लेते हैं! हम भी ऐसे ही हैं तो उनसे किस अर्थ में अलग हैं?

  इसलिए :

कथनी से परे कुछ करनी की  तरकीब निकाली जाए।

अब यह आज की बात बने कल पर न टाली जाए।।

नए निर्माणों की तामीर जऱूरी है मगर !

पहले गिरती हुई दीवार संभाली जाए!!

      शासकीय अनुदान बटोरने वाले N.G.O’s  से अलग, बतौर ट्रस्ट रजिस्टर्ड “ज्योति अकादमी” चेतना विकास मिशन समर्थित एक ऐसा निजी उपक्रम है. इसके द्वारा उन मासूमों को बचपन+अध्ययन का अनुभव दिया जा रहा है :

  (1).जिन्हें देश का भविष्य नहीं माना जाता। 

  (2).जिन्हें अपना या अपने मृतवत अपनों का पेट पालने के लिये कूड़ा-कचरा टटोलना पड़ता है। 

  (3). जिन्हें बंधुआ मजदूर बनना पड़ता है।

  (4). जिन्हें पैसे वाले नर-पशुओं को अपना जिस्म सौंपकर उनकी हवस मिटानी पड़ती है। 

       जो चंद रूपये देकर इन लाचारों से ये सब करवाते हैं, जो उनको भोगते हैं वो भी इंसान हैं। सभ्य इंसान हैं। हमारी तरह आम इनसान नहीं, बल्कि खास इंसान।

      और हम?

हम जो कर सकते हैं वो भी नहीं करते। तो क्या यही इंसानियत है? यही कहता है हमारा धर्म और मजहब? ऐसे ही हमसे खुश होंगे हमारे़ भगवान, अल्लाह, गॉड?

     आपकी रोटी का थोड़ा- सा हिस्सा ऐसे मासूमों को जिंदगी दे सकता है और आपको वास्तविक खुशी/तृप्ति की अनुभूति करा सकता है।

   ज़रूरी नहीं की आप पैसे ही दें. स्टेशनरी, कपड़े, राशन देकर और असहाय बच्चों को हम तक पहुंचाकर भी आप आपने मनुष्य होने का परिचय दे सकते हैं.

  —ज्योति अकादमी, A/C नं. 55037262092 स्टेट बैंक ऑफ इंडिया। [9997741245 : गूगल पे]

     अनेकों मीरा, गौतम, नीराला, सूर हैं जिनमें !

अहर्निश बुझ रही है जिनके जीवन दीप की बाती !!

जिन्हें हर मौत मिलती है वसीयत में जनम से ही !

उठो इन दुधमुहें मासूम बच्चों के लिए साथी!!

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