डॉ. प्रिया (पुडुचेरी)
मनुष्य जिंदगी भर
किसे खोज रहा है?
कौन सी जिज्ञासा,
कौन सी खोज उसे पकड़े हुए है ?
कहां दौड़ा चला जा रहा है ?
हजारोँ है दिशाएं,
हजारोँ हैँ लोग,
लेकिन~
खोज एक ही है: खोज आनंद की है।
जीवन की हर वासना मे,
प्रत्येक इच्छा मे
मनुष्य आनंद को खोज रहा है।
मनुष्य दुख-निरोध और आनंद उपलब्ध करने के लिये दौड़ रहा है।
एक ही दौड़ है:आनंद की।
लेकिन :
आज तक बाहर दौड़ कर आनंद को कोई भी उपलब्ध नहीँ हुआ है।
जो बाहर नहीँ पाया जा सका,क्या इतना विवेक नहीँ जागता कि हो सकता है कि वह बाहर हो ही नहीँ।
एक बार भीतर तलाशने की प्यास जाग जाए।
भीतर झांकने की आकांक्षा पैदा हो जाए।
और जन्मो-2 जो बाहर खोजने से न मिल सका, एक क्षण मे भीतर की अंतर्दृष्टि उसे उपलब्ध करा देती है।
आनंद मनुष्य का स्वरुप है,
ज्ञान मनुष्य का स्वरुप है।
मनुष्य ने खोया नहीँ है।
केवल उसकी दृष्टि उस पर नहीँ है जिसकी वह खोज कर रहा है।
केवल दृष्टि कहीँ और उलझ गई है।
जो दृष्टि ‘पर’ को देख रही है,उसी दृष्टि को ‘स्व’ पर केन्द्रित करना साधना है।
धर्म:मनुष्य के भीतर जो छिपा है,उस रहस्य को खोज लेना धर्म है।
जो एक के भीतर बैठा है,वही सबके भीतर बैठा है।
भीतर कौन बैठा है ?
तुम. सिर्फ़ तुम.
एकोस्मि द्वितीयोनास्ति.
(चेतना विकास मिशन)

