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क्या है मेरी प..ह..चा..न?*

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शशिकांत गुप्ते

सीतारामजी के घर मिलने गया। उनका बेटा ज्ञानेश विदेश के दौरे से लौट आया है। ज्ञानेश को बधाई भी देनी है।
ज्ञानेश ने मुझे प्रणाम किया।
मैने भी खुश रहो कहतें हुए आशीर्वाद दिया।
सीतारामजी ने कहा जब से ज्ञानेश विदेश से लौटकर आया है,एक प्रश्न पूछकर मुझे मानसिक रूप से अस्थिर (Unstable) कर दिया है?
मैने पूछा ऐसा कौनसा जटिल प्रश्न पूछ लिया है?
सीतारामजी ने कहा ज्ञानेश एक ग्रुप के साथ विदेश दौरे पर गया था। तकरीबन पच्चीस तीस लोगों का समूह था।
सभी जातियों, धर्मो के लोग थे।
मैने कहा यही तो अपने देश की पहचान है, अनेकता में एकता।
सीतारामजी ने मुझसे गुस्से में कहा पूरी बात तो सुनो,
मीडिया के एंकर जैसे बगैर किसी मुद्दे को पूर्णरूप से जाने,बीच में बोलने लगते हो।
मैने कहा sorry।
सीतारामजी ने कहा ज्ञानेश कह रहा था, मै विदेश दौरे पर जिस देश में भी गया वहाँ मुझे मेरी पहचान मै भारतीय हूँ (I am Indian) ही बतानी पड़ी।
मैने कहा यह तो स्वाभाविक बात है।
सीतारामजी ने कहा ज्ञानेश ने पूछा मै अपने देश में कब भारतीय बनूंगा? यह प्रश्न बहुत जटिल लग रहा है? उत्तर सूझ नहीं रहा है?
मैने कहा इस प्रश्न पर इतनी गम्भीरता से मत सोचो, वैसे भी ज्ञानेश आपका ही बेटा है,और स्वयं जाने माने व्यंग्यकार हो।
सीतारामजी ने क्रोधित होकर कहा आप क्या कहना चाहतें हैं व्यंग्य विधा गम्भीर विषय नहीं है?
मैने कहा नहीं, मेरा आशय यह है कि, ज्ञानेश ने भी व्यंग्य ही किया होगा? ज्ञानेश ने बाप से बेटा सवाई वाली कहावत को चरितार्थ किया है।
सीतारामजी ने कहा यदि सच में ज्ञानेश ने व्यंग्य किया है तो यह करारा व्यंग्य है?
देश की स्वतंत्रता के पिचहत्तर वर्ष पूर्ण हो रहें हैं। पिचहत्तर वर्ष में भी उक्त प्रश्न विद्यमान है? इससे बड़ा व्यंग्य क्या हो सकता है?
मैने ज्ञानेश को आवाज दी वह बाहर आया मैने उसे अपने पास बैठाया और पूछा? यह प्रश्न तुम्हारे जेहन में कैसे उपस्थित हुआ?
ज्ञानेश ने कहा जब उनका काफिला विदेश में एक विशाल सभागृह में बैठा था। वहाँ आपस में चर्चा चल रही थी।
दो दम्पतियों में बच्चों की शादी को लेकर इसतरह चर्चा चल रही थी। देश में जाकर बच्चों के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश करना है,लेकिन अपनी ही जाति में, एक दम्पति ने कहा हमारे यहाँ
उन्नीसा बीसा भी नहीं चलता है। दूसरी दम्पति ने कहा हमारे यहाँ अब रोटी-बेटी का अंतर समाप्त हो गया है।
दोनों दम्पतियों के बच्चें उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। एक बच्चा तो समाजशास्र में पीएचडी कर रहा है।
इन्ही की बातें सुनकर मेरे जेहन में यह प्रश्न उपस्थित हुआ।
प्रश्न रूपी व्यंग्य पर गम्भीरता से सोचें तो सच में बाप से सवाई ही लगता है।
मै अपने देश में भारतीय कब बनूंगा?
यह सोचते हुए घर लौट रहा था,उसी सेमय मेरे मित्र राधयेशामजी का कॉल आया, उनके मोबाइल की रिंग टोन भी कौतुहल पैदा करने वाली है।
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
मैं बसाना चाहता हूँ स्वर्ग धरती पर
आदमी जिस में रहे बस आदमी बनकर
यह गीत गीतकार नीरज ने लिखा है।
मै कॉल उठा नहीं पाया।कॉल बन्द होगया।

राधयेशामजी दूसरे नंबर से पुनः कॉल किया इस बार की रिंगटोन व्यंग्यात्मक है।
सब से बड़ा नादाँ वही है
जो समझे नादाँ मुझे
कौन कौन कितने पानी में
सब की है पहचान मुझे
धर्म कर्म सभ्यता मर्यादा
नज़र न आई मुझे कहीं
गीता ज्ञान की बाते देखो
आज किसी को याद नहीं
माफ़ मुझे कर देना भाइयों
झूठ नहीं मैं बोलूंगा
वही कहूँगा आपसे जो गीता से
मिला है ज्ञान मुझे

यह गीत गीतकार मलिक वर्मा ने लिखा है। उक्त दिनों ही गीत सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म पहचान के हैं।
सवाल भी पहचान का ही है?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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