सुसंस्कृति परिहार
भारतवासियों के लिए इससे बड़ा लाभ और क्या हो सकता है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री हमारे जीवन को मुक्ति पथ पर ले जाने के लिए पूरी तरह सजग हैं ।ये तमन्ना बहुसंख्यक देशवासियों की होती है इस कामना के साथ वे अपने जीवन के प्रति क्रूर हो जाते हैं कभी कभी आत्महंता भी बन जाते हैं ।स्वर्गीय सुखों की कल्पना उन्हें आल्हादित भी रखती है। वहां पहुंचने ईश्वर सदियों से माध्यम रहा है जबकि सत्य यह है कि ना तो किसी ने ईश्वर देखा है और ना ही स्वर्ग।मगर इन आस्थाओं और विश्वासों का क्या कहना ? मन बहलाने का इंतजाम अच्छा है। दुनिया दारी की समस्याओं से कुछ हद तक निज़ात भी मिल जाती है।
हमारी वर्तमान सरकार इस बात पर विशेष ध्यान दें रही है।पहले पहल जय श्री राम के नारे के साथ 1992में तोड़ी बाबरी मस्जिद के बाद अब रामजन्मभूमि मुक्त है और उस पर भगवान राम का ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण तीब्र गति से चल रहा है।वह लाखों करोड़ों लोगों को मुक्ति पथ दिखा रहा है।साथ ही साथ चुनाव में भी बहुत काम आया ।राम जी करेंगे बेड़ा पार। अब रामदर्शन कब होंगे यह चिंता भी ख़त्म हो जाती है जब हमारे सरकार जी वहां पहुंचते हैं तो जीवंत प्रसारण देशवासियों को दोहरा लाभार्जन कराता है। भगवान रामजी के साथ उनके आज के हनुमान हमारे साहिब के दर्शन सर्वसुलभ हो जाते हैं। फिर मुक्ति कैसे ना मिले? गरीबों को घर बैठे सब पुण्यतिथि मिल जाता है।
पिछले दिनों राम जी के ये हनुमान तीर्थाटन को केदारनाथ बाबा के धाम भी पहुंचे।वे अपने लिए कम भक्तों के लिए ही आमतौर पर जाते हैं । इसीलिए तो कैमरे की घुसपैठ गर्भगृह तक हो जाती है। जिस पर लोगों को ही नहीं बल्कि पुजारियों को भी गुस्सा आता है ये ग़लत है उनका तमाम जीवन प्रजा के लिए समर्पित है।अब ये बात अलहदा है कि उन्हें विशिष्ट जूतों के साथ मंदिर में प्रवेश मिल जाता है। तुलसी दास जी कह भी गए हैं समरथ को नहीं दोष गुसाईं। फिर कैसा बबाल? अब केदारनाथ बाबा तो आत्मप्रशस्ति करने बाहर नहीं आ सकते इसीलिए प्रभु के भक्तों के बीच मंदिर का मंच भी उन्हें सहज ही मिल जाता है जहां से बाबा भगत का प्रसारण अरेंज होता है ताकि आम लोग उनके तीर्थाटन का आनंद लेकर गद गद हो सकें।वे बाबा की गाथा कम अपने वरदान की चर्चा करना नहीं भूलते। मुक्ति पथ के राहियों के लिए होने वाली सुविधाओं के ज़रिए वे इन राहियों का मनोबल बढ़ाते हैं।साथ ही साथ पर्यटन से लाभ का जुगाड़ भी जमाते हैं। विदित हो आजकल उनके चर्चित उद्यमी सखा केदारनाथ धाम के ट्रस्टी भी हैं।हाल ही में आए आंकड़े बता रहे हैं कि साहिब जी के जाने के बाद भक्तों की संख्या में इजाफा हुआ है। वैसे प्रतिवर्ष लाखों की तादाद में लोग उत्तराखंड के चार धाम जाते हैं।यह श्रद्धा भाव चुनाव में भी मददगार होता है।
इस तीर्थ यात्रा का और बाबा भगत की महती कृपा का भक्तगण बराबर प्रचार प्रसार भी करते हैं मीडिया की भारी भरकम कवरेज से भी भक्तों में जान फूंकी जाती है। जिससे आम जनों में एक उद्वेग भाव जन्मता है और वे उस मुक्ति पथ पर जाने उद्यत हो जाते हैं । यकीनन पर्यटन बढ़ता है और साहिब की जय जयकार भी विस्तार पा लेती है। मंहगाई, बेरोजगारी से त्रस्त लोगों में नई जान फूंक देते हैं।वे सारी तकलीफों से ध्यान हटा देते हैं। मुक्ति की कामना इतनी गहरी पैठ रखती है कि शव वाहिनी गंगा में मुक्त लोगो को भूल जाते हैं। आध्यात्म का यही सहारा कहीं लोकतांत्रिक अधिकारों को बुरी तरह आहत करता है । इसीलिएदेश में बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के बीच चुनाव भी पिछली दो बार हो चुका हुआ है तब भी मात्र 31%और 35%वोट से भाजपा ने सरकार बनाई।जब हर हर महादेव की तर्ज पर हर हर मोदी ख़ूब चला।
अच्छी बात यह है कि अब भीतकरीबन 65 से 69% लोग धर्म और राजनीति का घालमेल नहीं चाहते ।यह शुभ लक्षण है।अपने अधिकारों को वरदान ना मानें उनके प्राप्ति के लिए संविधान के रास्ते पर चलें।आपका जीवन बहुमूल्य है।उसको सार्थकता के साथ जिएं। मुक्ति तो अवश्यंभावी है वह तो होगी ही उसे कोई रोक नहीं सकता है। सोचें क्या मुक्ति के पीछे भागना उचित है?
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