-सुसंस्कृति परिहार
हमारा गणतंत्र पूरे 74 वर्ष का हो गया।यह उत्साह और उमंग का अवसर है।इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था।जिसने हमें एक जिम्मेदार नागरिक बनाया हमें अपने जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया। हमारे बीच के लोग न्यायपालिका और कार्यपालिका में पहुंचे।हमारा अपना राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्याधीश होगा।सब मिलकर देश को एक समुन्नत राष्ट्र बनायेंगे। इसमें अहम् भूमिका आम जनता की रखी गई। उसके द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर इन महानुभावों को चुनेंगे।देश में निष्पक्ष चुनाव के लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग बनाया गया ताकि चुनावों में आस्था और विश्वास कायम रहे। इसके लिए चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता और सुप्रीम कोर्ट के की त्रिमूर्ति करेगी ताकि जनता के अभिमत के मुताबिक तमाम कार्य विधियां सुचारू रूप से गतिमान हों। इसके अलावा ईडी, सीबीआई वगैरह स्वतंत्र इकाई भी बनाईं गईं जो,गलत तरीके कार्य करने वालों पर स्वतंत्र रूप से नज़र रखेगी।इनकी ज़द में सभी भारतीय नागरिक और नेता, अधिकारी वगैरह होंगे।

संविधान निर्माताओं की इस पुनीत आस्था को आज जिस तरह तार तार किया जा रहा है उसे देखकर यह ख्याल मन में बार-बार आता है ऐसे हालात में गणतंत्र दिवस मनाना और दुनिया के सामने शक्ति प्रदर्शन करना फ़िज़ूल है।जनता का ,जनता के लिए जनता द्वारा शासन अब ग्रामपंचायतों से लेकर, नगरनिकायों , राज्यों और केंद्र में कहीं नज़र नहीं आता है। सिर्फ़ और सिर्फ़ एक व्यक्ति की तूती बोलती है जिसे अंधभक्ति में लीन लोग भगवान विष्णु कह रहे हैं।वह भगवान कतई नहीं विशुद्ध रूप से तानाशाह है जिसने धर्म का सहारा लेकर एक विशेष बहुसंख्यक कौम को अपने पंजे में कसकर दबोच लिया है और उसकी वोट हथियाकर सर्वशक्तिमान बन बैठा है।जिसके सामने चुनाव आयोग, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभाध्यक्ष, राज्यपाल, ईडी, सीबीआई जैसी तमाम स्वतंत्र इकाईयां नतमस्तक हैं।
जहां तक कि राज्यों की स्वायत्तता पर भी ग्रहण लग चुका है ।गौर कीजिए हाल के चुनावों पर विधायकों की तीनों राज्यों में क्या स्थिति है वे अपना मुख्यमंत्री नहीं चुन पाए ऊपर से आए कागज पर लिखे नाम वाले मुख्यमंत्री बनाए जबकि संवैधानिक तौर पर यह अधिकार विधायकों का होता है खैर अब मुख्यमंत्री का यह अधिकार भी नहीं कि वह अपना मंत्रीमंडल बनाए, उन्हें अपनी पसंद से विभाग भी वितरित कर सके।सब सर्वशक्तिमान ही तय करेगा।अब बताईए जनता के चयनित विधायक कैसे मनमर्जी से अपने क्षेत्र के विकास का या प्रदेश की तरक्की का काम कर सकते हैं।याद होगा हैदराबाद नगरनिगम के चुनाव तक में भी जब सर्वशक्तिमान पहुंच जाता है।सब जगह बस मैं ही मैं नज़र आता है आखिर क्यों? जहां तक केन्द्र का सवाल है वहां भी सिर्फ हर मंत्रालय का कमांडर एक ही है।बाकी बस नाम का मंत्री मंडल है।
सबसे बदतर हाल तो संसद के दोनों सदनों में देखने मिली जब सदन में प्रविष्ट हुए दो नवयुवकों से सम्बंधित सवाल विपक्ष के संसद सदस्यों ने पूछे तो उन्हें सत्रावसान तक निष्कासित कर दिया गया जब तकरीबन 150 सदस्य बाहर हो गए तो मनमाने तरीके से कई विधेयक पास करा लिए और वे कानून बन गए।इन सांसदों की अनुपस्थिति में हिट एंड रन कानून बना जिसका विरोध पहली जनवरी से ट्रक ड्राईवर किए थे।आपने महसूस किया होगा यह कानून कितना कठोर और अलोकतांत्रिक है।इसे फिलहाल स्थगित किया गया। कानून ज़िंदा है। वह 2019के सीसीए कानून की तरह है जो फिर सिर उठा रहा है जिसके अमल की पूरी तैयारी की जा चुकी है। आज जनप्रतिनिधि सड़क पर हैं ये कैसी संसद है? याद आता है 2014का आमचुनाव जब यह प्रचार था कि कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए और अब तो उन्हें विपक्ष मुक्त भारत की दरकार है इसलिए किसी ना किसी बहाने विपक्षी सांसदों को दूर करते जा रहे हैं।हम सब देख रहे हैं कि उनके इरादे पूरी तरह अलोकतांत्रिक हैं, ये पूरी तरह तानाशाही रवैया है।
इसके अलावा उसका चुनाव आयुक्त पर पूरा दबदबा है उसको ज़रखरीद गुलाम बनाया हुआ जब तमाम विपक्षी दल ईवीएम हटाने की बात करते हैं तो वह सिर्फ अपने मालिक की सुनता है। मध्यप्रदेश से तकरीबन 15,,000से अधिक शिकायतें वहां पहुंचती हैं उसकी कान में ज़ूं नहीं रेंगती।वह परिणाम ग़लत तरीके से देता है किंतु कोई बाल बांका नहीं कर सका। सुप्रीम कोर्ट के पिछले सर्वोच्च न्यायाधीशों से दबाव में किस तरह मनमाने आदेश निकलवाए गए उन्हें बदले में उपकृत किया गया वह भी छुपा नहीं है।आज जब वर्तमान सीजेआई इस माहौल को बदलने की कोशिश में लगे हैं तो उनके आदेशों की अवज्ञा हो रही है यह कैसी मानसिकता है। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के परिपालन की जगह सदन में अपने मन का कानून बना लिया गया और अफ़सोसनाक यह कि राष्ट्रपति ने भी सुको की अवज्ञा करते हुए कठपुतली की तरह इस विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए।जबकि उनका दायित्व बनता था इसे पुनर्विचार हेतु सदन को भेज देती। कार्यपालिका प्रमुख जब अलोकतांत्रिक आदेश पास कर देती हैं तो कहना ही क्या ?ईडी भी निष्पक्षता छोड़ कैसे विपक्षी नेताओं के पीछे पड़ी हुई है उन्हें इनके सिवा और कोई अपराधी नज़र नहीं आता।याद करिए विधानसभा सभा चुनाव के दौरान ईडी किस तरह छग मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जाल में फंसाकर बदनाम करती है ताकि चुनाव परिणाम प्रभावित हों।बाद में इसका खुलासा होता है ईडी कैसे एक शख्स से जबरिया गलत काम को अंजाम तक पहुंचाई।
यही बात कार्यपालिका के तहत कार्यरत अधिकारियों की ,देखने मिल रही है।जब उनका सर्वप्रमुख राष्ट्रपति अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकता तो वे क्या करें जी हुजूरी ही ठीक लगती है वरना लूप लाइन के साथ ही संजीव भट्ट जैसे कई लोग अपना जीवन होम कर रहे हैं।जो जहां बैठा है वहीं डरा हुआ है तो भला जनता के बीच से जाने वाले अधिकारी होने का जनता को लाभ क्या मिला? इससे बेहतर तो अंग्रेज या मुस्लिम शासक ही थे।जो बिकाऊ नहीं थे।घिन आती है इस सरकार के कार्य कर्ताओं पर जो बिल्किस बानो के परिवार के साथ बलात्कार और हत्या जैसे मामले के दंडित अपराधियों को सजा पूर्ण करने से पहले अच्छे आचरण के लिए छोड़कर उनका सार्वजनिक अभिनंदन करते हैं या आईटी के जिम्मेदार पद पर बैठे चुनाव प्रचारक स्टार तीन लोग बंदूक की नोक पर काशी विश्व विद्यालय में एक युवती के साथ बलात्कार करते हैं जिन्हें 60दिन बाद पकड़ा जाता है।ब्रजभूषण सिंह और कुलदीप सेंगर जैसे कई अपराधी भाजपा की शान हैं। अधिकारी और नेताओं की जुगलबंदी ग़ज़ब की है।
लोकतांत्रिक गणराज्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पत्रकार और लेखक, संस्कृति कर्मी होते हैं किंतु बड़े पैमाने पर बहुतेरे अखबार और चैनल एक पूंजीपति की गिरफ्त में हैं जिससे विरोध की आवाज़ जनता तक नहीं पहुंच पाती जिससे वे एक बेसुरा आवाज सुनने के आदी हो चुके हैं और उसे ही अपना सब-कुछ मान बैठे हैं।यही हाल लेखक और संस्कृति कर्मियों का है।जो मुट्ठी भर लोग अलख जगाने का काम करते हैं वे या तो जेल में पहुंचा दिए जाते हैं या उन्हें परेशानी झेलनी होती है।
आखिरकार दुनियां के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को वे कौन सी परिस्थितियां हैं जो इस मोड़ पर ले आई है इस पर जब हम विचार करते हैं तो हमें महात्मा गांधी जी की हत्या की घटना याद करना चाहिए।संघ की टुकड़े टुकड़े गैंग का एक संगठन हिंदू महासभा गांधी की हत्या खुलेआम करता है। तकलीफ़ उस संगठन को यह है कि वे मुस्लिम समुदाय को यहां रहने क्यों कहा गया है।सब मुसलमान पाकिस्तान जाने चाहिए हालांकि ना पाकिस्तान से पूरे हिंदू भारत आए और ना भारत से सभी मुस्लिम पाकिस्तान गए।पीड़ा उन्हें हिंदुओं के भारत आने की नहीं है उन्हें तमाम मुस्लिमों के ना जाने की है।यह वह गांठ है जो उनके मन में आज भी है।
इसलिए देश में आतंक गांधीजी की हत्या से फैलाना चाहते थे। देश तब नेहरू,पटेल जैसे लोगों के कारण बच गया।दूसरा हमला बाबरी मस्जिद की1992 तोड़फोड़ के रुप में सामने आया जब हिंदुओं को मुस्लिमों के ख़िलाफ़ उकसाया गया। इसके बाद हिंदूओं को मुस्लिमों के ख़िलाफ़ गोकशी, लव-जिहाद के नाम पर भड़काकर कई हत्याएं कराईं गई। सन् 2002 में गुजरात नरसंहार ने मुसलमानों को दहशत में ला दिया।इन तमाम घटनाओं का उन्होंने शांति से भी प्रतिकार उचित नहीं समझा।वे चुप्पी साध लिए।इसके बाद आज भी हर जगह वे परेशान हैं गरीबों की झोपड़ियां जहां तहां बुलडोजर दबोचता नज़र आ जाता है।कभी उनका हिजाब पहनना नागवार हो जाता है तो कभी अनावश्यक इल्ज़ाम लगाकर स्कूल ही बंद करा देता है।कभी नमाज़ की आवाज़ चुभने लगती है।कुल मिलाकर इरादा ये है देश में रहना है तो हम जैसा चाहें वैसा रहना होगा।सीधी सच्ची बात यह है वे यह नहीं जानते कि संविधान में प्रदत्त अपने अधिकारों का लोग प्रयोग करें।
अब उनका दखल राजनीति से धार्मिक केंद्रों में बढ़ चला है राम मंदिर के शिलान्यास से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा तक सब कुछ वही करेंगे। मंदिरों जैसे पावन तीर्थ अब कारपोरेट के हाथ पहुंचा दिए गए जहां अब गरीब को 300₹ की टिकिट पर ही जाने मिलेगा।ये अब गरीबों के तीर्थ नहीं वे अमीरों के पर्यटन केन्द्र होंगे। वाराणसी के बाद उज्जैन और अब अयोध्या भी इस कड़ी में जुड़ गया है।मौजू सवाल ये है कि राम की मूर्ति प्रतिष्ठा में भी राजनीति की घुसपैठ शुरु हुई है संत,महंत और चारों शंकराचार्य इससे नाराज़ हुए किंतु सर्वशक्तिमान को अपनी ताकत का गुमान था और वहीं हुआ जो वह चाहता था।भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच यजमानी करते लगभग 7000 कथित साधुओं और देश के हर वर्ग के अमीरों ने उसे साक्षात विष्णु स्वरूप में देखा और मुग्ध हुए। अयोध्या वासी जिनके पुरखे थे राम वे घरों में बंद प्रसारण देखते रहे।क्या यह हमारे संविधान की घोर अवमानना नहीं है? बाल्मीकि हवाई अड्डे का महत्व भी अब समझ में आ गया।
देश में शिक्षा, स्वास्थ्य रोजगार जैसी महत्वपूर्ण इकाईयों की जगह मंदिरों ,हवाई अड्डे, विशेष सुविधा युक्त ट्रेन, चमचमाती रिंगरोड और डिब्बा वा पैकेट बंद अनाज सब्ज़ियां,फल देकर विदेशों जैसी चमक धमक से आम जनता को क्या मिलेगा?ये तमाम सुविधाएं चंद लोगों की पसंद हो सकती हैं। जिनके पास नाजायज धन होगा।
कुल मिलाकर आम जनता के तमाम हक धीरे धीरे ध्वस्त होते जा रहे हैं उसकी बात ना संसद और ना ही विधानसभाओं में सुनी जा रही है। अधिकारियों का रुख भी ठीक नहीं , न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद आमजन को नहीं तो ये कैसा गणतंत्र हमारा ? सबसे दुखद पहलू तो यह है कि मकर-संक्रांति से मणिपुर से प्रारंभ भारत जोड़ो न्याय यात्रा जो कांग्रेस की चल रही है उसे भी अलोकतांत्रिक तरीके से भाजपा शासित राज्यों में बेवजह सताया जा रहा है।22जनवरी जब राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह हो रहा था तब राहुल गांधी को असमिया संत श्री शंकरदेव मठ में प्रवेश नहीं दिया गया जिसे असम के लोगों ने काला दिन कहा।आज जब संविधान विरोधी कार्य चरम पर हैं तब भारत जोड़ो और न्याय की संकल्प यात्रा महत्वपूर्ण है। तानाशाही आलम में एक किरण बतौर राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन ही नज़र आता है। उन्हें आम लोगों तक सच्ची बात पहुंचानी होगी।भारत जोड़ो अभियान के बाद इंडिया गठबंधन यदि इस तानाशाह के खिलाफ भारत जोड़ो न्याय यात्रा में अपने मज़बूत इरादों के साथ कठिन पथ पर साथ चलते हैं तो तस्वीर अभी भी बदल सकती है। पहली जन की आवाज़ मतदाता के मतदान की सुरक्षा है जहां से न्याय सुनिश्चित होगा।दूसरी बात संविधान बचाने की है। संविधान रहेगा तो सब कुछ सलामत रहेगा वरना अधिकार विहीन प्रजा के लिए गणतंत्र मनाना उचित नहीं होगा। आइए संविधान अमर रहे जयकारा करने के साथ इसे बचाने प्रतिबद्ध हों।यह बचेगा तभी गणतंत्र रहेगा। गणतंत्र दिवस मनाएं ज़रुर। शुभकामनाएं।