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औचित्य क्या है मीडिया और सियासी ट्रायल का!?

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 पुष्पा गुप्ता 

    _भारत में हर दिन विभिन्न अपराधों में हज़ारों मुकदमें दर्ज़ होते हैं। वे सारे मुकदमें सही नहीं होते।एक मोटे अनुमान के अनुसार सही मुकदमों का प्रतिशत पचास से ज्यादा नहीं होता। शेष या तो बिल्कुल झूठे होते हैं या आंशिक रूप से सही होते हैं। ऐसा भी होता है कि अपराध तो घटित होते हैं, लेकिन अभियुक्तों के नाम पूर्व रंजिशों के कारण या ब्लैकमेल करने के उद्देश्य से भी दिए जाते हैं।_

        मुकदमे और अभियुक्तिकरण की सच्चाई तक पहुंचने के लिए पुलिस को अनुसंधान के लिए कुछ समय चाहिए होता है। कानून भी उसे इस काम के लिए दो से तीन महीनों तक का समय देता है। मीडिया की अति सक्रियता और राजनीति के अनावश्यक हस्तक्षेप की वजह से पिछले कुछ वर्षों में एक खतरनाक प्रवृत्ति ने जन्म लिया है।

         जिन मामलों में राजनेताओं के लिए सियासी लाभऔर मीडिया के लिए सनसनी फैलाकर टी.आर.पी बढ़ाने की गुंजाइश होती है, उनमें मुकदमे दर्ज होते ही बिना गुण-दोष की विवेचना के अभियुक्तों की गिरफ्तारी का दबाव बनाया जाता है। यह दबाव पुलिस प्रायः झेल नहीं पाती।

      होना तो यह चाहिए कि जांच पूरी करने के बाद दोषियों की गिरफ्तारी कर उन्हें न्यायालय के सुपुर्द किया जाय। हो यह रहा है कि सियासी आंदोलनों और मीडिया के दबाव में आरोपियों या संदिग्धों की गिरफ्तारी पहले हो जाती है और उनके विरुद्ध साक्ष्य बाद में एकत्र किए जाते हैं। यह न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के प्रतिकूल है। 

आतंकवाद के मामलों में तो हालात और भी ज्यादा बुरे हैं। ऐसे ज्यादातर मामलों में पुलिस पर सियासत और मीडिया का भारी दबाव होता है।

इस दबाव में अक्सर मात्र संदेह के आधार पर कई निर्दोष लोग गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। ऐसी गिरफ्तारियां पुलिस अपनी सक्रियता दिखाने के लिए या बड़े अधिकारियों के दबाव में भी करती है। गिरफ्तारी हो गई तो गलत गिरफ्तारी के आरोपों से बचने के लिए पुलिस अपुष्ट या काल्पनिक साक्ष्यों के आधार पर आरोपपत्र भी दे देती है।

     बरसों मुकदमें चलते हैं और ट्रायल के बाद ज्यादातर लोग साक्ष्य के अभाव में रिहा भी हो जाते हैं। अपनी निर्दोषिता प्रमाणित करते-करते कई लोगों की एक उम्र गुज़र जाती है। हाल के कुछ वर्षों में आतंकवाद के झूठे आरोप में कई-कई साल जेलों में काटने के बाद निर्दोष घोषित होकर घर लौटे कुछ लोगों के इंटरव्यू पढ़िए तो दिल भर आता है।

       दुर्भाग्य से ऐसे अन्याय के शिकार लोगों को उनकी गलत गिरफ्तारी के लिए मुआवजा देने का भी कोई प्रावधान हमारे कानून में नहीं है। मुआवजा मिल भी जाय तो जेलों में गुजरे उनकी ज़िंदगी के इतने सारे साल कोई कैसे लौटाएगा या उनके परिवार द्वारा भोगी गई व्यथा की भरपाई कोई कैसे कर सकेगा ?

युवाओं को ये चीजें व्यवस्था के प्रति आक्रोश और विद्रोह से भर देती हैं।

     न्याय का तकाज़ा है कि विधि-व्यवस्था के कुछ बहुत गंभीर मामलों को छोड़कर किसी भी अन्य मामले में गिरफ्तारी की पुलिस की असीमित शक्तियों पर रोक लगाई जाए। ज्यादातर मामलों में पुलिस अपने इस अधिकार का दुरुपयोग ही करती है। बिना किसी साक्ष्य के सिर्फ संदेह और अनुमान पर लोगों की गिरफ्तारी पुलिस थानों में एक आम बात है।

       अनुमानतः पुलिस द्वारा विभिन्न मामलों में गिरफ्तार किए गए लोगों में साठ प्रतिशत से भी ज्यादा लोग न्यायालय द्वारा निर्दोष पाकर छोड़ दिए जाते हैं। यह संविधान द्वारा प्रदत्त लोगों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण है। गिरफ्तारी पुलिस के लिए एक सामान्य और रूटीन प्रक्रिया हो सकती है मगर गिरफ्तार होने वाले निर्दोष लोगों और उनके परिजनों के लिए यह सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक बर्बादी और कभी-कभी जीवन-मरण का भी प्रश्न होता है।

       जेल, बेल और ट्रायल की बेहद लंबी, उबाऊ और जटिल प्रक्रिया को झेल पाना किसी के लिए सामान्य बात नहीं। यह सिलसिला ज्यादातर लोगों को मानसिक और भावनात्मक तौर पर तोड़ देता है। परिवार के परिवार बर्बाद हो जाते हैं।  

  होना यह चाहिए कि किसी भी मामले में पुलिस बिना किसी दबाव या प्रभाव के अपराध की विवेचना करे।

 अभियुक्तों के खिलाफ साक्ष्य एकत्र कर उसे न्यायालय में प्रस्तुत करे। साक्ष्यों से न्यायालय के संतुष्ट होने पर ही पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की कार्रवाई की जाय। न्याय का यह बुनियादी सिद्धांत है कि सौ अपराधी चाहे छूट जाएं, एक भी निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए।

     इस मामले में देश का वर्तमान परिदृश्य हताश करने वाला है। यहां न्याय तबतक संभव नहीं होगा जबतक पुलिस के पास संवेदनशील हृदय, आमजन से सीधा संवाद और किसी भी दबाव के पार देखने और टिकने की आंतरिक शक्ति न हो। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगता नहीं कि हमारी पुलिस अभी इसके लिए तैयार है। उसपर सत्ता का बेहिसाब दबाव है।

       फिलहाल इतना तो किया ही जा सकता है कि गिरफ्तारी के उसके असीमित अधिकार पर कुछ अंकुश लगाया जाए।

    जरूरी यह भी है कि किसी अपराध के घटित होने के बाद देश के विपक्षी और सत्ताधारी दल भी वोट बैंक के गणित से ऊपर उठकर थोड़ा संयम बरतें। किसी अपराध में अभ्युक्तिकरण की सत्यता की जांच लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है।

 पुलिस को अपना काम करने दें। अपराध के घटते ही गिरफ्तारी के लिए कोई भी आंदोलन अनैतिक और न्याय के सिद्धांत के प्रतिकूल है। आंदोलन का औचित्य और सार्थकता तब है जब पर्याप्त समय लेने के बाद भी पुलिस अपना काम ठीक से नहीं करे। ऐसे मामलों में जनमत बनाने में एक बड़ी भूमिका मीडिया की होती है। जरुरी है कि मीडिया द्वारा किसी आपराधिक मामले के ट्रायल पर प्रतिबंध लगे।

       _खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अति और अनावश्यक सक्रियता ने समाधान नहीं, समस्या ही ज्यादा पैदा की है। मीडिया को यह समझना होगा कि उसका काम खबरें और तथ्य दिखाना भर है, आपराधिक मामलों में फ़ैसले सुनाना नहीं।_

(स्रोत : ‘अमृत विचार’ अख़बार)

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