शहीद-ए-आजम भगत सिंह जन्म दिवस पर*
हरनाम सिंह
100 वर्ष पूर्व देश का सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य वह नहीं था जो आज है। तब देश औपनिवेशिक गुलामी का दंश झेल रहा था। आजादी के लिए संघर्ष जारी था, यही नहीं सामाजिक स्तर पर भी धर्म, जाति, लिंग भेद पर बहस चल रही थी। छुआछूत, वर्ण व्यवस्था पर गांधी अंबेडकर आपस में जूझ रहे थे। उसके पूर्व धार्मिक पाखंड के खिलाफ स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर राजा राम मोहन राय, पेरियार द्वारा अनेक सवाल उठाए जा चुके थे। तब देश में न तो इतने अखबार थे, नहीं संचार के साधन। बावजूद इसके सभी विवादों की तपिश समाज तक पहुंच रही थी। ऐसी प्रष्ठभूमि में ही भगत सिंह अपनी वैज्ञानिक तर्क बुद्धि के साथ बताते हैं कि *मैं नास्तिक क्यों हूं*।
भगत सिंह की शहादत को लगभग 91 साल हो चुके हैं। देश में संचार क्रांति जारी है। अखबारों की प्रचार क्षमता के साथ सोशल मीडिया का यह दौर है। धार्मिक यात्राओं, मेलों धर्म स्थलों, तकरीरों, प्रवचनों की भरमार है। बलात्कारी, हत्यारे महिमामंडित हो रहे हैं। पाखंड अपने चरम पर है। सच को झूठ और झूठ को सच प्रमाणित तथ्य बताया जा रहा है। ऐसे माहौल में भगत सिंह की शहादत के प्रभाव पर सवाल उठाए जाने चाहिए। क्या भगत सिंह ने ऐसे ही भारत के लिए ही आत्मोत्सर्ग किया था ?
*क्या अधिकार है भगत सिंह का नाम लेने का ?*
मई 1928 में “कीर्ति” पत्रिका में भगत सिंह “अराजकतावाद” शीर्षक से लिखे लेख में सवाल करते हैं कि….. वे लोग जो महल बनाते हैं और झोपड़ियों में रहते हैं…. गंदी और पुरानी चटाईयों पर सोते हैं। ऐसी स्थिति यदि भूतकाल में रही है तो भविष्य में क्यों नहीं बदलाव आना चाहिए ? 94 वर्ष पूर्व जिनके बारे में भगत सिंह चिंतित थे क्या उन परिस्थितियों में कोई परिवर्तन आया है ? निश्चित ही नहीं। हर शहर, महानगर में झोपड़पट्टी, फुटपाथ पर सोते करोड़ों लोग शासकों की नीतियों की विफलता का जीता जागता प्रमाण है। क्या ऐसे शासकों और शासक दल को जिन्होंने भगत सिंह के स्वप्न को तोड़ने का अपराध किया है, उन्हें भगत सिंह का नाम लेने का भी अधिकार है ?
कीर्ति पत्रिका में ही “सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज” शीर्षक से लिखे लेख में भगत सिंह याद दिलाते हैं कि… ” 1914 – 15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसलिए गदर पार्टी जैसे आंदोलन में सिख बढ़-चढ़कर फांसी पर चढ़े, हिंदू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे। वर्तमान में धर्म की आड़ लेकर, आपसी सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ कर, भ्रष्ट अनैतिक तरीकों से सत्ता के शिखर तक पहुंचने वालों को भगत सिंह का नाम लेने का अधिकार है ?
*सक्षम होने के लिए पढ़ो*
वर्तमान संचार क्रांति के दौर में झूठ को सच साबित करने के विश्व विद्यालय खुल चुके हैं। व्हाट्सएप युनिवर्सिटी और राजनीतिक दलों के आइ टी सेल की सूचनाओं को ही अंतिम सत्य प्रचारित किया जा रहा है। ऐसे प्रचारकों का एक नया समूह बन गया है जिसे “भक्त” के रूप में पहचाना जाता है। 5 अक्टूबर 1930 को “मैं नास्तिक क्यों हूं ?” लिखे आलेख में भगत सिंह अपने बारे में कहते हैं कि… मैं रोमांटिक, आदर्शवादी क्रांतिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अध्ययन की पुकार मेरे मन के गलियारे में गूंज रही थी। विरोधियों द्वारा रखे गए तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिए पढ़ना जरूरी है। अपने मत के समर्थन में तर्क देने के लिए सक्षम होने के वास्ते भी अध्ययन करना है। क्या सत्ता, राजनीतिक स्वार्थ के लिए झूठ फैलाने वालों को भगत सिंह का नाम लेने का अधिकार है ?
फांसी के तख्ते पर शहादत देने के 67 दिन पूर्व 15 जनवरी 1931 को लाला रामशरण दास के कविता संग्रह “ड्रीमलैंड” की भूमिका में भगत सिंह ने लिखा… भविष्य के समाज में हम धर्मार्थ संस्थाएं स्थापित करने नहीं जा रहे हैं। बल्कि उस समाज में न गरीब होंगे न जरूरतमंद, न दान देने वाले न दान लेने वाले…। आजादी के 75 वर्ष बाद देश की 80 करोड़ जनता को 5 किलो अनाज पर आश्रित रखने वालों को भगत सिंह का नाम लेने का अधिकार है ? सोच कर देखिए।
हरनाम सिंह

