डॉ. विकास मानव
(यह लेख पैरासाईकॉलोजी संबंधी मेरे अध्ययन- अन्वेषण, वैदिक दर्शन, मरते हुए लोगों के गहन अवलोकन, मरकर जिंदा हो चुके लोगों के साक्षात्कार, और ध्यान के अनुभव पर आधारित है। ऐसा यत्न करके आप भी देख सकते हैं; कुछ और मिले या कु़छ अलग मिले तो हमें व्हाट्सप्प 9997741245 पर बता सकते हैं।)
आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है। कई बार लोग बता भी देते हैं कि अब हमारा समय खत्म। कई बार लोग निश्तित समय तक बता देते हैं।
इस दौरान-
‘मनुष्य’ स्वयं भी हथियार डाल देता है क्योंकि वह आत्मा को शरीर में बनाये रखने का भरसक प्रयत्न करके हार चुका होता है और इस चक्कर में भारी कष्ट झेल चुका होता है।
अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है । सारा अतीत मानस पटल पर सिनेमा के पर्दे की फिल्म के मानिंद प्रत्यक्ष। सत्कर्मों के अभाव के कारण अमूमन वह दृष्य देखने लायक नहीं होता और इंसान सिहर उठता है।
उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिये शरीर के पाँच प्राण (एक ‘धनंजय यानी मुख्य प्राण’ को छोड़कर) शरीर से बाहर निकलना आरम्भ कर देते हैं।
ये प्राण, आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिये सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं।
यह शूक्ष्म शरीर ही ये पंचभौतिक शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है।
धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है।
बहरहाल :
अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते हैं कि व्यक्ति को पता चल जाता है। उसे बे-चैनी होने लगती है, घबराहट होने लगती है।
सारा शरीर फटने लगता है, खून की गति धीमी होने लगती है।
सांस उखड़ने लगती है।
बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं। अर्थात अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्च्छा आने लगती है।
फिर पूरी मूर्च्छा आ जाती है और आत्मा एक झटके से किसी भी खुली हुई इंद्री से बाहर निकल जाती है।
इसी समय चेहरा विकृत हो जाता है। यही आत्मा के शरीर छोड़ देने का मुख्य चिन्ह होता है।
इससे पहले घर के आसपास कुत्ते-बिल्ली के रोने की आवाजें आती हैं। इन पशुओं की आँखे अत्याधिक चमकीली होती है। जिससे ये रात के अँधेरे में तो क्या सूक्ष्म-शरीर धारी आत्माओं को भी देख लेते हैं।
जब किसी व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार होती है तो उसके ‘पुनर्जन्म न पाए हुए’ सगे-संबंधी- मित्र मृतात्माओं के तौर पर सामने आ जाते हैं।
वे उसे लेने आते हैं और व्यक्ति उन्हें भी यमदूत की सेना समझता है। कुत्ते-बिल्ली उन्हें साधारण जीवित मनुष्य ही समझते हैं और अन्जान होने की वजह से उन्हें देखकर रोते हैं और कभी-कभी भौंकते भी हैं।
शरीर के पाँच प्रकार के प्राण बाहर निकलकर उसी तरह सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं। जैसे गर्भ में स्थूल-शरीर का निर्माण क्रम से होता है।
सूक्ष्म-शरीर का निर्माण होते ही आत्मा अपने मूल वाहक धनंजय प्राण के द्वारा बड़े वेग से निकलकर सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है।
आत्मा शरीर के जिस अंग से निकलती है उसे खोलती, तोड़ती हुई निकलती है।
जो लोग भयंकर पापी होते है उनकी आत्मा मूत्र याँ मल-मार्ग से निकलती है। जो पापी भी है और पुण्यात्मा भी है उनकी आत्मा मुख से निकलती है। जो पापी कम और पुण्यात्मा अधिक है उनकी आत्मा नेत्रों से निकलती है और जो पूर्ण धर्मनिष्ठ हैं, पुण्यात्मा और योगी पुरुष है उनकी आत्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है।
अब शरीर से बाहर सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हुआ रहता है। लेकिन ये सभी का नहीं हुआ रहता।
जो लोग अपने जीवन में ही मोहमाया से मुक्त हो चुके योगी पुरुष हैं : उन्ही के लिये तुरंत सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हो पाता है।
जो लोग मोहमाया, दुराचार से ग्रस्त है परंतु बुद्धिमान है ज्ञान-विज्ञान से अथवा पांडित्य से युक्त है । ऐसे लोगों के लिये दस दिनों में सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है।
वैदिक धर्म-शास्त्रों में – दसगात्र का श्राद्ध और अंतिम दिन मृतक का श्राद्ध करने का विधान इसीलिये है।
यानी जिससे इन दस दिनों में शरीर के दस अंगों का निर्माण इस विधान से पूर्ण हो जाये और आत्मा को सूक्ष्म-शरीर मिल जाये।
ऐसे में, जब तक दस गात्र का श्राद्ध पूर्ण नहीं होता और सूक्ष्म-शरीर तैयार नहीं हो जाता आत्मा, प्रेत-शरीर में निवास करती है।
अगर किसी कारण वश ऐसा नहीं हो पाता है तो आत्मा प्रेत-योनि में भटकती रहती है।
एक और बात :
आत्मा के शरीर छोड़ते समय व्यक्ति को पानी की बहुत प्यास लगती है. शरीर से प्राण निकलते समय कण्ठ सूखने लगता है।
ह्रदय सूखता जाता है और इससे नाभि जलने लगती है। लेकिन कण्ठ अवरूद्ध होने से पानी पिया नहीं जाता और ऐसी ही स्तिथि में आत्मा शरीर छोड़ देती है।
प्यास अधूरी रह जाती है । इसलिये अंतिम समय में मुख में ‘गंगा-जल’ डालने का विधान है।
इसके बाद आत्मा का अगला पड़ाव होता है शमशान का ‘पीपल’। यहाँ आत्मा के लिये ‘यमघंट’ बंधा होता है। जिसमे पानी होता है। यहाँ प्यासी आत्मा यमघंट से पानी पीती है जो उसके लिये अमृत तुल्य होता है।
इस पानी से आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है।
खास बात:
जो इंसान अपनी अंतस्चेतना को बेहतर भावनात्मक-संवेदनात्मक-क्रियात्मक भोजन देकर- विकसित कर लेता है : यानी जो स्वस्थ (‘स्व’ में स्थित) हो चुका होता है, ‘वह’ इस तरह किस्तों में नहीं मरता है।
वह अपने को अवस/विवस/असहाय/निरूपाय/लाचार नहीं पाता।
वह मायामुक्त/तृप्त हो चुका होता है : इसलिए उसे यूं भयाक्रांत-पीडित होकर रूदन में शरीर छोड़ने को मजबूर नहीं होना पड़ता।
जैसे ‘वह’ प्रकट जीवन में अपना ध्यान किसी-भी विषय पर केंद्रित कर खुद को अभिव्यक्त करने में सक्षम होता है, वैसे ही अंतत: देहत्याग में भी वह सक्षम होता है।
‘वह’ अपने प्राणों को सेन्ट्रलाइज्ड करके सहजता से, ‘तृप्ति की अवस्था में ही’ शूक्ष्म शरीर में प्रवेश ले लेता है।
इसमें कदाचित उसकी अपनी मर्जी भी शामिल होती है।
⚡चेतना विकास मिशन

