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महाराष्ट्र में हुए करप्शन का क्या है सच

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गंगाधर ढोबले
महाराष्ट्र में कोविड के दौरान हुए भ्रष्टाचार को लेकर आरोपों की गहमागहमी है। हाल में इन आरोपों को लेकर मुंबई में सौ करोड़ रुपये के घोटाले की FIR भी दर्ज हो चुकी है। जिस समय महामारी चल रही थी, उस समय उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में कांग्रेस-शिवसेना-NCP गठबंधन की सरकार थी और विपक्ष में बीजेपी। मुंबई महानगरनपालिका में भी उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना सत्ता में थी। अब पांसा पलट गया है। बीजेपी सत्ता में है और ठाकरे गुट विपक्ष में। बहरहाल, बीजेपी के पूर्व सांसद किरीट सोमैय्या एक के बाद एक चौंकाने वाले आरोप लगाकर ‘एंटी-करप्शन क्रूसेडर’ की भूमिका में हैं।

क्या हैं आरोप

सत्ता छिन गई, लेकिन सरकार में रहते हुए लगे आरोप आज भी पीछा नहीं छोड़ रहे (Photo: PTI)

खर्च की प्रशासकीय व्यवस्था के कारण भी संदेहों को बल मिला है। विभिन्न कोविड सेंटरों के लिए जरूरी सामानों की खरीदी के अधिकार वार्ड स्तर पर उपायुक्तों को दिए गए थे। आरोप है कि महानगरपालिका के एक अधिकारी ने कुर्ला ‘एल’ वार्ड का आरटी-पीसीआर टेस्ट किट्‌स सप्लाई का ठेका एक ऐसी कंपनी को दिया, जिससे उनके पिता जुड़े हुए थे। अस्पतालों में ऑक्सिजन प्लांट लगाने का ठेका एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी को दिया गया। ऑक्सिजन, ऑक्सिजन टैंक्स और ऑक्सिजन प्लांट को लगने वाले सामानों की खरीदी भी संदेह के घेरे में है।

2018 से 2022 के बीच यानी कोरोना काल में शिवसेना (उद्धव गुट) के यशवंत जाधव बीएमसी स्थायी समिति के अध्यक्ष थे। जाधव पर मार्च 2022 में आयकर विभाग ने छापा मारा। आयकर सूत्रों का दावा था कि घोटाले से जुड़े अहम दस्तावेज उनके हाथ लगे हैं। इस जांच का आगे क्या हुआ, किसी को पता नहीं है। इस दौरान सेंट्रल विजिलेंस से भी कोविड घोटाला आरोपों की जांच की बातें चल रही थीं। बीजेपी की सीबीआई जांच की मांग भी बरकरार थी।

जांच की जुगाली
अब सरकार बदल गई है, जिसमें बीजेपी भी शामिल है। पिछले वर्ष 31 अक्टूबर को सरकार ने जांच कैग को सौंप दी। यह अभी साफ नहीं है कि क्या कैग की जांच के साथ सीबीआई भी इसकी जांच करेगी? इन आरोपों में कितना तथ्य है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। अक्सर राजनीतिक उठापटक में ऐसे आरोप लगते रहते हैं। जांच की जुगाली चलती रहती है। हो सकता है जांच की रिपोर्ट आते तक मुंबई महानगरपालिका के चुनाव आ जाएं। अनुभव कहता है कि चुनाव आदि के समय उछले मुद्दे चुनाव के बाद ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। समय के साथ नए-नए मुद्दे आ जाते हैं और पुराने मुद्दे विस्मृत होने लगते हैं।

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