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ये कैसा बेबसी का आलम है, ना किसी का साथ है ना किसी का सहारा

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आयुषी जैन 
ये कैसी बेबसी का आलम आ गया है। इससे पहले इस जीवन में इस तरह की बेबसी और लाचारी  कभी नहीं देखी जहां लोग एक दूसरे का सहारा तो बनना चाहते है, लेकिन हालातों के आगे मजबूर है. लोग अपनों के आसूं पोछने के लिए हाथ तक नहीं बड़ा पा रहे हैं. मरीज़ इलाज के लिए इंतज़ार कर रहे है और परिजन उनका हाल जानने के लिए तड़प रहे है. शायद ऐसा आलम पहले कभी नहीं देखा होगा. हर तरफ बेबसी लाचारी और निराशा है.
कोई चाहकर भी एक दूसरे की मदद के लिए खुलकर आगे नहीं आ पा रहा है. हर किसी के मन में मौत का खौफ घर कर गया है. लाखों-करोड़ों के इंफ्रास्ट्रक्चर, मशीनें, टेक्नोलॉजी कुछ नहीं कर पा रहे है. देश का हर छोटा बड़ा सरकारी और प्राइवेट हॉस्पिटल मरीजों से सटा पड़ा है. अस्पतालों के बाहर सैकड़ों मरीजों की लाइन लगी है. परिजनों के रोने की आवाज़ से दिल सहर उठता है.
किसी माँ ने अपनी जवान की उम्मीद खो दी हैं तो कई सुहागन चंद महीने भी खुशियां नहीं मना पाई. बच्चों का पिता के लिए रोता हुआ मासूम सा चेहरा नज़रों के सामने से हटता ही नहीं. लाखों रुपया बहाने के बाद भी जिंदगी की कोई किरण नहीं नज़र आ रही है. फिर भी हम लाचार है. कहीं तो डॉक्टर नहीं मिल रहे और अगर मिल भी जाए तो इंजेक्शन के लिए मारामारी. कालाबाज़ारी से गरीब और हताश होते देखा जा रहा है. 
ऐसे वक़्त में जहां सभी को एक दूसरे के साथ की जरुरत है कई लोग दवाओं की कालाबाज़ारी कर अपनी जेब भरने में लगे हुए है. रोते हुए फिर भी लोग अपनों की जान बचाने के लिए जेब खाली कर रहे है. जो सोशल मीडिया तस्वीर शेयर करने के लिए होता था आज वह  प्लाज्मा, ऑक्सीजन, ब्लड, बेड, हॉस्पिटल, वेंटीलेटर की मदद की गुहार लगा रहा है. इसके बाद भी कई लोगों को समय पर मदद नहीं मिल पा रही है. 
अस्पताल के नाम से पहले जहां लोग दूर भागते थे, वहीं आज उस अस्पताल में एडमिट होने को अपना सौभाग्य मान रहे है. जिन्हे अस्पताल में बेड नहीं मिल रहा है, उनकी बेबसी और पीड़ा बयान नहीं की जा सकती. ऑक्सीजन की अहमियत आज पता चली, इसके टैंकर देख कर लोगों में ऐसी ख़ुशी है मानों किसी देवता के दर्शन हो गए हो. लोगों में खौफ इस कदर बैठ चुका है कि स्वस्थ होते हुए भी वह अपने घरों में ऑक्सीजन के सिलेन्डर जमा करने लगे है. सभी को इस बीमारी ने ऐसा लाचार कर दिया है कि सभी यह सोच रहे है न जानें कब मौत सामने आकर खड़ी हो जाए. इस बीमारी के आगे इंसान पूरी तरह से लाचार नज़र आ रहा है.उम्मीद की कोई किरण भी नज़र नहीं आ रही है.
इस हालात को देखकर मुझे वाजपेयी जी की ये लाइनें याद आती है- “रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। और आज वाकई परिस्तिथिया ऐसी हो गई हैं कि मौत जिंदगी से बड़ी हो गई हैं”
अपना ध्यान रखिए – 
इस मुश्किल घड़ी में प्रशासन, शासन, नेता कोई साथ नहीं दे रहा है। अगर आप कोरोना पॉजिटिव है तो पहले आपको अस्पताल नही मिलेगा। अगर मिल भी गया तो ऑक्सीजन नहीं मिलेगी। ऑक्सीजन मिल गई तो वेंटीलेटर नहीं मिलेगा अगर मिल भी गया तो आपकी ज़िंदगी बचाने वाली दवा नहीं मिलेगी। इसलिए आप खुद का ध्यान रखिए।

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