रजनीश भारती
निजी संपत्ति के आने से समाज में गैर बराबरी पैदा होती है क्योंकि निजी संपत्ति का चरित्र ही है सबके पास बराबर नहीं रह सकती। निजी संपत्ति को बराबर-बराबर बांट कर देख लीजिए कुछ दिन बाद फिर गैर बराबरी आ ही जाएगी आप हजारों बार बराबर-बराबर बांट दीजिए हर बार गैरबराबरी पैदा हो ही जाती है। निजी संपत्ति के समाज में बराबरी रही नहीं सकती। निजी संपत्ति के समाज में निश्चित रूप से 2 वर्ग होते हैं अमीर और गरीब, शोषक और शोषित, उत्पीड़क और उत्पीड़ित ।
मानव समाज में निजी संपत्ति के आने से सबसे पहले दो वर्ग बने – दास और दास मालिक। संपत्तिवान लोग दास मालिक बन गए और संपत्ति विहीन लोग दास बना लिए गए। दास मालिकों ने अपने वर्गहितों की रक्षा करने के लिये अपनी राजसत्ता बनायी अर्थात जेल,अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही आदि राज्य मशीनरी की व्यवस्था की। इस प्रकार हम देखते हैं की जहां औजार के रूप में डंडे का इस्तेमाल करने से मनुष्य ‘पशुओं’ से अलग हो कर कबीले में रहने लगा वहीं डंडे को मोड़ कर धनुष बना लेने से उसका कबीलाई समाज टूट गया और दास और दास मालिक समाज बन गया। दास और दास मालिक का समाज हजारों साल तक चलता रहा। इसी दौरान लोहे का आविष्कार हुआ। पहले नरम लोहे का आविष्कार हुआ फिर नरम लोहे को कड़ा करने की तरकीब खोज लिया गया। जब कड़े लोहे से लोहे की कुल्हाड़ी बनी तो लोहे की कुल्हाड़ी ने जंगलों की कटाई किया तब खेतों का विस्तार हुआ तब सामंतवाद का युग शुरू हुआ। आप खुद कल्पना कर सकते हैं कि उपजाऊ जमीन कभी भी नंगी नहीं रह सकती। वहां मोटे-मोटे पेड़ों के जंगल दिखाई देते हैं।
मोटे-मोटे पेड़ों को काटे बगैर खेती का विस्तार नहीं हो सकता था। पत्थर की कुल्हाड़ी से ये पेड़ कट नहीं सकते थे, लकड़ी की कुल्हाड़ी से भी ये पेड़ कट नहीं सकते थे केवल और केवल लोहे की कुल्हाड़ी से ही इन पेड़ों को काटा जा सकता था। लोहे की कुल्हाड़ी से पेड़ों की कटाई हुई जंगलों की सफाई हुई दूर-दूर तक खेतों का विस्तार हुआ है तब जमीन के बदले लगान की व्यवस्था आयी जिसे हम सामंती समाज कहते हैं। लोहे के आविष्कार से पहले के खेत बहुत ही छोटे थे तब पशुपालन मुख्य व्यवसाय था। पशुपालक वर्ग ही शासक वर्ग हुआ करता था। लोहे की कुल्हाड़ी के बाद ही खेतों और भूदासों का मालिक सामन्त वर्ग पैदा हुआ और भूदासों की मदद से दास मालिकों की सत्ता को ढहाकर खुद शासकवर्ग बना। यह सामंती समाज भी हजारों साल तक चलता रहा। इसी दौर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही काम करने तथा औजारों में लम्बे समय तक कोई गुणात्मक बदलाव न होने से जाति-व्यवस्था का भी जन्म हुआ। कालान्तर में सामंतवाद की कोख से पूंजीपतिवर्ग पैदा हुआ। दरअसल मध्ययुग के भूदासों में से प्रारम्भिक नगरों के अधिकारपत्र प्राप्त स्वतंत्र नागरिक(जैसे- शाही दर्जी, शाही बुनकर, शाही मोची, शाही लुहार…) पैदा हुए। इन्हीं स्वतंत्र नागरिकों में से बुर्जुआ वर्ग के प्रथम तत्त्वों का विकास हुआ। 18 वीं सदी में जब भाप की शक्ति का आविष्कार हुआ, भाप का इंजन बना, तब वह भाप का इंजन यार्कशायर, लंकाशायर, मैनचेस्टर की मिलों में गया जिससे वहां विराट पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन शुरू हुआ। भाप की शक्ति से चलने वाले विराट पैमाने के पूंजीवादी उत्पादन ने हाथ के श्रम पर आधारित सामंती दौर के उत्पादन को बाजार से खदेड़कर बाहर कर दिया इस प्रकार शक्ति संतुलन पूंजीपतियों के पक्ष में हो गया। इन पूंजीपतियों ने सामंती राजाओं, महाराजाओं और सम्राटों के राजतन्त्र को बलपूर्वक उखाड़ फेंकना शुरू किया और अपना पूंजीवादी लोकतंत्र कायम किया। इन्हीं पूंजीपतियों की एक कमेटी “ईस्ट इण्डिया कम्पनी” ने हमारे देश भारत के राजाओं महाराजाओं को बलपूर्वक हराया और उन्हें गुलाम बनाया और कालान्तर में ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने ही “फूट डालो शासन करो” की नीति के तहत भारत में पूंजीवादी साम्राज्यवादी लोकतंत्र कायम किया।
“ईस्ट इण्डिया कम्पनी” भारत में राज करने की नीयत से नहीं आयी थी, वह तो व्यापार करने की इच्छा से आयी थी। देशी राजा भी “ईस्ट इण्डिया कम्पनी” का गुलाम बनने की इच्छा से उन्हें नहीं बुलाये थे। मगर इतिहास ने यह सिद्ध किया कि सामाजिक बदलाव किसी की इच्छाओं के कारण नहीं होता बल्कि इच्छाएं भी समाज के बदलने से उसी के अनुसार बदल जाती हैं हालाकि बाद में ये इच्छायें सामाजिक बदलाव में भी अपनी भूमिका निभाती हैं।
अपने काम को आसान बनाने के लिए मजदूर जिन औजारों को बनाते हैं, उन औजारों के इस्तेमाल से समाज में भी बदलाव आ जाते हैं। मगर वे पहले से इसका अन्दाजा नहीं लगा पाते। जहां घर्षण से आग पैदा करने के औजारों के आ जाने से बर्बर युग का मानव समाज सभ्यता के युग में प्रवेश किया और वर्गीय समाज की परिस्थिति बनी गयी वहीं आग से घर्षण (भापशक्ति) के पैदा होने पर वर्ग विहीन समाज की परिस्थिति बनने लगी। भापशक्ति की खोज करने वाले जेम्सवाट ने केतली के ढक्कन को उठाकर निकलने वाली भाप की शक्ति को देखा तो केतली के ढक्कन पर कोयले का टुकड़ा रख दिया, थोड़ी देर बाद देखा कि भाप की शक्ति ने कोयले के टुकड़े समेत ढक्कन को उठा कर फेंक दिया। इस घटना से जेम्सवाट ने सिर्फ यही आंकलन किया था कि भाप में शक्ति है इसकी शक्ति से मशीनें चलाई जा सकती हैं, वह यह आंकलन कत्तई नहीं कर पाया था कि जो भाप की शक्ति कोयले के टुकड़े समेत केतली के ढक्कन को उठाकर फेंक दे रही है, यही भाप की शक्ति दुनिया भर के तमाम राजाओं-महाराजाओं,और सम्राटों को उनके तख्त और ताज समेत उठाकर इतिहास के कूड़ेदान में फेंक देगी, इसका अन्दाजा जेम्सवाट को नहीं था। परन्तु इतिहास गवाह है उधर भाप का इंजन बना और यार्कशायर, लंकाशायर तथा मैनचेस्टर की मिलों में गया उसके बीस साल बीतते-बीतते दो दर्जन से अधिक देशों में ‘यूनियन जैक’ का झंडा लहराने लगता है।
तथाकथित देशभक्तों ने प्रचार करवाया कि- “गांधीजी ने चर्खे से आजादी दिला दी” परन्तु यह सच नहीं है, क्योंकि जब अट्ठारहवीं सदी में भापशक्ति से चलने वाली बड़ी मशीनों से सस्ता कपड़ा पैदा करके अंग्रेज हमारे बाजार पर कब्जा कर रहे थे, तब तो हमारे पास करोड़ों चर्खे थे, अगर चर्खे से आजादी की लड़ाई जीत सकते थे तो हम गुलाम ही क्यों होते। कुछ जातिवादी क्षत्रिय बुद्धिजीवियों का कहना है कि “हमारे राजपूत राजा बड़ी बहादुरी से लड़े, परन्तु आपसी फूट के कारण हार गए।” पर इन्हें यह नहीं मालूम कि अंग्रेज तो असल लड़ाई बाजार में लड़ रहे थे। वहां उनका मुकाबला करने वाला कोई राजपूत नहीं था। कुछ जातिवादी दलित बुद्धिजीवियों का भी दावा है कि “अगर ब्राह्मणों ने शूद्रों को भी लड़ने का अधिकार दिया होता तो भारत गुलाम न होता।” इनको भी भापशक्ति का अंदाजा नहीं है। अंग्रेजों ने इन्हीं के कुटीर उद्योगों को अपनी भाप शक्ति से कुचलकर इन्हें भुखमरी के कगार पर ढकेल दिया था।
दिलचस्प यह है कि सवर्ण और अवर्ण दोनों में से बहुत से नौजवान अंग्रेजों की सेना में भर्ती होकर देश को गुलाम बना रहे थे। दलित वर्ग के कुछ संविधानवादियों का दावा है कि ‘भारतीय संविधान लागू होने से दलितों का सवर्णों के यहां हलवाही करने से छुटकारा मिल गया।’ परन्तु सच्चाई यह है कि संविधान लागू होने से नहीं बल्कि खेती में ट्रैक्टर लागू हो जाने से उनकी हलवाही छूट सकी। उत्पादन के औजारों के अनुसार सामाजिक संबंध भी बनते-बिगड़ते और विकसित होते हैं जैसे डंडा उठा लेने से मनुष्य बंदरों या जंगली जानवरों से अलग होता गया, उसी तरह डंडे को मोड़कर धनुष बना लेने से उसका कबीला टूट जाता है दास और दासमालिक का समाज आ जाता है और ठीक उसी तरह से लोहे के आविष्कार और लोहे की कुल्हाड़ी के बन जाने से जंगलों की कटाई और खेती का विस्तार होता है तब दास और दासमालिक वाला समाज ध्वस्त हो जाता है उसके स्थान पर जमीन के बदले लगान अर्थात सामंती समाज का निर्माण हो जाता है। इसके बाद भाप के इंजन का आविष्कार होता है तो उसके बल पर पूंजीपतिवर्ग सामंती समाज को तोड़कर अपनी पूजीवादी राजसत्ता की स्थापना करता है। भापशक्ति से चलने वाले विराट पैमाने के उत्पादन के लिये जो सामूहिकता बनती है, उससे समाजवाद की परिस्थितियां तैयार होने लगती हैं।
*क्रमशः भाग 4 में…..*
*रजनीश भारती**राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा उ. प्र.*

