~ कुमार चैतन्य
पत्नी अनपढ़ हो या पढ़ी-लिखी. गांव वाली हो कस्बे वाली हो या शहर या महानगर वाली. सभी का दिमाग विधाता एक ही फैक्टरी में, एक ही फर्में से बनाता है।
आप उस दिमाग की कुछ बानगी देखिए :
चावल में पानी ज्यादा डाल दी तो :
- “चावल नया था.”
रोटियाँ बिगाड़ दी या जला दी तो :
- “कमबख्त, अच्छे से पिसा आटा नहीं दिया.”
चाय में चीनी ज्यादा डाल दी तो :
- “शक्कर ही मोटी थी.” चाय अच्छी नहीं बनाई तो :
- “दूध में पानी ज्यादा था,”
शादी या किसी फंक्शन में जाते समय :
-“कौन सी साड़ी पहनूं..? मेरे पास तो एक भी अच्छी साड़ी ही नहीं है।”
घर पर जल्दी आ गए तो :
-“आज जल्दी कैसे आ गए ?”
लेट हो गए तो :
- “इतने वक़्त तक कहाँ थे ?”
कोई चीज सस्ती मिल जाए तो :
- “बेकार चीज ले आए, तुमको सभी फंसा देते हैं.”
महंगी लाए तो :
- “तुमको किसने कहा था लाने को ?”
अच्छा खाना मिलने पर आपने खाने की तारीफ़ कर दो तो :
‘ मैं तो रोज ऐसा ही खाना बनाती हूँ.”
खाने को बे-स्वाद कहा तो :
” तुमको तो मेरी कदर ही नहीं.”
कोई काम करो तो :
” एक काम कभी ढंग से करते नहीं.”
और न किया तो :
“तुम्हारे भरोसे रहे तो कोई काम नहीं होने वाला.”
पति के लिए कारगर नुस्खा :
1 ). खुद का ध्यान रखें. सदा अपनी जुबान नियंत्रित रखें।
2). उनका मुंह खुलते ही शांत रहने का प्रयास करें वरना मुंह खुलने लायक ही न रहेगा।
3). मुंह खोलने से पहले हजार बार सोचना है और कुछ बोलते ही डरना है।
4). आप पर प्रभु की कितनी भी नेमत हो लेकिन इस मामले में वो भी कभी आपका साथ नहीं दे पाएंगे. ये सदैव याद रखना है।
स्त्रियों से दो शब्द :
पुरुषों के पास मायका नहीं होता. ना कोई ऐसा आँगन, जहाँ वे निःसंकोच लौट सकें. जहाँ कोई माथा चूमकर कहे- “थक गए हो न? थोड़ा आराम कर लो.”
वे चलते रहते हैं निरंतर. एक पुत्र, एक पति, एक पिता बनकर. अपने कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लिए. कभी ‘खुद के लिए’ ठहर नहीं पाते.
कभी मन भारी हो तो कहाँ जाए? ना कोई गोद जहाँ सिर रखकर सिसक सकें. ना कोई दीवार जहाँ अपना दिल टिका सकें. उसे बचपन से सिखाया गया है- “मर्द बनो, मजबूत रहो!”
पर क्या मजबूत होने का अर्थ अपनी भावनाओं को मार देना है? क्या “रो कर हल्का हो लेना” सिर्फ़ औरतों का हक़ है?
काश, स्त्री समाज समझ पाता कि पुरुष भी इंसान होते हैं. उनके भी दिल धड़कते हैं. उन्हें भी कभी-कभी सिर्फ़ एक एक प्यार भरी थपकी चाहिए होती है. उन्हें भी एक अदद ऐसा इंसान चाहिए होता है, जो कह सके – “कोई बात नहीं, मैं हूँ न!”

