दिव्यांशी मिश्रा
स्त्रियों को हम कहते है,
पति को परमात्मा समझना।
उन स्त्रियों को
बचपन से सिखाया गया है कि
सेक्स पाप है।
वे कल विवाहित होंगी।
वे उस पति को कैसे परमात्मा मान सकेंगी,
जो उन्हें सेक्स में और नरक में ले जा रहा है।
एक तरफ हम सिखाते हैं
पति परमात्मा है और पत्नी का अनुभव कहता है कि
यह पहला पापी है जो मुझे नरक में घसीट रहा है।
एक सहेली ने मुझसे कहा–
कि मैं बहुत गुस्से में हूँ, मैं बहुत क्रोध में हूँ।
सेक्स तो बड़ी घृणित चीज है। सेक्स तो पाप है।
मैं तो घृणा करती हूँ सेक्स को।
अब यह पत्नी है इसका पति है,
इसके बच्चें हैं।
बच्चियाँ है।
और यह पत्नी सेक्स से घृणा करती है।
यह पति को कैसे प्रेम कर सकेगी।
जो इसे सेक्स में लिए जा रहा है।
यह उन बच्चों को कैसे प्रेम कर सकेगी।
जो सेक्स से पैदा हुए है। इसका प्रेम जहरीला हो गया है।
इसके प्रेम में जहर छिपा है।
पति और उसके बीच
एक बुनियादी दीवाल खड़ी हो गयी है।
बच्चों और इसके बीच
एक बुनियादी दिवाल खड़ी हो गयी है
क्योंकि वे सेक्स से पैदा हुए हैं।
ये बच्चें पाप से आये हैं।
क्योंकि यह सेक्स की दीवाल और
सेक्स की कॉन्डेमनेशन की वृत्ति बीच में खड़ी है।
यह पति और मेरे बीच पाप का सम्बन्ध है,
और जिनके साथ पाप का सम्बन्ध हो,
उसके प्रति मैत्रीपूर्ण कैसे हो सकते हैं ?
पाप के प्रति हम मैत्रीपूर्ण हो सकते हैं ?
सारी दुनिया का गृहस्थ जीवन नष्ट किया है,
सेक्स को गाली देने वाले,
निन्दा करने वाले लोगों ने।
और वे इसे नष्ट कर के जो दुष्परिणाम लाये हैं
वह यह नहीं है कि सेक्स से लोग मुक्त हो गये हों।
जो पति अपनी पत्नी और अपने बीच
एक दीवाल पाता है पाप की,
वह पत्नी से कभी भी तृप्ति अनुभव नहीं कर पाता।
तो आसपास की स्त्रियों को खोजता है,
वेश्याओं को खोजता है।
अगर पत्नी से उसे तृप्ति मिल गयी होती तो शायद
इस जगत की सारी स्त्रियाँ उसके लिए
माँ और बहन हो जातीं।
लेकिन पत्नी से भी तृप्ति न मिलने के कारण
सारी स्त्रियाँ उसे पोटेंशियल औरतों की तरह,
पोटेंशियल पत्निओं की तरह मालूम पड़ती हैं।
जिनको पत्नी में बदला जा सकता है।
यह स्वाभाविक है यह होने वाला था।
यह होने वाला था,
क्योंकि जहाँ तृप्ति मिल सकती थी।
वहाँ जहर है।
वहाँ पाप है।
और तृप्ति नहीं मिलती।
और वह चारों तरफ भटकता है और खोजता है।
और क्या-क्या ईजादें करता है खोज कर आदमी।
अगर इन सारी ईजादों को हम सोचने बैठे तो
घबड़ा जायेंगे कि आदमी ने क्या-क्या ईजादें की हैं।
लेकिन एक बुनियादी बात पर खयाल नहीं किया कि
वह जो प्रेम का कुआँ था,
वह जो काम का कुआँ का,
वह जहरीला हो गया है।
और जब पत्नी और पति के बीच
जहर का भाव हो,
घबड़ाहट का भाव हो,
पाप का भाव हो तो फिर
यह पाप की भावना रूपान्तरण नहीं करने देगी।
अन्यथा मेरी समझ यह है कि
एक पति और पत्नी अगर एक दूसरे के प्रति
समझपूर्वक प्रेम से भरे हुए आनन्द से भरे हुए और
सेक्स के प्रति बिना निन्दा के
सेक्स को समझने की चेष्टा करेंगे तो आज नहीं कल,
उनके बीच का सम्बन्ध रूपान्तरित हो जाने वाला है।
यह हो सकता है कि
कल वहीं पत्नी माँ जैसी दिखायी पड़ने लगे।
गान्धी जी 1930 के करीब श्रीलँका गये थे।
उनके साथ कस्तूरबा साथ थीं।
संयोजकों ने समझा कि
शायद गान्धी जी की माँ साथ आयी हुई हैं।
क्योंकि गान्धी जी कस्तूरबा को खुद भी बा ही कहते थे।
लोगों ने समझा शायद उनकी माँ होंगी।
संयोजकों ने परिचय देते हुए कहा कि
गान्धी जी आये है और बड़े सौभाग्य की बात है कि
उनकी माँ भी साथ आयी हुई हैं।
वह उनके बगल में बैठी हैं।
गान्धी जी के सैक्रेटरी तो घबड़ा गये कि
यह तो भूल हमारी है,
हमें बताना था कि साथ में कौन है।
लेकिन अब तो बड़ी देर हो चुकी थी।
गान्धी तो मञ्च पर जा कर बैठ भी गये थे
और बोलना शुरू कर दिया था।
सैक्रेटरी घबड़ाये हुए हैं कि गान्धी पीछे क्या कहेंगे।
उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि
गान्धी नाराज नहीं होंगे,
क्योंकि ऐसे पुरूष बहुत कम हहैं,
जो पत्नी को माँ बनाने में समर्थ हो जाते हैं।
लेकिन गान्धी जी ने कहा, कि सौभाग्य की बात है,
जिन मित्र ने मेरा परिचय दिया है ।
उन्होंने भूल से एक सच्ची बात कह दी।
कस्तूरबा कुछ वर्षों से मेरी माँ हो गयी हैं।
कभी वह मेरी पत्नी थीं।
लेकिन अब वह मेरी माँ हैं।
इस बात की सम्भावना है कि
अगर पत्नी और पति
“सम्भोग” (परम आनंद का एक समान भोग) को समझने की चेष्टा करे तो
एक दूसरे के मित्र बन सकते है और
दूसरे के काम के रूपान्तरण में
सहयोगी और साथी हो सकते हैं।
लेकिन पत्नि परमेश्वरी शब्द ही नहीं बना. वह दासी है, भोग्या है, गुलाम है, बच्चे जनने की मशीन है और बिना वेतन की मैनेजर है.
(चेतना विकास मिशन)

