शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज बहुत ही अलहदा मानसिकता में दिखाई दिए। आज मिलते ही दार्शनिक चर्चा करने लग गए।
उनके हाथों में समाचार पत्र था। जिस पृष्ठ पर धार्मिक समाचार प्रकाशित होतें हैं, वही पृष्ठ पढ़ रहे थे।
मुझ से पूछा आपने ये खबर पढ़ी?
मैने पूछा कौनसी?
ये खबर पढ़ों, लाखों श्रद्धालू भगवान के दर्शन के लाभार्थी बनने के आतुर कतार में खड़े होकर अपने नम्बर का इंतजार कर रहें हैं।
सावन मास में शिवजी के दर्शन के लाभार्थी बनेंगे।
भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण भगवान की आराधना में लीन होंगे इसी मास में आराध्य भगवान प्रथमेश मतलब श्री गणेश भगवान की निरंतर दस दिनों तक आराधना में मगन रहेंगे।
इसके पश्चात अपने पुरखों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्धपक्ष में उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें खीर पूरी का भोग लगाएंगे।
इतना कहते हुए सीतारामजी भाव विभोर हो गए। उनका गला रुंध गया आँखे नम हो गई।
मैने उनकी प्रशंसा करते हुए आप व्यंग्यकार होते हुए भी इतने भावुक हो आज पता चला।
सीतारामजी ने कहा भावुक क्यों न हूँ। मेरे अपने देश में असंख्य श्रद्धावान लोग हैं, यह जानकर क्यों कोई भावुक नहीं होगा?
हम दोनों की भावपूर्ण चर्चा चल ही रही थी।
उसी समय सीतारामजी के घनिष्ठ मित्र राधेश्यामजी का आगमन हुआ।
राधेश्यामजी के बारें में सीतारामजी ने मुझे पहले ही बता दिया था कि, राधेश्यामजी बहुत नकारात्मक सोच रखतें हैं।
राधेश्यामजी के साथ पारस्परिक नमस्ते करने की परंपरा का निर्वाह हुआ।
सीतारामजी ने राधेश्यामजी से पूछा आज कैसे आना हुआ कोई विशेष बात है?
राधेश्यामजी ने कहा इनदिनों समाचार देखने सुनने का मन ही नहीं करता है।
सीतारामजी ने पूछा क्यों?
राधेश्यामजी ने कहा, अर्थनीति समझ में नहीं आती है, चार सौ और कुछ रुपयों का एलपीजी सिलेंडर महंगा ग्यारह सौ का सस्ता? चालीस से साठ रुपये लीटर पेट्रोल महंगा, सौ से ऊपर का सस्ता? क्या क्या गिनवाए?
खाद्यान्न भी महंगा है। सब्जियों के दाम आसमान छू रहें हैं।
एक ओर धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की उपस्थिति में बेतहाशा वृद्धि ही रही है।
दूसरी ओर कईं राज्यों में मनरेगा योजना के अंतर्गत,कार्यरत असंख्य मजदूरों द्वारा उनके किए गए श्रम का पारिश्रमिक प्राप्त करने के लिए,मजदूर पिछले छः महिनों से अधिक समय से याचना कर रहें हैं।
बेरोजगारों की कतार भी बहुत लंबी है।
अपने देश के अपने ही देशवासी खाद्यन्न में,दूध में, घी में, दवाइयों में मिलावट करने इतने निपुण है कि, नकली असली में फर्क करना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन है।
मन्दिरों में श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धा से जो चढ़ावा अर्पित किया जाता है उसका रीसेल होता है। ऐसा सुनने में आता है। अभी इस खबर की सत्यता के कोई ठोस सबूत नहीं मिल पाया है?
शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक, माध्यमिक, पाठशालाओं और महाविद्यालय से ज्यादा लाभ का व्यापार तो ट्यूशन क्लासेस का बिजिसेन हो गया है।
आश्चर्य होता है,यह सुनकर अपने देश के भाविकर्णधार अपने स्वयं के देश में शिक्षा प्राप्त करने के बजाए विदिशों में पढ़ने जाना बहुत ही अभिमान की बात समझते हैं।
इस अभिमान को मूर्त देने के लिए उन्हें विद्यार्थी जीवन में ही कर्ज का बोझ अपने काँधों पर उठाना और अपने मानस पटल पर ढोंना पड़ता है।
एक सांस में राधेश्यामजी इतना कुछ कह गए और अभी उनकी वाणी में पूर्ण विराम की गुंजाइश दिख नहीं रही थी।
यह समझतें हुए सीतारामजी ने उन्हें चुप करने के लिए विषयान्तर करतें हुए पूछा आपका पौते और पौती का क्या हुआ, वह भी किसी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जा रहें हैं?
राधेश्यामजी ने बहुत ही गर्व के साथ कहा हाँ यह खुशी की बात तो बताना भूल ही गया।
मेरा पौता विकास और पौती प्रगति दोनों ही अगले माह USA जा रहें हैं। पता है पूरा दो करोड़ का लोन लिया है?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

