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*गांधी जब एक भंगी परिवार में जन्मे तो…..फिल्म ‘कल्लू गांधी’* 

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दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में कार्यरत रहते हुए कैलाश चंद दिल्ली के थियेटरों में सक्रिय रहे। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के उपरांत भी वे इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी एक फिल्म ‘कल्लू गांधी’ का निर्माण किया है। बीते 3 सितंबर, 2025 को वे फारवर्ड प्रेस के दफ्तर आए। इस मौके पर उन्होंने अपनी फिल्म के अलावा फिल्म जगत में दलिताें की हिस्सेदारी व विषयों आदि के सवालों पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित अंश

‘कल्लू गांधी’ का विचार पहली बार कब आया?

वह 1985 का साल था। तब तक मैं दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में नौकरी पा गया था। लेकिन थियेटर के प्रति मेरे मन में आकर्षण था। सामान्यत: मैं रामलीला में विभिन्न किरदार निभाता था। यहां तक कि मैंने कैकेयी की भूमिका भी निभाई और रावण भी बना। इस तरह से मैं अभिनय तो करता था, लेकिन तब तक मैं थियेटर से जुड़ा नहीं था। जब नौकरी मिली तब मंडी हाउस की तरफ जाने लगा। उसी दौरान मन में ख्याल आया और फिर कई लोग मिले, जिनके कारण थियेटर से मेरा जुड़ाव हो गया। रही बात ‘कल्लू गांधी’ की तो यह उसी साल जेहन में आया। मैंने कुछ नोट्स लिख रखा था। फिर जब 2020 में कोरोना काल आया तब मैंने इसे पूरा किया।

तो पहले आपने नाटक के रूप में लिखा और बाद में इस पर फिल्म बनाने की सोची?

हां, लिखा तो नाटक के रूप में ही था। लेकिन फिर लगा कि इस नाटक में पात्रों की संख्या अधिक है। कम से कम 70-80 कलाकार तो चाहिए ही। अब इतने अधिक संख्या में कलाकारों के साथ नाटक करना एक महंगा उद्यम है। ठीक है कि अनेक कलाकार साथी हैं, लेकिन उनके आने-जाने में खर्च तो होता ही है। इसके अलावा उन्हें कुछ न कुछ देना ही पड़ता है। इस कारण यदि ‘कल्लू गांधी’ को नाटक के रूप में पेश करता तो एक बार मंचन करने पर कम से कम एक लाख रुपए का खर्च तो होता ही। इसमें नाटक के लिए हॉल बुक करने का खर्च भी शामिल है। और नाटकों के मंचन में एक समस्या यह आती है कि नाटक को अधिक से अधिक एक बार में सौ-दो सौ लोग ही देख पाते हैं। लिहाजा मैंने सोचा कि इस पर एक फिल्म ही बनाई जाए ताकि यह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके।

आरंभिक परेशानियां क्या रहीं? हम इसे ऐसे कहें कि दलित समाज के कलाकार के सामने फिल्म निर्माण में किस तरह की चुनौतियां आती हैं?

देखिए, समस्याओं और चुनौतियों की कोई कमी नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि आज भी थियेटर और फिल्म जगत में दलित-पिछड़े समाज के कलाकारों की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम है। तो यह एक बड़ी चुनौती है। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि मैं एक रास्ते पर चलकर लोगों को दिखाना चाहता हूं कि फिल्म निर्माण की दिशा में भी दलित-पिछड़े आगे बढ़ सकते हैं। मैं आपको एक बात बताऊं कि एक बार मेरे एक मित्र मुंबई में फिल्म अभिनेता राजपाल यादव से मिलने गए। साथ में मैं भी था। राजपाल यादव बहुत सरल हृदय के आदमी हैं और बहुत सहज तरीके से बात करते हैं। उन्होंने मेरे मित्र द्वारा लिखी कहानी सुनी। वे उससे प्रभावित भी हुए। लेकिन उन्होंने कहा कि उनका मेहनताना बहुत अधिक है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि दलितों और पिछड़ों के सवालों पर वे भी एक फिल्म बनाना चाहते हैं। तो मैं यह कहना चाहता हूं कि मनोरंजन और फिल्म जगत में आदमी न केवल सपने देख सकता है बल्कि सपनों को सच भी कर सकता है।

रही बात ‘कल्लू गांधी’ के निर्माण में सामने आईं उन चुनौतियों की, जिन्हें मुझे झेलना पड़ा, तो उनमें मुख्य चुनौती तो फाइनांस की ही थी। पहले लगा कि दस-बारह लाख रुपए में सब निबट जाएगा। कुछ साथियों ने सहयोग का वादा भी किया। लेकिन बाद में वे अपनी समस्याएं बताने लगे। कुछ साथियों ने आर्थिक सहयोग किया भी। लेकिन वह सहयोग नाकाफी था। मैं दृढ़ निश्चय कर चुका था कि अब चाहे कुछ भी हो, इस फिल्म को बनाना ही है। इसलिए मैंने अपना एक फ्लैट बेचा।

हां, मैं संपा मंडल, बचन पचहेरा और केपी मौर्य सहित उन सभी कलाकार साथियों के प्रति आभारी हूं, जिन्होंने कहा कि तुम आगे बढ़ो और जो कुछ भी मुट्ठी बंद करके दोगे, हमें स्वीकार होगा।

‘कल्लू गांधी’ की कहानी के बारे में बताएं?

देखिए, इस फिल्म की कहानी महात्मा गांधी की एक इच्छा पर आधारित है। इसके दस्तावेजी प्रमाण हैं कि वर्ष 1927 में उन्होंने अपनी यह इच्छा व्यक्त की थी कि मेरा पुनर्जन्म हो तो एक भंगी के परिवार में हो। यही इस फिल्म की कहानी है कि गांधी जब एक भंगी परिवार में जन्मे तो उन्हें किस तरह का जीवन जीना पड़ा। आपको इस फिल्म में भंगी परिवारों के रोजाना के जीवन में सामने आनेवाली परेशानियों के बारे में देखने को मिलेगा। आप देख सकेंगे कि किस तरह आज इक्कीसवीं सदी में वे नारकीय जीवन जी रहे हैं। कहने को हमारा देश आजाद है, देश में संविधान है, लेकिन उनके साथ किस तरह जातिगत भेदभाव किया जाता है। यहां तक कि उन्हें आज भी अछूत ही माना-समझा जाता है। आज भी लोग उनके हाथ का छुआ पीना या खाना पसंद नहीं करते।

जब आप इस कहानी को लिख रहे होंगे तब आपकी जेहन में डॉ. आंबेडकर का आंदोलन भी रहा होगा?

बिल्कुल, लेकिन देखिए मूल बात यह है कि भंगी समाज के लोगों में यह बात लगभग बिठा दी गई है कि गांधी बाबा ने भंगियों के लिए बहुत कुछ किया। लेकिन वास्तव में गांधी जी ने अछूतोद्धार कार्यक्रम इसलिए चलाया ताकि उन्हें हिंदू फोल्ड में बनाए रखा जा सके। यह असल में एक षड्यंत्र था। आपको इस फिल्म में यह सारा विमर्श देखने को मिलेगा। और यह भी कि यह मसला केवल वर्गीय नहीं है, नस्लीय है। नहीं तो आप ही सोचिए कि जिन्हें वे हिंदू कहते हैं या बनाए रखना चाहते हैं, उनके प्रति इतनी घृणा की वजह क्या हो सकती है?

‘कल्लू गांधी’ और महात्मा गांधी के बीच कोई समानता?

समानता जैसी कोई बात नहीं है। वैसे इसे आप समानता कह भी सकते हैं कि महात्मा गांधी को भी ब्राह्मणवादी ताकतों ने मार डाला था और कल्लू गांधी को भी ब्राह्मणवादी ताकतें मार देती हैं।

इस फिल्म में एक गाना है– “जिनके नगर न आए राम, जिनके पास नहीं धन-धाम, अब उनकी बारी है”। कृपया इसके बारे में बताएं।

इस गाने को के.पी. मौर्या जी ने लिखा है। यही वह संदेश है जो यह फिल्म देना चाहती है। यह सभी वंचित समाजों को धार्मिक पाखंडों और अंधविश्वासों से मुक्त होने का आह्वान करती है।

आपने इस फिल्म का निर्माण कॉमर्शियल फिल्म के रूप में नहीं किया है। फिर आपका उद्देश्य क्या है?

फिलहाल तो मैं इस फिल्म को फिल्म फेस्टीवल में भेज रहा हूं। अभी सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र के लिए आवेदन भी नहीं किया है। मैं चाहता हूं कि फेस्टीवल के माध्यम से लोग इस फिल्म को बिना किसी काट-छांट के देखें। इसे ओटीटी प्लेटफार्म पर भी लाने की योजना है। आजकल कुछ ओटीटी पर फिल्में दिखाने के लिए सेंसर बोर्ड की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।

आप स्वयं थियेटर के अनुभवी कलाकार हैं। फिल्म में आपकी भूमिका क्या है?

फिल्म की पटकथा मैंने लिखी है। प्रोड्यूसर भी मैं ही हूं। लेकिन निर्देशन शाहिद कबीर ने किया है। इसके अलावा मैंने फिल्म में एक दलित (जाटव) शिक्षक की भूमिका का निर्वहन किया है जो कल्लू को गांधी बनने से सचेत करने की कोशिशें करता है।

हाल के वर्षों में यह भी देखने को मिल रहा है कि फिल्म जगत दलित-बहुजनों के विमर्श व सवालों तवज्जो दे रहा है। इसे आप कैसे देखते हैं?

आपने सही कहा। अभी तो देखिए कि करण जौहर को भी इसमें कूदना पड़ा है। उनकी फिल्म ‘धड़क-2’ इसका उदाहरण है। मूल बात यह है कि वे अब यह समझ गए हैं कि यदि हम इन सवालों को नहीं दिखाएंगे तो दलित-पिछड़े स्वयं ही आगे आ जाएंगे। तो इस कारण से उनके अंदर यह आशंका भी है।

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