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जब मेधा अपराध बन जाए

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शिक्षा के बहाने, पहचान की राजनीति और लोकतंत्र की चुपचाप हत्या

–        तेजपाल सिंह ‘तेज’

1. प्रस्तावना: लोकतंत्र मरता कैसे है ;

          लोकतंत्र कभी एक झटके में नहीं मरता। वह न तो तख्तापलट से ढहता है, न ही किसी एक क़ानून से समाप्त होता है। लोकतंत्र मरता है धीरे-धीरे, छोटे-छोटे निर्णयों में, “नियमों” और “मानकों” के नाम पर, और सबसे अधिक—समाज की सहमति या चुप्पी से। जब किसी देश में यह पूछना शुरू हो जाए कि किस धर्म के कितने छात्र हैं, और यह प्रश्न शिक्षा, योग्यता और भविष्य से बड़ा हो जाए—तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र अब जीवित कम, औपचारिक अधिक है। जम्मू के रियासी जिले में स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल एक्सीलेंस का प्रकरण इसी धीमी मृत्यु का एक अध्याय है

2. शिक्षा : समान अवसर का आख़िरी किला

शिक्षा वह अंतिम क्षेत्र होता है, जहाँ समाज यह मानकर चलता है कि

·        यहाँ पहचान नहीं, योग्यता बोलेगी

·        यहाँ धर्म नहीं, मेधा निर्णायक होगी

·        यहाँ भविष्य का निर्माण होगा, बहिष्कार नहीं

लेकिन जब मेडिकल कॉलेज भी धार्मिक संतुलन के प्रयोगशाला बन जाएँ, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि समान अवसर की अवधारणा अब केवल भाषणों में बची है

3.  एनएमसी का निर्णय : तकनीकी या राजनीतिक?

          भारत की सर्वोच्च चिकित्सा नियामक संस्था राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने “गंभीर खामियों” का हवाला देकर कॉलेज की एमबीबीएस मान्यता रद्द कर दी। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि खामियाँ थीं या नहीं। प्रश्न यह है कि—

·        यदि खामियाँ थीं, तो अनुमति दी कैसे गई?

·        यदि अनुमति सही थी, तो वापसी इतनी त्वरित क्यों हुई?

·        और यदि यह केवल तकनीकी मामला था, तो आंदोलन, जश्न और राजनीतिक बयानबाज़ी क्यों? नियामक संस्थाएँ जब सत्ता के शोर के बीच निर्णय लें, तो उनका तकनीकी होना भी राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं रहता।

 4. “संघर्ष” का असली स्वरूप:

          कॉलेज में 50 में से 40 से अधिक सीटों पर मुस्लिम छात्रों का चयन हुआ—नीट मेरिट के आधार पर। इसके बाद अचानक “संघर्ष” शुरू हो गया। यह संघर्ष न अस्पताल की सुविधाओं को लेकर था, न शिक्षकों की संख्या को लेकर, न छात्रों की सुरक्षा या गुणवत्ता को लेकर। यह संघर्ष केवल एक प्रश्न पर केंद्रित था—“इतने मुसलमान कैसे?” यह प्रश्न शिक्षा का नहीं, बहुसंख्यक असुरक्षा का है। और जब बहुसंख्यक असुरक्षा को धर्म, राष्ट्र और संस्कृति की भाषा मिल जाती है, तो वह आंदोलन नहीं, उन्माद बन जाती है।

5.  जश्न : नैतिक पतन का सार्वजनिक उत्सव

          कॉलेज की मान्यता रद्द होने पर मिठाइयाँ बाँटी गयी, ढोल बजे, और इसे “धर्म की जीत” कहा गया। यह क्षण इस पूरे प्रकरण का सबसे भयावह क्षण है। क्योंकि यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि—

·        बच्चों का भविष्य नष्ट होना स्वीकार्य है

·        शिक्षा का बंद होना उत्सव बन सकता है

·        और अल्पसंख्यक की हार को सामूहिक संतोष में बदला जा सकता है

          “यही वह बिंदु है, जहाँ समाज नैतिक रूप से दिवालिया हो जाता है।”

6. भाजपा और राज्य सत्ता : मेरिट का सशर्त समर्थन:

          भाजपा और उससे जुड़े नेताओं ने इस निर्णय को “मानकों की जीत” बताया।

लेकिन यह वही सत्ता है, जहाँ—

·        कई राज्यों में मानकों से नीचे के संस्थान वर्षों तक चलते रहते हैं

·        राजनीतिक संरक्षण योग्यता से ऊपर होता है

·        और नियम केवल वहीं सक्रिय होते हैं, जहाँ वे पहचान को नियंत्रित कर सकें

यहाँ मेरिट का समर्थन सशर्त है—जब तक मेरिट बहुसंख्यक कथा को चुनौती न दे।

7.  उमर अब्दुल्ला : विवेक की आवाज़, सत्ता के बाहर ;

          जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का प्रश्न— “जश्न किस बात का है?” यह प्रश्न लोकतंत्र का प्रश्न है। लेकिन आज लोकतंत्र ऐसे प्रश्नों से संचालित नहीं होता।
आज वह बहुमत, शोर और भावनात्मक उकसावे से संचालित होता है।

 8. मुस्लिम छात्र : लोकतंत्र के सबसे असुरक्षित नागरिक:

          इस प्रकरण ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि भारत में मुस्लिम होना अब केवल धार्मिक पहचान नहीं, स्थायी संदेह की स्थिति है। मुस्लिम छात्र—

·        मेहनत करे → भी शक

·        सफल हो → और बड़ा शक

·        संख्या में दिखे → अपराध –यह लोकतंत्र नहीं, अनौपचारिक रंगभेद है।

9.  हिंदू समाज : चुप्पी की साझेदारी:

          इतिहास यह स्पष्ट करता है कि अन्याय केवल अत्याचारियों से नहीं होता,
वह मौन दर्शकों से भी होता है। जब समाज पूछना बंद कर दे—जब वह बच्चों के भविष्य पर जश्न देख कर भी असहज न हो— तो वह अन्याय का सहभागी बन जाता है।

10.  उपसंहार : यह केवल विदाई नहीं, चेतावनी है:

          वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज का बंद होना लोकतंत्र की विदाई का एक दृश्य मात्र है।
यह अंतिम अध्याय नहीं, बल्कि भूमिका है। आज मेडिकल कॉलेज, कल विश्वविद्यालय, फिर नौकरियाँ, फिर नागरिक अधिकार। लोकतंत्र तब नहीं मरता जब संविधान बदला जाता है,
वह तब मरता है जब संविधान अप्रासंगिक बना दिया जाता है। और तब इतिहास पूछेगा— जब मेधा अपराध बन रही थी, तब समाज किसके साथ खड़ा था?

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