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बागेश्वर के मोहन राम…जब ढोलक पर देते हैं थाप तो थिरक उठते हैं पहाड़….22 विधाओं के जादूगर

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बागेश्वर के रहने वाले मोहन राम 62 साल की उम्र में भी अपनी धुन और नृत्य से सभी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं. ढोल की 22 विधाओं में निपुण मोहन राम सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं बजाते, बल्कि कुमाऊं की लोक संस्कृति का जीवंत रूप प्रस्तुत करते हैं. उनके कार्यक्रम में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सब झूम उठते हैं. सोशल मीडिया पर उनके ढोल वादन और नृत्य के वीडियो वायरल हो रहे हैं. जिन्हें लोग काफी पसंद कर रहे हैं

बागेश्वर: जिले के गोगिना रातिरकेटी गांव के निवासी मोहन राम आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. 62 वर्ष की उम्र में भी उनके चेहरे पर वही चमक और शरीर में वही फुर्ती नजर आती है, जो किसी 18 साल के युवक में होती है. ढोल की थाप छेड़ते ही मोहन राम सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं बजाते, बल्कि कुमाऊं की लोक संस्कृति से जुड़ा ऐसा अनोखा नृत्य प्रस्तुत करते हैं, जो देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता है. उनकी कला में धुन, ताल और नृत्य का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो आज के दौर में बहुत कम नजर आता है. उन्हें ढोल की 22 विधाओं का ज्ञान है.

हर आयोजन में मिलता है ख़ास न्योता
गांव हो या शहर, शादी-ब्याह, नामकरण संस्कार, जागर, देवी-देवताओं के अनुष्ठान या कोई अन्य मंगल कार्य मोहन राम को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है. जैसे ही उनके आने की खबर फैलती है, बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी कार्यक्रम स्थल पर पहुंच जाते हैं. ढोल की गूंज के साथ जब मोहन राम नृत्य करते हैं, तो माहौल पूरी तरह उत्सव में बदल जाता है. लोग खुद को झूमने से रोक नहीं पाते और पूरा वातावरण लोक रंग में रंग जाता है.

मोहन राम की यही खासियत आज उन्हें सोशल मीडिया पर भी लोकप्रिय बना रही है. उनके ढोल वादन और नृत्य के वीडियो फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर ते

लोक कलाकारों की चुनौतियां
हालांकि इस लोकप्रियता के बीच मोहन राम के मन में एक गहरी पीड़ा भी है. वे कहते हैं कि उत्तराखंड की पारंपरिक लोक कला और वाद्य यंत्रों से जुड़े कलाकारों की स्थिति आज भी बहुत मजबूत नहीं है. ढोल-दमाऊं जैसे वाद्य यंत्र बजाने वाले कलाकारों को साल में कुछ ही अवसर मिलते हैं. एक-दो दिन का कार्यक्रम करने के बाद उन्हें हफ्तों और कई बार महीनों तक काम नहीं मिलता. इससे कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है.

मोहन राम का मानना है कि यदि सरकार लोक कलाकारों के लिए विशेष योजनाएं बनाए, तो यह कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है. नियमित मानदेय, प्रशिक्षण केंद्र, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थायी सहभागिता और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं मिलने से कलाकारों को मजबूती मिलेगी. वे कहते हैं कि ढोल-दमाऊं सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा हैं.

लोक संस्कृति को बचाने की जरूरत
अगर इन्हें संजोया नहीं गया, तो हमारी लोक संस्कृति धीरे-धीरे खो जाएगी. आज मोहन राम जैसे कलाकार अपनी मेहनत, जुनून और लगन से लोक संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं. जरूरत है कि समाज और सरकार मिलकर ऐसे कलाकारों को सम्मान और सुरक्षा दें, ताकि ढोल की थाप और लोक नृत्य की गूंज हमेशा पहाड़ों में सुनाई देती रहे.जी से वायरल हो रहे हैं. कई लोग उन्हें “चलती-फिरती लोक विरासत” कहने लगे हैं. दूर-दराज के इलाकों से भी लोग उनके कार्यक्रम देखने पहुंच रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें इस बात की खुशी है कि नई पीढ़ी उनकी कला को पसंद कर रही है और लोक संगीत के प्रति रुचि दिखा रही है.

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