–सुसंस्कृति परिहार
रक्षा-बंधन का पावन पर्व जब आता है तब हरिशंकर परसाई की याद बेखटके चली आती है उन्होंने अपनी बहिन सीता जो अल्पायु में वैधव्य को प्राप्त कर अपने बच्चों के साथ वापस आ गई थीं उनके लिए अपना सर्वस्व जीवन अर्पण कर दिया।दो दो सरकारी नौकरी छोड़ने पर भी उन्होंने दो बहिन रुक्मणि और सीता तथा भाई गौरीशंकर की जिम्मेदारी भलीभांति संभाली। यह जिम्मेदारी उनके पिताजी ने मृत्यु से चंद दिनों पूर्व उन्हें सौंपी थी।भाई गौरीशंकर तो एक नौकरी में टिक गए पर निष्फिकर रहे। सारा जिम्मा बहनों के पालन-पोषण और विवाह का परसाई ने संभाला। जिम्मेदारी का सिलसिला थोड़ा विराम ले ही रहा था कि सीता और उनके बच्चों के पालन पोषण जब फिर आ गया तो परसाई ने घनघोर लेखन किया और भाषण देने का मनमाफिक पैसा भी लिया ।लेखन के तेवर भी ऐसे कि उनके कई शत्रु भी बन गए। सरकार के खिलाफ भी खूब लिखा किंतु तत्कालीन सरकार ने उन्हें कभी नहीं सताया। बल्कि उनके लेखन की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।वे प्रेमचंद की तरह राजनीति की मशाल बने रहे । उन्होंने सबको सजग और सावधान करते हुए,शानदार साहित्य लिखकर अनूठी मिसाल कायम की। सबसे बड़ी बात ये कि वे अपनी मेहनत का पैसा भी दिलेरी से वसूलते रहे क्योंकि उनके सामने हरदम बहिन और बच्चों का चेहरा घूमता था। सबसे बड़ी बात यह कि अपनी बहिन की जिम्मेदारी की बदौलत वे आजीवन कुंवारे रहे।ऐसा पावन बहन के साथ बंधन अब कहीं देखने में मुश्किल से मिलेगा।

इतने ग़मों और हरिशंकर जैसे भाई के अभी ज़िंदगी ज़रा सी संतुष्ट नज़र आई ही थी कि 10अगस्त सन् 1995 की वह काली सुबह जिसने रक्षा-बंधन को सीता से हरिशंकर भाई को छीन लिया। सीता बहन के लिए वह सबसे दुःखकर क्षण जब वे भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए थाली सजा रहीं थीं। उनकी बहन पर यह बड़ा वज्रपात था। बंगाल बिहार में आज भी सीता नाम नहीं रखा जाता क्योंकि सीता का तमाम जीवन विपदाओं में बीता था। परसाई की बहन सीता की व्यथा इसे याद दिला देती है। बहरहाल वह अंधेरा दिन था हम सब के लिए घटाटोप अंधेरा छाया था बादलों का और वे अविरल अश्रुधार की तरह बरस रहे थे। परसाई जी को हज़ारों लोगों ने भीगते हुए नम आंखों से विदा किया। पड़ोसी नगर कटनी , दमोह में भी प्रकृति धार धार रो रही थी रास्ते उफनती नदियों के कारण बंद थे उनके चाहने वाले घर बैठे वहां पर पहुंच ना पाने का सोग मना रहे थे।
ऐसा रक्षा-बंधन भला कौन भुला सकता है।वे बरसात में ही इस भू पर आए थे और उसी घनघोर बरसात में सबको भिगोते प्रस्थान कर गए। परसाई जन्म शताब्दी पर उनका स्मरण देश भर में हो ही रहा है उनकी वैचारिकी की ज़रूरत पर विचार, काव्य, कार्टून, नृत्य,नाटक लघु नाटिकाएं आदि के ज़रिए हो रहा है। पाकिस्तान ने भी उन पर चित्रांकन किया है। किंतु उनके इस संवेदनशील मन को छूने की कोशिश कम की गई है।उनकी इस संवेदनशीलता ही ने उन्हें एक महान मानवतावादी लेखक बनाया है।उनके तमाम लेखन में एक दर्द और करुणा व्यंग्य के ज़रिए चीत्कार करती है।वह हास परिहास का विषय नहीं है। परसाई इसीलिए कहते हैं कि मेरे विचारों को सुनकर जो लोग ठहाका मारकर हंसते हैं लगता है जाके उनका जबड़ा तोड़ दूं।
परसाई जी चले गए किंतु लेखकों को जो संदेश देते रहे वो अमोल है वे लिखते हैं ‘मैंने लेखन को दुनिया से लड़ने के लिए एक हथियार के रूप में अपनाया होगा दूसरे, इसी में मैंने अपने व्यक्तित्व की रक्षा का रास्ता देखा तीसरे, अपने को अवशिष्ट होने से बचाने के लिए मैंने लिखना शुरू कर दिया। यह तब की बात है, मेरा ख्याल है, तब ऐसी ही बात होगी पर जल्दी ही मैं व्यक्तिगत दु:ख के इस सम्मोहन-जाल से निकल गया मैंने अपने को विस्तार दे दिया। दु:खी और भी हैं. अन्याय पीड़ित और भी हैं। अनगिनत शोषित हैं। मैं उनमें से एक हूं पर मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना सम्पन्न हूं,यहीं कहीं व्यंग्य – लेखक का जन्म हुआ।।मैंने सोचा होगा- रोना नहीं है, लड़ना है,जो हथियार हाथ में है, उसी से लड़ना है। मैंने तब ढंग से इतिहास, समाज, राजनीति और संस्कृति का अध्ययन शुरू किया। साथ ही एक औघड़ व्यक्तित्व बनाया और बहुत गंभीरता से व्यंग्य लिखना शुरू कर दिया मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता।मनुष्य की छटपटाहट है मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए।’
अपनी पुस्तक ‘हम इक उम्र से वाकिफ हैं’ में परसाई जी लिखते हैं कि मैंने अपने दु:खों का ढिंढोरा नहीं पीटा। लेखन के आरंभ में कुछ उद्वेलित हुआ था और बाद में एक लेख ‘गर्दिश के दिन’ में लिखा था कि मैं नही चाहता अपने दु:खों को बहुत महत्त्व देना, उन्हें महिमा मंडित करना और बड़े लेखक होने के लिए जो ‘मार्कशीट’ तैयार होती है उसमें दु:ख के विषय में अधिक नंबर जुड़वाना। अधिक दु:ख भोगने मात्र से कोई बड़ा लेखक नहीं होता। अधिक दु:ख भोगनेवाला चोर भी हो जाता है। किसी को बड़ा लेखक इसलिए नहीं माना जा सकता है कि उसने बहुत दु:ख भोगे हैं। सिर्फ हाय-हाय की कूची से कला में रंग नहीं भरे जाते।’
आइए हम सब भी तमाम दुखों से निजात पाने कलम रुपी हथियार उठाएं।
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