बगावत, विद्रोह और भरोसे की कमी से कांग्रेस जूझ रही है। ऐसे में पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पार्टी में नई क्रांति की मशाल जलाने की मुहिम पर हैं। राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ‘भारत जोड़ो’ यात्रा (Bharat Jodo Yatra) निकाल रही है, जो कि कन्याकुमारी से शुरू होकर श्रीनगर में खत्म होगी। यह यात्रा 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों से गुजरेगी और लगभग 150 दिनों की इस पदयात्रा में 3,570 किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब किसी राजनेता की तरफ से ऐसी कवायद हुई हो। बागी बलिया के युवा तुर्क कहे जाने वाले समाजवादी दिग्गज चंद्रशेखर ने भी 1983 में भारत भ्रमण किया था। देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस यात्रा को ‘भारत यात्रा’ नाम दिया था। इस यात्रा के जरिए उन्होंने बिखरती जनता पार्टी को एकसूत्र में पिरोया और कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा था। ऐसे में आइए जानते हें चंद्रशेखर की ‘भारत यात्रा’ का वो पूरा किस्सा क्या है?
चंद्रशेखर की भारत यात्रा की शुरुआत और मकसद
चंद्रशेखर ने 6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 तक कन्याकुमारी से राजघाट (महात्मा गांधी की समाधि) तक भारत यात्रा निकाली थी। यह मैराथन पदयात्रा 4260 किलोमीटर की थी। चंद्रशेखर की इस पदयात्रा का मकसद लोगों से मिलना और उनकी समस्याओं को समझना था। उन्होंने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में 15 भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की थी ताकि वे देश के पिछड़े इलाकों में लोगों को शिक्षित करने और जमीनी स्तर पर कार्य कर सकें।
यात्रा के पड़ाव की महत्वपूर्ण घटना
चंद्रशेखर की पदयात्रा जब तमिलनाडु पहुंची तो अजीब घटना घटी। राज्य के पहाड़ी इलाके में एक गांव में जब चंद्रशेखर यात्रा लेकर जा रहे थे तब एक बुजुर्ग महिला ने उनसे सवाल किया। महिला ने पूछा कि देश की आजादी के 40 साल बीत गए है। इसके बावजूद उन्हें अब तक पीने का पानी नहीं मिल सका है। पानी उन्हें कब तक देंगे? इस सवाल का चंद्रशेखर ने जवाब दिया और जब दिल्ली जाए तो वहां पर उसका जिक्र किया। दिल्ली में हुई पहली बैठक में उन्होंने पानी मुहैया कराने को लेकर सवाल खड़ा किया।
यात्रा में सामने आईं लोगों की असली परेशानी
चंद्रशेखर की भारत यात्रा के दौरान लोगों की बुनियादी चीजों की समस्या उभरकर सामने आई। दिल्ली की मीटिंग में उन्होंने बताया कि रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई और दवाई समेत बुनियादी चीजों का इंतजाम किए बिना देश का विकास संभव नहीं है।
1974 आते-आते इंदिरा गांधी की लोकप्रियता तेजी से कम होने लगी थी। गुजरात से चली आंदोलन की आग दिल्ली तक पहुंच गई थी। मोरारजी देसाई गुजरात सीएम की बर्खास्तगी के साथ विधानसभा भंग करने की मांग को लेकर दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ गए थे। चंद्रशेखर के मोरारजी देसाई के साथ पुराने संबंध थे। हालांकि कांग्रेस में टूट के बाद दोनों का संपर्क भी टूट गया था, फिर भी वह उनसे मिलने अनशन स्थल पर पहुंचे। चंद्रशेखर ने मोरारजी देसाई से अनशन तोड़ने को कहा। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो देश में अराजकता फैल जाएगी। लेकिन देसाई नहीं माने और कहा कि सब कुछ ऊपर वाले की इच्छा पर निर्भर करता है। उत्पन्न संकट को देखते हुए चंद्रशेखर ने जगजीवन राम और वाईवी चव्हाण से मुलाकात की और जल्द कुछ करने को कहा। लेकिन दोनों ने हस्तक्षेप करने से इंकार किया और कहा कि इंदिरा गांधी किसी भी सूरत में मोरारजी देसाई की मांगों के सामने नहीं झुकेंगी। इसके बाद चंद्रशेखर के पास सीधे इंदिरा गांधी से संपर्क करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। मुलाकात के दौरान इंदिरा गांधी ने चंद्रशेखर से कहा कि अगर वह मोरारजी देसाई की मांग मान लेती हैं तो फिर पूरे देश से ऐसी मांग उठने लगेगी। चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी से भी दो टूक कहा कि अगर मोरारजी देसाई को कुछ होता है तो पूरे देश में माहौल बेकाबू हो सकता है।
अंतत: चंद्रशेखर के हस्तक्षेप का असर दिखा और इंदिरा गांधी का रुख नरम हुआ। वह बातचीत के लिए तैयार हुईं। इंदिरा गांधी ने उमा शंकर दीक्षित को चंद्रशेखर से मिलने भेजा। गुजरात विधानसभा को भंग कर दिया गया। इस कदम ने बिहार आंदोलन को और हवा दे दी। इसके बाद इंदिरा गांधी जेपी पर आंदोलन से दूर रहने का दबाव बनाने लगीं। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि जेपी पर जितना दबाव पड़ रहा था, वह उतने ही मजबूत हो रहे थे। चंद्रशेखर की ख्वाहिश थी कि जेपी और इंदिरा गांधी मिलकर काम करें जो देश के लिए ऐतिहासिक वरदान होता। लेकिन बाद के दिनों में जिस तरह का घटनाक्रम रहा, उससे उनकी यह आशा निराशा में बदलने लगी। पटना में जेपी मूवमेंट के प्रदर्शन के दौरान पुलिस का लाठीचार्ज हुआ, जिसमें कई बुरी तरह जख्मी हुए। इसके बाद भी चंद्रशेखर ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी। वह बार-बार दोनों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे थे। जब वह दिल्ली आए तो इंदिरा गांधी ने उन्हें मिलने के लिए पीएमओ बुलाया। वहां पहुंचने पर जब सुरक्षाकर्मियों ने उनसे पीएमओ जाने को कहा तो उन्होंने कहा कि वहां का रास्ता उन्हें नहीं पता है। यह सुनकर सभी हैरान थे। 1962 में एमपी बनने के बाद पहली बार वह पीएमओ जा रहे थे।
(रूपा पब्लिकेशन की ओर से प्रकाशित पुस्तक ‘चंद्रशेखर, दि लास्ट आइकन ऑफ आइडियॉलजिकल पॉलिटिक्स’ से साभार)
यात्रा के बाद कब प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर
चंद्रशेखर की यात्रा के बाद जनता दल को लेकर लोगों में भरोसा दिखा था। हालांकि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बाजी पलट गई। इसके बाद 1989 में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और जनता दल की सरकार बनी। इस दौरान वीपी सिंह का नाम संसदीय दल के नेता के रूप में चुना गया। हालांकि बाद में वीपी सरकार गिर गई। इस पर कांग्रेस ने जनता दल को समर्थन दिया और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। चंद्रशेखर 10 नवंबर 1990 को देश के 8वें प्रधानमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने 21 जून 1991 तक प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने जनता दल के एक अलग गुट की अल्पमत सरकार का नेतृत्व किया।
चंद्रशेखर का सफरनामा
चन्द्रशेखर का जन्म 17 अप्रैल 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित इब्राहिमपट्टी गांव के एक किसान परिवार में हुआ था। वह 1977 से 1988 तक जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे थे। अपने छात्र जीवन से ही चन्द्रशेखर राजनीति की ओर आकर्षित थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पीजी डिग्री करने के बाद वह समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए थे। 1955-56 में वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के महासचिव बने। 1984 से 1989 तक के समय को छोड़ कर 1962 से वह संसद सदस्य रहे। 1989 में उन्होंने अपने गृह क्षेत्र बलिया और बिहार के महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और दोनों ही चुनाव जीते। बाद में उन्होंने महाराजगंज की सीट छोड़ दी।
चंद्रशेखर के नक्शेकदम पर राहुल गांधी
राजनीतिक जानकारों की माने तो चंद्रशेखर की भारत यात्रा से प्रेरित होकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी आज से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शुरू कर रहे हैं। यह यात्रा 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों से गुजरेगी और लगभग 150 दिनों की इस पदयात्रा में 3,570 किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी। इस यात्रा का मकसद यह संदेश देना भी है कि कांग्रेस ही वह पार्टी है जो भारत को जोड़कर रख सकती है। अगर जनता तक यह संदेश भली भांति पहुंच गया तो इससे पार्टी में भी फिर से जान आ जाएगी।

