संजीव कुमार
महाश्वेता देवी की ‘द्रोपदी’ को यूं ही दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से नहीं निकाला गया है. बहुत ख़तरनाक कहानी है. चार साल पहले मेरे एक लेख में उसका हवाला आया था. इसमें उसके ख़तरनाक होने का सार मिल जाएगा.
’द्रौपदी’ 1978 में प्रकाशित महाश्वेता देवी के कहानी-संग्रह ‘अग्निगर्भ’ में संकलित है. उसकी पात्र है, दोपदी मांझिन नामक एक आदिवासी स्त्री, जो नक्सली होने के आरोप में सेना के जवानों द्वारा पकड़ी जाती है. बड़ा साहब–सेनानायक–उससे पूछताछ करता है और फिर डिनर का वक़्त होने पर सैनिकों को उसे ‘ठीक करने’ का निर्देश देकर चला जाता है.
इसके बाद रात भर उसके साथ बारी-बारी से बलात्कार किया जाता है. शरीर का अंग-प्रत्यंग खून और वीर्य से लिथड़ जाता है. दोपदी गिनती भी नहीं कर पाती, क्योंकि वह बार-बार बेहोश हो जाती है. आखि़रकार सुबह के समय एक सिपाही उसे उसके कपड़े सौंपता है और साहब से मिलने के लिए चलने का आदेश देता है.
दोपदी कपड़े पहनने से इंकार कर देती है जो कि अपने शरीर को लेकर शर्मिंदा होने से इंकार करना है. वह नंगी हालत में ही साहब से मिलने पहुंचती है और उसे कहती है कि तुमने ‘ठीक करने’ कहा था, देखोगे नहीं, कैसे ठीक किया है सबने ! बौखलाया हुआ सेनानायक जब सैनिकों से पूछता है कि इसके कपड़े कहां हैं, तो उत्तर दोपदी देती है, ‘कपड़ों का क्या काम ? तुम मुझे नंगा कर सकते हो, पर दुबारा कपड़े कैसे पहना सकते हो ?’
अपनी ज़ख़्मी देह के साथ सेनानायक के सामने खड़ी दोपदी एक ऐसा भयावह दृश्य है जिसका सामना उसने आज तक नहीं किया था. वह ‘पहली बार एक निहत्थे टारगेट के सामने डरा हुआ खड़ा है, भयानक रूप से डरा हुआ.’ कहानी इसी नोट पर ख़त्म होती है.
जब कहानी प्रकाशित हुई थी, उस समय तक ऐसी कोई घटना घटी हो जिसमें किसी स्त्री ने अपनी नंगी देह को एक अमोघ अस्त्र बनाकर राज्यसत्ता का सामना किया हो, ऐसा ज्ञात नहीं होता. इसलिए सत्तर और अस्सी के दशक में यह कहा जाना बड़ा आसान रहा होगा कि यह तो असंभव है, ऐसा भी कहीं हो सकता है !
पर जब 2004 में उस इंफाल शहर में, जहां के नाटककार कन्हाईलाल ने सन् 2000 से इस कहानी का मंचन आरंभ किया था, 12 औरतों ने आसाम राइफ़ल्स के सैनिकों द्वारा थंगजाम मनोरमा के बलात्कार और हत्या के विरोध में सर से पांव तक नंगे होकर ‘इंडियन आर्मी, रेप अस’ का बैनर उठाये सेना के कैंप के सामने प्रदर्शन किया, तो मानो एक कहानी शब्दों से निकल कर हक़ीक़त में साकार हो गयी और प्रतिरोध का सबसे अनोखा नमूना विश्व-इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया.
प्रतिरोध का यह तरीक़ा चुनने के पीछे कन्हाईलाल द्वारा मंचित ‘द्रौपदी’, जिसमें निर्वस्त्र दोपदी की भूमिका में उनकी पत्नी साबित्री होती थीं, की प्रेरणा मौजूद थी. यानी इस मामले में कहानी यथार्थ का नहीं, यथार्थ कहानी का अनुसरण कर रहा था.
अगर हम यह न भी मानें कि इस घटना के पीछे ‘द्रौपदी’ की प्रेरणा थी, तो भी मेरी दलील में कोई फ़र्क नहीं पड़ता. वैसी स्थिति में यही कहना होगा कि कहानीकार ने यथार्थ में छिपी हुई एक ऐसी संभावना को देख लिया था जो पच्चीस साल बाद प्रकट हुई.
‘द्रौपदी’ के इस उदाहरण के बाद यह बताने की ज़रूरत नहीं कि कहानी नयी संभावनाओं की दिशा में हमारी कल्पनाशीलता को उन्मुक्त करे, इस बात का क्या मतलब है.
तो निष्कर्ष यह कि दुनिया-में-ऐसा-नहीं-हो-रहा की युक्ति से किसी कथा को ख़ारिज करना और दुनिया-में-ऐसा-हो-रहा-है की युक्ति से उसका बचाव करना, दोनों बेमानी हैं. कथाओं को, यहां तक कि यथार्थवादी पद्धति से लिखी गयी कथाओं को भी, अपनी विश्वसनीयता बाहर से अर्जित नहीं करनी पड़ती है.
उनका घटना-विकास अगर कारण-कार्य और संभाव्यता के नियमों से बंधा होता है तो पाठक को विश्वसनीय लगता है, भले ही वैसा बाहर कहीं घटित होने की बात पाठक की जानकारी में न हो. ऐसा न होता तो कहानीकारों पर भी यह शर्त लागू होती कि वे पाद-टिप्पणियों के रूप में वास्तविक घटनाओं का हवाला देते चलें !

