-निर्मल कुमार शर्मा,
दुनिया में बहुत से उन्नतिशील देशों के ठीक विपरीत वर्तमान के कथित लोकतांत्रिक भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में यहाँ के संपूर्ण राजनैतिक पटल पर अपराधी,दागी,बलात्कारी, दंगाई और मॉफिया प्रवृत्ति के अपराधियों का वर्चस्व हो गया है ! इस देश का कितना दुर्भाग्य है कि यहाँ की वर्तमानकाल के संसद में 33प्रतिशत दागी,बलात्कारी और मॉफिया पृष्ठभूमि के लोग ‘माननीय सांसद जी ‘बनकर बैठे हुए हैं ! इसी प्रकार पूरे देश में सभी राज्यों के विधानसभाओं में बैठे कुल 4896 विधायकों में 36प्रतिशत विधायकों मतलब 1765 विधायकों के खिलाफ गंभीर अपराधों के लिए मुकदमें चल रहे हैं। हम देखते हैं कि नेता चाहे कितना भी अपराधिक प्रवृत्ति का अपराधी हो,हत्यारा हो,बलात्कारी हो,अपने विगत् जीवन में दंगे फैलाने के लिए जहरबुझे,धार्मिक व जातीय वैमनस्यता को बढ़ावा देनेवाले वक्तव्य देकर दंगा फैला चुका हो,मतलब दंगाई हो,इस अपराधिक कुकृत्य के लिए जेल गया हो या वर्तमानकाल में जेल में हो !
उक्तवर्णित परिस्थितियों और अपराधिक कुकृत्य कर चुके कथित नेता भी कथित भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के चुनावी नाटक में चुनाव लड़ सकता है ! इतना होने के बावजूद भी वह दागी,बलात्कारी,हत्यारा,मॉफिया प्रवृत्ति का नेता अगर चाहे तो दो सीटों से एक साथ ही चुनाव भी लड़ सकता है ! लेकिन यहाँ की आम जनता मतलब मतदाता दो जगहों पर वोट नहीं डाल सकता,अगर वह दो जगह जगह मतदान कर देता है तो उसका यह गंभीर दंडनीय अपराध है !अगर हम-आप मतलब एक सामान्य मतदाता जेल मे बंद हों तो वोट तो कतई नहीं डाल सकते,लेकिन भारतीय नेता जेल में रहते हुए भी बड़े आराम से चुनाव लड़ सकता है,उसे न यहाँ की संवैधानिक व लोकतांत्रिक संस्थाएं मसलन पुलिस, चुनाव आयोग यहाँ तक कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षक कथित सबसे बड़ी न्यायिक संस्थान सुप्रीमकोर्ट भी अपनी मौन सहमति जताकर चुप रहने जैसी अलोकतांत्रिक, असंसदीय व अवैधानिक कुकृत्य कर रहा है ! आप मतलब भारत का आम जन या मतदाता कभी जेल गये थे,तो अब आपको जिंदगी भर कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी,लेकिन नेता चाहे जितनी बार भी हत्या या बलात्कार के मामले में जेल गया हो, फिर भी वो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जो चाहे बन सकता है,बैंक में मामूली नौकरी पाने के लिये आपका ग्रेजुएट होना जरूरी है ! लेकिन यहाँ का नेता अंगूठा छाप हो तो भी भारत का फायनेन्स मिनिस्टर बन सकता है ! सरकारी कर्मचारी 30 से 35 वर्ष की संतोष जनक सेवा करने के उपरांत भी आज पेंशन का हकदार नहीं है ? जब कि मात्र 5 वर्ष के लिए विधायक या सांसद को ताउम्र पेंशन पाने का हक है ! यह कहाँ का न्याय है ?आपको सेना में एक मामूली सिपाही की नौकरी पाने के लिये डिग्री के साथ 10 किलोमीटर दौड़ कर भी दिखाना होगा ! लेकिन यहाँ का नेता यदि अनपढ़-गंवार और लूला-लंगड़ा है तो भी वह भारतीय जलसेना, वायुसेना और थलसेना यानी तीनों सेनाओं का बड़ी ही ठसक और बेशर्मीभरे शान से उसका चीफ यानि डिफेन्स मिनिस्टर बन सकता है और जिसके पूरे खानदान में आज तक कोई स्कूल नहीं गया वो इंटरमीडिएट पास करके भी नेता देश का शिक्षामंत्री तक बन सकता है या बन सकती है ! और जिस नेता पर दंगा कराने,हजारों लोगों को मौत के घाट उतारने के अपराध में दर्जनों केस चल रहे हों या जो एक समय न्यायलय द्वारा जिला बदर या तड़ीपार की सजा से दंणित हो चुका हो,वह नेता संदिग्ध व दागी नेता भी पुलिस डिपार्टमेंट का चीफ यानी कि इस देश का गृह मंत्री का पदभार संभाल सकता है,बन सकता है !
योगी,संत,महात्मा आदि शब्द उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है,जो सांसारिक स्वार्थ, कुटिलता,लोभ,क्रोध,हवस, हत्या,बदले की भावना,कुवचन,कठोर वचन,दंगे-फ़साद कराने आदि बुराइयों से स्वयं को ऊपर उठा ले। वह अपना सारा समय समस्त मानवता के कल्याण करने में लगाए। इस दृष्टिकोण से गौतम बुद्ध,गुरू नानक देव,संत कबीर दास,संत रविदास आदि महान लोग उक्त वर्णित संत-महात्माओं की कसौटी पर खरे उतरते हैं। योगी और संत बनने के लिए वाह्य आडंबर यथा गेरूआ वस्त्र,ललाट पर चौड़ा टीका,पूजा-पाठ,किसी मंदिम,मस्जिद,चर्च गुरूद्वारे का मुख्य पुजारी बनना आदि बिल्कुल आवश्यक और जरूरी नहीं है। इस कसौटी पर गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर का मुख्य पुजारी आदित्यनाथ,जिसका असली नाम अजय सिंंह बिष्ट है,किसी भी कसौटी पर खरा नहीं उतरता ! समाचार माध्यमों की रिपोर्ट्स के अनुसार,उस पर भारतीय दंड संहिता मतलब आईपीसी की विभिन्न धाराओं क्रमशः धाराओं मसलन 146,147, 148, 149,151-ए ,153-ए, 279,297, 307,336,427, 504 और 506 के अन्तर्गत उसके खिल़ाफ धर्म,जाति,निवास,जन्मस्थान,भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और सद्भाव को बिगाड़ने के मामले के अलावे,हत्या करने जैसे संगीन मामले भी सम्मिलित हैं,मुकदमें लंबित हैं,इसके अलावे इसके एक संगठन हिन्दू युवा वाहिनी के सदस्यों ने एक बार गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर खड़ी ‘मुंबई-गोरखपुर गोदान एक्सप्रेस ‘के कई डिब्बों में आग लगाने का भी दुष्कृत्य करने का प्रयास भी किया था,जिसमें उस ट्रेन के रेलयात्री जलने-मरने से बाल-बाल बचे थे। यही क्रूर,दंगाई व अमानवीय व्यक्ति डॉक्टर काफिल खान जैसे परोपकारी,सज्जन और दयालु तथा निरपराध व्यक्ति को पिछले दिनों जेल में जबर्दस्ती डाला हुआ था ! जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के सक्रियता से छोड़ा जा सका ! यह कटुसच्चाई और यथार्थ है कि इस देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री का दामन तक भी साफ नहीं है ! ये दोनों ही गुजरात के भीषण दंगों के समय क्रमशः वहाँ के गृहमंत्री और मुख्यमंत्री थे ! जहाँ महिलाओं,बच्चों सहित हजारों लोगों का निर्दयतापूर्वक जनसंहार किया गया था ! सीबीआई के जज स्वर्गीय बृजमोहन हरिकृष्ण लोया को इन दोनों को अपराध मुक्त न करने के दृढ़ निश्चय पर उनकी संदिग्ध परिस्थितियों और हालातों में हत्या कर गई,जिसकी अभी तक न्यायोचित व समुचित न्यायिक जांच ही नहीं करने दी गई है ! उनके संदिग्ध मौत पर अभी भी धुंध की गहरी चादर पड़ी हुई है ! परन्तु इससे भी ज्यादे खेद,अफसोस और दुःखद बात यह भी है के न्यायपालिका के जज भी आजकल प्रायः भाई-भतीजावाद,जातिवाद और सांप्रादायिकता को आधार बनाकर पक्षपात पूर्ण निर्णय दे रहे हैं !
ये पक्षपात पूर्ण नियम और कानून अब बदलने ही चाहिए,अब भारत में भी इस देश की राजनैतिक भविष्य तय करनेवाले नेताओं की शिक्षा,सच्चरित्रता,कर्मठता,सामान्य ज्ञान,देश की जनता से किए वादे के प्रति प्रतिबद्धता अनिवार्य होनी ही चाहिए। इसके अलावे दागी,बलात्कारी, दंगाई,हत्यारों,मॉफियाओं को भारतीय राजनीति में कतई जगह नहीं मिलनी चाहिए,जो जातिवाद और धर्म के नाम पर साम्प्रादायिक घृणा फैलाकर आम जनता का खून बहाए हों,ऐसे देश के,समाज के दुश्मनों के हाथों में इस देश की राजनैतिक सत्ता के नेतृत्व की बागडोर किसी भी सूरत में नहीं जानी चाहिए, ऐसा इस देश के लोकतांत्रिक, जनतांत्रिक,मानवीयता आदि सामान्य मानवीय संवेदना आधारित मूल्यों में विश्वास करनेवाले लोग और यहाँ का चुनाव आयोग और सुप्रीमकोर्ट ऐसे अपराधियों,दागियों व संदिग्ध चरित्र के दरिंदों को भारतीय राजनैतिक पटल से दूर रखने में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करें । आखिर ये कौन सा भारतीय लोकतंत्र है जिसमें इतने अपराधी तत्व यहां के कथित लोकतंत्र की रक्षा का कार्यभार संभाल रहे हैं ! अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश के अजय सिंह बिष्ट,कथित योगी आदित्यनाथ जैसे अपराधियों के किए कदाचारों पर चल रहे मुकदमों को शीघ्रता से निर्णय कर इसके लिए उसे कठोरतम् दण्ड मिले। अब इस देश की सत्ता की बागडोर शिक्षित,कर्मठ,युवा, ईमानदार,देशभक्त आदि लोग अपने हाथ में लें,तभी इस देश में गुणात्मक सुधार होना संभव हो सकता है।
कितने दुःख, अफसोस,बिस्मित व हतप्रभ करनेवाली बात है कि भारतीय लोकतान्त्रिक व संसदीय व्यवस्था के सबसे बड़े रक्षक माननीय सुप्रीमकोर्ट को अब ये कहने को बाध्य होना पड़ रहा है कि ‘हमारे हाथ बंधे हैं। हम केवल कानून बनाने वालों की अंतरात्मा से अपील कर सकते हैं कि वे कुछ करें। उम्मीद है वे एक दिन जागेंगे और राजनीति में अपराधीकरण को खत्म करने के लिए बड़ी सर्जरी करेंगे ‘ लेकिन यक्षप्रश्न है क्या आपको लगता है कि इन अपराधिक प्रवृत्ति के कानून बनाने वालों की अंतरात्मा कभी जगेगी भी ! कम से कम इस देश की आम जनता,जिसे इस देश की आवाम भी कह देते हैं,को इस बात की उम्मीद बहुत कम है,क्योंकि भारतीय आवाम पिछले 74 सालों से अपनी दयनीय जीवन की बेहतरी के लिए कम से कम लगभग 15 बार अपने वर्तमान समय की गरीबी,बेरोजगारी,अशिक्षा और भ्रष्टाचार से तंग आकर कुछ बेहतर चरित्र के कर्णधारों के चयन की उम्मीद से बार-बार मतदान की है,लेकिन पिछले 74 सालों का इतिहास इस बात का साक्षात प्रमाण है कि हर बार भारत की जनता बुरी तरह छली गई है,हर बार पिछले कर्णधारों से भी बदतर,क्रूर,धोखेबाज,दगाबाज, असहिष्णु ,बर्बर,आमजनविरोधी नीतियों को लागू करनेवाले सत्ता के कर्णधार भारत के अनेक राज्यों और केंद्र में सत्ता हथियाने में कामयाब हो जाते हैं,वर्तमानकाल के अधिकतर राज्यों और केंद्र में सत्ता पर काबिज सत्ता के कर्णधार ऐसे ही संदिग्ध चरित्र के हैं,यही कटुसच्चाई और कटुयथार्थ है ! भले ही आज अधिकतर भाँड़ मिडिया के नपुंसक पत्रकार और संपादक इस सच्चाई को कभी न लिखें,न प्रकाशित करें !..और यही इस देश और यहाँ के निष्क्रिय,धर्मभीरु और निस्तेज समाज की बिस्मित कर देनेवाली भयावहतम् सच्चाई भी है !
-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र.

