_-निर्मल कुमार शर्मा
वर्ष 2019 में 14 फरवरी को एक रहस्यमयी आरडीएक्स से लदी कार द्वारा जम्मू से श्रीनगर जाने वाली हाईवे पर अर्धसैनिक बलों की 78 बसों के कफिले में,जो बुलेट प्रूफ बस नहीं थी,उसमें उल्टी दिशा से टक्कर मारकर भयंकर बिस्फोट करके,दिल दहला देने वाली दुर्घटना में हमारे सीआरपीएफ के 40 जवानों की जघन्यतम् हत्या करा दी गई। इस दुर्घटना को सूक्ष्मता से विश्लेषित करने पर निश्चित रूप से यह मात्र एक सामान्य आतंकी दुर्घटना नहीं जान पड़ती है,क्योंकि इस भयावहतम् दुःखद दुर्घटना के होने को कई कोणों से विश्लेषण करने पर यह निश्चित रूप से एक गहरी साजिश के तहत जानबूझकर कराई गई एक सामूहिक हत्या ही प्रतीत होती है। फरवरी 2020 के समाचार पत्रों में पुलवामा विस्फोट की जाँच करने वाली जाँच एजेंसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की इस जांच के सम्बंध में एक बड़ी ही विचित्र,हास्यास्पद व क्षुब्ध कर देने वाला बयान पिछले दिनों आया था उसके अनुसार, ‘पिछले साल पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के 5 खड्यंत्रकारियों या इसे अंजाम देने वालों के सुरक्षाबलों से मुठभेड़ में मारे जाने के साथ इस घटना की जांच उस बिन्दु पर पहुंच गई है,जहां से संभवतः इसमें आगे बढ़ने की कोई राह नहीं दिख रही है,इस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी को चुनौतियाँ मिल रहीं हैं,क्योंकि इस हमले को अंजाम देने वालों या इसके सरगना के बारे में कोई ठोस सूचना उपलब्ध नहीं है,हमारे लिए यह अंधेरे में तीर मारने जैसा एक मामला था,अमोनियम नाइट्रेट,नाइट्रो ग्लिसरीन और आरडीएक्स जैसे विस्फोटकों से लदा वाहन नष्ट हो गया था,विभिन्न स्थानों से मानव अवशेषों को जुटाकर उन्हें डीएनए प्रोफाइलिंग के लिए भेजा गया आदि-आदि। ‘*

आश्चर्य की बात है यह है कि अब वही राष्ट्रीय जांच एजेंसी या एनआईए अब इस जांच को गलत दिशा में भटकाने के लिए अब एक बिल्कुल मनगढंत पूरे 1350 पन्नों की एक आरोप पत्र बनाई है जिसमें अब वह नये सिरे से यह बता रही है कि उस भयावह बिस्फोट करने में पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आइएसआई और वहाँ के दुर्दांत आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर और उसके सहयोगियों का हाथ था या उनके मिलीभगत से इस घटना को अंजाम दिया गया,लेकिन निम्नलिखित वर्णित शंका के बादल इस घटना को और भी शक के दायरे में ला देते हैं,यथा जम्मू-श्रीनगर हाईवे देश के उन अतिसंवेदनशील हाईवे में से एक है जहां भारतीय सेना द्वारा कारों,टैक्सियों, बसों,ट्रकों आदि वाहनों की सबसे अधिक सघन जांच होती है जहां हर गाड़ी की कड़ी और सघन जांच होने के बाद ही उसे आगे जाने की अनुमति मिलती है तो वह संदिग्ध वाहन,जिस पर इस सरकार के अनुसार 250से 300 किलोग्राम तक उच्च बिस्फोटक आरडीएक्स लदा था वहाँ कैसे पहुंच गई ? जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल को इस हमले की आशंका की खुफिया एजेंसियों से पूर्व सूचना मिल चुकी थी जिसे वे दिल्ली सरकार के प्रधानमंत्री,रक्षामंत्री,गृहमंत्री आदि सत्ता के महत्वपूर्ण कर्णधारों को सूचित कर चुके थे,फिर इस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं हुई ?इस आसन्न आतंकी खतरे की सूचना के बाद भी बेहद ख़राब मौसम में 78 गाड़ियों के काफिले में 24547 जवानों को एयरलिफ्ट न कराकर 30 किलोमीटर प्रतिघंटे की धीमी रफ्तार से धीरे -धीरे जम्मू से श्रीनगर ले जाने का क्यों और कौन आदेश दिया था ? भारतीय सेना के ही एक रिटायर्ड जनरल के अनुसार इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक सीमापार मतलब पाकिस्तान से लाना संभव ही नहीं है जाहिर है यह विस्फोटक देश से ही आतंकियों को आपूर्ति की गई। उक्त बिन्दुओं पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी जांच न कर इस केस में जमकर लीपापोती कर रही है और किन्हीं गुप्त भारी दबाव में इसी देश में छिपे असली गुनाहगारों को बचा रही है ! यह वही राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआइए है जो प्रोफेसर आनन्द तेलतुंबड़े,स्टेन स्वामी,वरवरा राव आदि जैसे 16अन्य वकीलों,कवियों,लेखकों, पत्रकारों,आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के हितों के लिए अपना जीवन समर्पित कर देनेवाले समाज के देवदूतों को बिना वजह पिछले दो सालों से बगैर आरोपपत्र दखिल किए जेल में ठूस रखी है और उन पर कानून की वे धाराएं लगाई है जो आतंकवादियों और उग्रवादियों के लिए लगाई जातीं हैं मसलन युएपीए मतलब अनलॉफुल ऐक्टिविटीज प्रिवेंशन ऐक्ट धारा लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया ! इस प्रकार हम देखते हैं कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी या एनआइए की छवि कोई बहुत साफ-सुथरी नहीं है,अपितु वह सत्ता की एक दुमहिलाऊ,चाटुकार और सत्ता के कर्णधारों के इशारों पर नाचने वाली एक संस्था बनकर रह गई है। ऐसी बदनाम संस्था से हम निष्पक्ष और ईमानदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ?जिसके दामन पर इतने दाग लग चुके हों !
यक्षप्रश्न यह भी है कि जब जम्मू-कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर भारतीय सेना की उपस्थिति थी सेना द्वारा हर गाड़ी-वाहन की सघन जाँच हो रही थी,तब वह 250 या 300 किलोग्राम अत्यंत ज्वलनशील बिस्फोटकों से लदी गाड़ी उतनी संवेदनशील जगह पर पहुंच कर मुख्य सड़क पर उल्टी दिशा में करके वह संदिग्ध कार खड़ी कैसे हो गई ?जिस पर कुछ ही मिनटों में सेना के 24547 सैनिकों को लिए हुए 78 बसों का काफिला आ रहा था ! अगर आसन्न आतंकवादी खतरे की पूर्व सूचना दिल्ली के सत्तासीन कर्णधारों को थी,तब उन अभागे सीआरपीएफ के जवानों को जम्मू से श्रीनगर सुरक्षित एयरलिफ्ट करके पहुँचाने में आखिर किसको,क्यों और कैसे परेशानी हो गई कि उन्हें बस से भेजकर उनके अमूल्य जीवन को खतरे में डालने का मूर्खतापूर्ण ,सनकभरा और जानबूझकर निर्णय लिया गया ! यही निर्णय लेने वाला पूरे पुलवामा हत्याकांड का ‘असली गुनाहगार ‘है। इस केस की शुरुआती जांच तो इसी बिन्दु से प्रारम्भ होनी चाहिए थी कि एयरलिफ्टिंग की सुरक्षित ले जाने की जगह बस से ले जाने का सनकभरा यह निर्णय आखिर किसके आदेश से पारित हुआ ? यह तो रक्षा मंत्रालय की फाइलों से बिल्कुल शीशे की तरह बिल्कुल साफ और स्पष्ट हो जाएगा और वही व्यक्ति इस भयावह दुर्घटना में मारे गये, 40 जवानों की हत्या कराने का निश्चित रूप से असली गुनाहग़ार है। उस व्यक्ति का चेहरा इस देश के सामने लाने का पुनीत कार्य ‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी आईएनए को निर्भीकतापूर्वक करनी चाहिए थी,वही व्यक्ति इस पूरे कारूणिक दुर्घटना का ‘मुख्य सूत्रधार और सबसे बड़ा गुनहगार ‘है। इस घटना के लिए संभावित सबसे बड़ा गुनहगार रक्षा मंत्रालय का कोई सबसे बड़ा ब्यूरोक्रेट है या तत्कालीन रक्षा मंत्री है ! इस महत्वपूर्ण व गंभीर मामले की जांच अगर राष्ट्रीय जांच एजेंसी या आईएनए कर सकने में अक्षम साबित हो रही है तो इसकी जांच किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को दे देना चाहिए जो पुलवामा में मारे गये 40 बेगुनाह सेना के जवानों के अनाथ हो गये बीबी-बच्चों और उनके माँ-बापोंं को न्याय दिला सके और इस देश की 1 अरब 40 करोड़ जनता को भी यह पता चल सके कि आखिर 40 सेना के जवानों का हत्यारा आखिर है कौन ? इस मामले में लीपापोती आखिर कब तक चलेगी ! भारत की जनता की सब्र की सारी सीमाएं अब टूट रहीं हैं ! आखिर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से मुकदमे हारने पर न्याय के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा तो खटखटाया ही जाता है वहाँ मुकदमा भी तो दायर किया ही जाता है,तो पुलवामा के जघन्यतम् हत्या के कातिलों की पहचान के लिए अगर राष्ट्रीय जांच एंजेसी जैसे नाकारा सरकार की पिट्ठू जांच एजेंसी से पुलवामा हत्याकांड के कातिलों की जांच नहीं हो पा रही है,तो इस देश की और सरकारी जांच एजेंसियों यथा रॉ,सीबीआई,सीआईडी,आईबी आदि संस्थाओं या किसी देशी या विदेशी स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच एजेंसी से जांच क्यों नहीं कराई जा सकती ! आखिर 40 बेगुनाह सेना के जवानों का सामूहिक हत्या कराने वाले हत्यारे का चेहरा भी तो सभी के सामने आना ही चाहिए, यह राष्ट्रीय हित और देशहित में है ! हत्यारे की पहचान होनी ही चाहिए चाहे वह कितने ही ऊँचे पथ पर क्यों न बैठा हो !
*_-निर्मल कुमार शर्मा , ‘राजनैतिक,सामाजिक, वैज्ञानिक व पर्यावरण आदि विषयों पर बेबाक व स्वतंत्र लेखन ‘,गाजियाबाद,उप्र