मध्यप्रदेश सरकार वकीलों को पैसा देने को तैयार है पर विस्थापितों का पुनर्वास करने को क्यों तैयार नही है ?
एड. आराधना भार्गव
पेंच व्यपवर्तन परियोजना मध्यप्रदेश के छिन्दवाडा जिले के पेंच नदी पर चैरई विधान सभा क्षेत्र के ग्राम माॅचागोरा में बनाई गई है। परियोजना के अन्तर्गत पेंच नदी पर 5970 मीटर लम्बाई में, अधिकतम 41 मीटर ऊचाई का मिट्टी बाँध तथा 360 मीटर लम्बाई में पक्के बाँध का निर्माण किया गया है। बाँध की कुल लम्बाई 6,330 मीटर है। बाँध स्थल पर पेंच नदी का जल आवक क्षेत्र 1754.73 वर्गमीटर एवं बाँध की पूर्ण भण्डारण क्षमता 577 मिलियन घन मीटर है बाँध के बाँये पाश्र्व से 20.07 किलोमीटर लम्बी बाँयी तट नहर तथा दाँयी पाश्र्व से 30.135 किलोमीटर लम्बी दाँयी तट नहर का सपना दिखाकर छिन्दवाड़ा एवं सिवनी जिले के क्रमशः 4939 हेक्टेयर एवं 4449 हेक्टेयर में सिंचाई करने की घोषणा मध्यप्रदेश सरकार ने किया, किन्तु आज दिनांक तक माॅचागोरा बाँध से लगे ग्राम चीजगांव तक भी नहर का पानी नही पहुँच पाया। सिवनी जिले के किसान आज भी नहर से पानी मिलने का सपना संजोये बैठे है। माॅचागोरा बाँध भ्रष्टाचार की चपेट में आ चुका है। उद्घाटन के पहले ही बाँध में दरारें आ चुकी है तथा नहर में पन्नी बिछाई जा रही है, नहरें भ्रष्टाचार की चपेट में आने के कारण नहरें में पानी नही छोड़ा जा रहा है, इस कारण बाँध का पानी पुनः नदी में छोड़ा जाता है। जब बाँध का पानी नदी में छोड़ा जाता है उसके परिणाम स्वरूप नदी के किनारे बसे गांव तथा किसानों के खेत पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं, इसके मुआवजे की कोई नीति भी भारत सरकार द्वारा नही बनाई गई है।
पेंच व्यपवर्तन परियोजना में छिन्दवाड़ा जिले के 31 गांव के किसान प्रभावित हुए हैं, जिसमें से भुतेरा, धनौरा, बारह बरियारी, भूला, चंदिया पूर्णतः डूब गये है, इन किसानों की 1 इंच जमीन या मकान नही बची है। परियोजना का कार्य 04 नवम्बर 2012 से प्रारम्भ किया गया तथा लगभग 2015 तक सभी किसान अपनी जमीन से विस्थापित किये गये। मध्यप्रदेश शासन जल संसाधन विभाग ने मध्यप्रदेश आदर्श पुनर्वास नीति 2002 के अनुसार पेंच व्यपवर्तन परियोजना से विस्थापित परिवार का पुनर्वास प्रस्ताव तैयार किया गया, और किसानों को बड़े बड़े सपने दिखाये गये। ग्रीन ट्रिब्यूनल भोपाल (मध्यप्रदेश) के समक्ष जल संसाधन विभाग ने कहा पेंच व्यपवर्तन परियोजना का कार्य 1986 से प्रारम्भ हो चुका है। परियोजना से प्रभावित किसानों के पक्ष में किसान संघर्ष समिति ने 2007 से अपना संघर्ष किसानों के साथ कर रही है। संघर्ष करते हुए किसानों के पक्ष में जो भी खड़ा होता था उसे छिन्दवाड़ा के जेल के सींखचों के अन्दर डाला जाता था। विस्थापितों के पक्ष में खड़े होने पर नर्मदा बचाओं आन्दोलन की नेत्री मेधा पाटकर जी, किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष डाॅ. सुनीलम्जी, एड. आराधना भार्गव जी, पूर्व विधायक महेशदत्त मिश्रा पत्रकार जगदीश दुबे, रोशन लाल अग्रवाल ऐसे देश के जाने माने हस्तियों को भी फर्जी मुकदमें बनाकर अनेक बार जेल में डाला। किसान संघर्ष समिति विस्थापितों के पक्ष में मध्यप्रदेश सरकार से 2002 की पुनर्वास नीति लागू करने की बात करती रही, लेकिन पुनर्वास नीति बनाने के पश्चात् भी मध्यप्रदेश सरकार आखिर किसानों को उनका हक देने को तैयार क्यों नही है?
रेल्वे या कोयला खदान में किसान की अगर कुछ जमीन चली जाए तो उन्हें मुआवजा तथा सरकारी नौकरी देने का काम सरकार द्वारा किया जाता है। पेंच व्यपवर्तन परियोजना में विस्थापित परिवारों की जीविका उपार्जन का एकमात्र साधन खेती तथा खेती से जुड़े दूध उत्पादन पर ही निर्भर था। जीविका उपार्जन का साधन मध्यप्रदेश सरकार ने जल संसाधन विभाग के माध्यम से छीन लिये, किन्तु आज दिनांक तक किसी को भी रोजगार उपलब्ध नही कराया गया। पुनर्वास नीति जो विशेषतौर पर पेंच व्यपवर्तन परियोजना के नाम पर बनाई गई है जिसकी 1.14 संकं में उल्लेख किया गया है कि सिंचाई परियोजना बनाने के पश्चात् उसमें मछली पालन एवं बिक्री का कार्य विस्थापित परिवारों की सहकारी समिति को दिया जायेगा। पेंच व्यपवर्तन परियोजना में लगभग 8 सहकारी समिति रजिस्टर्ड है पर किसी भी सहकारी समिति को मछली पालन या बिक्री का अधिकार प्रदान नही किया है, बल्कि इसका उल्टा सहकारी समिति को मछली मारने तथा मछली पालने एवं विक्रय करने का अधिकार सिवनी के ठेकेदार को दिया है। अगर मछली पालने एवं विक्रय का अधिकार विस्थापित सहकारी समिति को मिलता तो इसमें लाखों युवाओं को रोजगार मिल सकता था। पुनर्वास नीति के संकं क्रमांक 01 2.3.3 में उल्लेख किया गया है कि डूब से प्रभावित क्षेत्र में जमीन की कीमतें अनेक वर्षो से दबी हुई है। परियोजना के अन्तर्गत अधिग्रहण हेतु प्रस्तावित कृषि भूमि तथा ग्रामीण आबादी प्लाटों का मुआवजा निर्धारित करते समय सीमापवर्ती सिंचाई क्षेत्र (कमाड) की जमीन की कीमतों को आधार माना जावेगा। नगरीय आबादी प्लांटों वा अन्य भूमि का मुआवजा निर्धारित करने हेतु निकटवर्ती डूब क्षेत्र के बाहर के उसी आकार के नगर की भूमि की औसत बिक्री की दरों को आधार माना जायेगा। जल संसाधन विभाग की अगर माने तो 1986 से परियोजना का काम शुरू है इस कारण सन 1986 से पेंच व्यपवर्तन परियोजना से प्रभावित क्षेत्र में जमीन की रजिस्ट्रीयाँ होने पर रोक लगा दी थी, प्रभावित गांव में आवार्ड 2010 से 2014 के बीच में पारित हुए है और डूब प्रभावित गांव की गाईड लाईन से ही मुआवजे की राशि निर्धारित की गई है। अगर पुनर्वासनीति के अनुसार कमाण्ड एरिया की गाईड लाईन से मुआवजे की राशि निर्धारित की जाति तो किसानों को उचित मुआवजा मिल सकता था। एक मुश्त मुआवजे की राशि भुगतान का उल्लेख होने के पश्चात् भी किसानों को 2-3 किश्त में मुआवजे की राशि प्रदान की गई है, इस कारण मुआवजे की राशि बहुत कम मिलने के कारण अधिकतर किसान अन्य जगह पर भूमि नही खरीद पाये। कुछ ने जमीनें खरीदी तो बंजर जमीनें खरीद सके, कुछ किसान विवादित जमीन के चक्कर में पड़ने के कारण जमीन का कब्जा भी नही ले पाये। पुनर्वास नीति में उल्लेख किया गया है कि जितनी जमीन डूब क्षेत्र के लिए अधिग्रहित की जाती है उससे आधी जमीन (50 प्रतिशत) कमाण्ड एरिया में सरकार को अधिग्रहित करना चाहिए और कमाण्ड एरिया में ही विस्थापित परिवार भूमिहीन कृषि मजदूर, कुम्हार, बढ़ाई, नाई, लुहार, बाजा बजाने वाले आदि लोगों को भूखण्ड उपलब्ध कराने तथा मकान बनाने का अनुदान देने का उल्लेख होने के पश्चात् भी विस्थापित परिवार तथा भूमिहीन कृषि मजदूर कुम्हार, बढ़ाई, नाई, लुहार, बाजा बजाने वाले को डूब प्रभावित गांव की शेष बची हुई जमीन पर बसाया गया है। जिस जगह पर बसाया गया है वहाँ पर अलग से गाय के कोठे के लिए ना तो भूखण्ड आवंटित किये गये और ना ही गौशाला बनाने के लिए कोई अनुदान दिया गया, ना हि गोठान ना ही चरनोही की कोई जमीन उपलब्ध कराई गई है। विस्थापित परिवार को जिस क्षेत्र में बसाया गया है वहाँ रोजगार के कोई साधन उपलध नही है। जीविका उपार्जन का साधन समाप्त होने के कारण मुआवजे की राशि पर ही विस्थापित परिवार निर्भर है। विस्थापितों की जमीन जो बरसात के बाद खुलती है उसे दस साल के लिए पट्टे पर देने का प्रावधान होने के पश्चात् भी पट्टे प्रदान ना किये जाने के कारण आये दिन गांव में झगड़े हो रहे हैं और पुलिस तथा पटवारी किसानों को लूटने पर उतारू है। प्रत्येक पंचायत में लगभग लाखों पेड़ काटे गये कुछ पंचायतों में तो पेड़ों का मुआवजा दिया परन्तु पुनर्वास नीति के अनुसार नही दिया, बहुत सारे विस्थापितों को उनके खेत में लगे पेड़ों का मुआवजा आज दिनांक तक नही दिया गया। नीति में उल्लेख है कि फलदार वृक्षों की कीमत उनके फलों से सालाना आमदनी और उनकी लकड़ी की मूल्य दोनों के आधार पर ही तय किये जायेंगे। व्यस्क पुत्र या पुत्री को भूखण्ड आवंटित करने तथा भूखण्ड पर मकान निर्माण के लिए अनुदान का उल्लेख है। 31 गांव में एक भी व्यस्क पुत्री को भूखण्ड आवंटित नही किये गये तथा किसी भी गांव में किसी भी विस्थापित परिवार को मकान बनाने का अनुदान नही दिया गया। परिसम्पत्ति याने पेड़, कुँआ, बोर, पाईप लाईन का मुआवजा देने का उल्लेख करने के पश्चात् भी विस्थापित परिवारों को परिसम्पत्ति का मुआवजा नही दिया गया। परिवहन की राशि इतनी कम दी गई कि व्यक्ति उस राशि में दूसरी जगह पर परिवहन नही कर पाया और मुआवजे की राशि देकर उसने अपने मकान का परिवहन किया। विशेष भू-अर्जन न्यायालय की स्थापना ना होने से आज दिनांक तक विस्थापितों की कोई खोज खबर लेने वाला नही है। नीति के संकं के 29.3 पर उल्लेख किया गया है कि मुद्रांक वा पंजीयन शुक्ल से छूट का प्रावधान होने के पश्चात् भी लोगों को मुद्रांक व पजीयन शुल्क से छूट प्रदान नही की गई है। पंजीयन शुल्क तथा मुद्रांक शुल्क से छूट पाने के लिए विस्थापित परिवार दर दर ठोकरें खा रहा है। जल संसाधन विभाग या जिलाधीश छिन्दवाड़ा द्वारा यह कहकर किसान को धूतकार दिया जाता है कि अब तुम्हारी फाईल बन्द हो चुकी है परियोजना से सम्बंधित किसी भी मांग को लेकर हमारे पास मत आना, परियोजना के लिए अब कोई पैसा नही है।
विस्थापितों को जिस जगह पर बसाया है वहाँ पर ना तो रोजगार है, ना स्वास्थ्य की सुविधा है, ना मनोरंजन का साधन है, ना पीने को साफ पानी है, बच्चों के लिए खेलने का ग्राउण्ड भी नही है, लाईट के खम्बे तो लगे है पर उनमें बल्व नही है। सड़क का तो नामो निशान नही है। विस्थापितों का जो दर्द और पीड़ा है उसे समझना जरूरी है। जमुनिया पुनर्वास केन्द्र के एक विस्थापित ने बताया कि कोई भी बाहर का आदमी रात में आकर उन्हें डराता धमकाता है तथा सड़क के किनारे पुनर्वास केन्द्र होने के कारण शराब पीकर लोग गाली गलोच करते है मना करने पर जान से मारने की धमकी देते है। सरकार द्वारा जिस तरीके से भूखण्ड अवंटित किये गये है उसमें एकरूपता नही है व्यवस्थित तरीके से पुनर्वास केन्द्र की स्थापना ही नही की गई है ना ही पुनर्वास केन्द्र में विस्थापितों की सुरक्षा की कोई व्यवस्थ नही किया है। 7 नाबालिक लड़कियों के साथ दुष्कर्म किया गया आवाज उठाने पर जान से मारने की धमकी दी गई। विस्थापित परिवार के लोग किसी अन्य गांव में जाकर बसे तो उनकी आजादी पूर्णतः समाप्त हो गई, वे अपनी मर्जी से दुर्गा, गणेश तथा ताजिया जैसे कार्यक्रम भी नही कर पाते हैं, उन्हें डूब क्षेत्र के व्यक्ति के नाम से ही सम्बोधित किया जाता है वे अपनी मर्जी से उस गांव में नही रह सकते उन्हें काम कराने के लिए मजदूर भी उपलब्ध नही होते, जो मान और सम्मान विस्थापित किसान का अपने गांव में था वह पूरी तरीके से समाप्त हो चुका है। जबकि पुनर्वास का मतलब है जो जिस स्थिति में था उससे उपर उसका जीवन स्तर हो जिस तरीके से देश की राष्ट्रपति पहले राज्यपाल थी उनका विस्थापन हुआ और वे राष्ट्रपति के पद पर पहुँची याने जिस स्थिति में थी उससे उपर स्थिति में पहुँच गई। आदिवासीयों के लिए पुनर्वास नीति में विशेष प्रावधान है आदिवासी की जितनी जमीन अधिग्रहित की है, उतनी जमीन कमाण्ड एरिया में देने का प्रावधान होने के पश्चात् भी आदिवासीयों को उनका हक सरकार देने को तैयार नही है। हिन्दु कोर्ट बिल में परिवर्तन करके सरकार आदिवासी महिलाओं को उनके सम्पत्ति पर अधिकार की बात कर रही है किन्तु पेंच व्यपवर्तन परियोजना से प्रभावित आदिवासी महिलाओं को ना तो भूखण्ड देने को तैयार है ना तो मकान बनाने के लिए अनुदान। आईये हम सब मिलकर विस्थापित परिवारों के दर्द और पीड़ा को समझें तथा एकजुट होकर पुनर्वास नीति को लागू कराने हेतु उनका साथ दें।
एड. आराधना भार्गव तथा विस्थापित परिवार ने उच्चतम् न्यायालय में अपील की है जिसमें मानननीय न्यायमूर्ति डाॅ. डी वाय चन्द्रचूड तथा माननीय न्यायमूर्ति हिमा कोहली जी ने मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस भेजा है जिसमें विस्थापितों का पुनर्वास कर दिया है शपथ पत्र के साथ जवाब मांगा है। मध्यप्रदेश सरकार ने अपने पक्ष में 9 वकील खड़े किये है जिसमें वह लाखों रूपये प्रति पेशी वकीलों को फीस देने के लिए तैयार है तथा इस बात की फीस वकीलों को दे रही है कि विस्थापित किसानों को पुनर्वास नीति का लाभ ना मिले वा विस्थापितों के पक्ष में फैसला ना हो। सरकार वकीलों को पैसा देने के लिए तैयार है पर विस्थापितों के पुनर्वास की नीति बनाने के पश्चात् भी उनका पुनर्वास करने को तैयार क्यों नही है ?
एड. आराधना भार्गव
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