शशिकांत गुप्ते इंदौर
OBC का फूल फॉर्म होता है।Other Backward Class अर्थात अन्य पिछड़ा वर्ग।मध्यप्रदेश की कुल आबादी में ओबीसी की संख्या 51 प्रतिशत है।मध्यप्रदेश सरकार यह डेटा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया है।समाचार माध्यमों में यह खबर पढ़ ,सुनकर यकायक प्रख्यात व्यंग्यकार स्व.शरद जोशीजी के इस व्यंग्य का स्मरण हुआ है।मध्यप्रदेश पर लिखे व्यंग्य में शरद जोशीजी ने लिखा कि, यह मध्य में इसलिए मध्य और प्रदेश है इसलिए प्रदेश है।
यहां दो तरह की जाति पायी है,एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण और दूसरी आदिवासी। जो ब्राह्मण नहीं है।वे सभी आदिवासी हैं।यहाँ दो तरह की भाषा बोली जाती है।एक हिंदी और दूसरी English. जिनका Prononuciation अच्छा होता है वे सिर्फ english ही बोलतें हैं।यहाँ की सरकार जगह जगह पुल बनाती है।जिनके नीचे से नदिया निकल सके?यदि सरकार पुल ही नहीं बानाएगी तो नदिया किसके नींचे से निकलेगी?शरद जोशीजी ने व्यंग्य के अंत में प्रदेश में आने वालें महमानों के लिए लिखा है कि, आप हमारे यहाँ हो तो आप हमारे मालिक और आपका भगवान मालिक?यह शरद जोशीजी के व्यंग्य का छोटा हिस्सा है।
शरद जोशीजी ने यह व्यंग्य, प्रदेश में दस्सूओं द्वारा आत्मसमर्पण के बाद लिखा था।तात्कालिक समय में प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र में दस्सुओं का बहुत आतंक था।तात्कालिक दस्सू वेश भूषा से स्पष्ट पहचाने जा सकतें थे।जोशीजी का यह व्यंग्य,आज भी प्रासंगिकता है।प्रदेश की आबादी में पचास प्रतिशत अन्य तरह के पिछड़ों की आबादी है।आबादी में जो शेष बचें हैं,उन्होंने स्वयं ही मान लेना चाहिए वे लोग पिछड़े नहीं है।यह अगड़े और पिछड़े की सियासत कब तक चलेगी?अगड़े सदा इस बात से भयभीत रहतें हैं कि, पिछड़े अयोग्य होकर भी आरक्षण के कारण उपलब्धि प्राप्त कर लेतें हैं।यदि इस बात को सच मान ले,तो एक सामान्यज्ञान का प्रश्न पैदा होता है? खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालें,चिकित्सा क्षेत्र में मनमानी फीस वसूल कर महंगी दवाई लिखने वाले चिकित्सक,चिकित्सक मरीज को जो दवाई लिखतें हैं, वह निश्चित या सहज समझने वाली भाषा में कहा जाए कि,अनुबंधित मेडिकल शॉप पर ही क्यों मिलती है?
क्या यह सारे लोग आरक्षण की सुविधा प्राप्त ही हैं? कुकुरमुत्ते जैसे हर एक फर्लांग पर छोटे छोटे उद्योग के रूप में विकसित नर्सिंग होम के संचालको में कितने आरक्षण वालें हैं?महामारी के दौरान दवाईयों, ऑक्सीजन,और अन्य चिकित्सा सामग्री की काला बाजारी हुई क्या यह सभी पिछड़े या अति पिछड़े या अन्य वर्ग के पिछड़े हैं?इक्कसवीं सदी में भी समाज के अंतिम सोपान पर खड़े व्यक्ति को अगड़ों के घर से सामने से जातें हुए अपने जूते चप्पल सिर पर रखना पडतें हैं?क्या यह गर्व की बात है?यह किसी एक प्रदेश की समस्या नहीं है।समूचे मानव समाज की समस्या है।अगड़े और पिछड़े की सियासत छोड़ कर जब मानिसक रूप से लोग परिपक्व होंगे तब यह अगड़े और पिछड़े की समस्या समाप्त होगी।यह सारा खेल यथास्थितिवादियों द्वारा खेला जाता है।यथास्थितिवादी सदा ही परिवर्तन के विरोधी होतें हैं।इनलोगों को यह समझ लेना चाहिए कि परिवर्तन संसार का नियम है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

