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*कब त्यागेंगे ऐसे सोच को?*

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शशिकांत गुप्ते

रोटी बेटी के व्यवहार का प्रचलन सामंती सोच है।
रोटी और बेटी से क्या तात्पर्य है?
‘रोटी’- मतलब खाने-पीने में दूरी या भेदभाव, इसलिए किसी के जातिय बहिष्कार के लिए जो प्रचलित मुहावरा है वह है- ‘हुक्का-पानी बंद करना’. ‘बेटी’- मतलब वैवाहिक संबंधों को बनाने से परहेज करना।
सामंती युग तो समाप्त हो गया,लेकिन सामंती मानसिकता आज भी विद्यमान है।
रोटी,बेटी के व्यवहार के विरुद्ध प्रगतिशील विचारधारा ने आंदोलन किया। जाति-तोड़ो, छुआछूत मिटाओ,अंधश्रद्धा
और दकियानूसी रूढ़ियों के विरुद्ध अभियान चलाया।
प्रगतिशील विचारधारा के पक्षधर,
सामाजिक,साहित्यिक, और राजनैतिक क्षेत्र में सलग्न लोगों के साथ कट्टरपंथी लोगों ने हमेशा छल कपट ही किया।
कट्टरपंथियों का समर्थन हमेशा यथास्थितिवादियों किया है।
अंग्रेज चले गए लेकिन सामंती सोच, ऊंच-नीच,फिरकापस्ती,
आपस में बाटों और राज करों
की घृणित मानसिकता छोड़ गए।
इसी मानसिकता से ग्रस्त राजनेताओं ने रोटी,बेटी के व्यवहार को सत्ता और पूंजी की सियासत में तब्दील कर दिया।
आज यही मानसिक विकार प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है।
राजनीति में भ्रष्ट आचरण,के आरोपियों को सत्ता में बगैर परहेज के विराजित किया जा रहा है।
विराजित करने वाले भ्रष्टाचार घोर विरोधी हैं। आस्थावान लोग हैं।
इसीतरह रोटी बेटी के व्यवहार को सत्ता,पूंजी के व्यवहार में तब्दील कर दिया।
हम सब ….. मौसेरे भाई हैं।
अंत में यही कहना शेष है,जो शायर राजेश रेड्डी अपने शेर में कहा है।
जितनी बटनी थी बट चुकी ये ज़मीं
अब तो बस आसमान बाक़ी है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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