मुनेश त्यागी
आजादी की 75 वीं वर्षगांठ मनाने के मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से दहाड़ रहे थे कि अब वे भारत में विज्ञान और अनुसंधान करने पर जोर देंगे। हमारा समाज पिछले हजारों साल से अंधविश्वास, धर्मांधता, अज्ञानता, पाखंड और डपोरशंखी समाज और सोच बनाने का स्थान रहा है क्योंकि आजादी से पहले इन सब को परखने का, ज्ञान विज्ञान का, जरिया हमारे पास नहीं था। हमारे धर्म शास्त्रों में जो लिखा था, हमारे अधिकांश लोग उसी पर विश्वास कर रहे थे और उसी के अनुसार उन्होंने अपना जीवन ढाल दिया था।
मगर 1947 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में इन मनुवादी, पुराणपंथी, रूढ़ीवादी, ब्राह्मणवादी पुराणपंथी, रूढ़ीवादी और धर्मांध विचारों और मान्यताओं को छोड़ने का निश्चय किया गया। 1950 में भारत के संविधान का निर्माण हुआ और उसमें निश्चय किया गया कि अब भारत में ज्ञान विज्ञान से पूर्ण वैज्ञानिक संस्कृति का प्रचार प्रसार किया जाएगा। हजारों साल से चले आ रहे इन तमाम अंधविश्वास और धर्मांधता पर चोट करनी पड़ेगी, जनता की नजरों में इनकी पोल खोलनी पड़ेगी और इन्हें धराशाई करना पड़ेगा। संविधान में यह भी स्थापना की गई थी कि अब भारत में ज्ञान-विज्ञान का प्रचार प्रसार किया जाएगा, वैज्ञानिक संस्कृति का प्रचार प्रसार किया जाएगा और मानव समाज को आधुनिक ज्ञान विज्ञान पर आधारित करके भारत में एक मानवीय समाज, एक वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित आधुनिक समाज, का निर्माण किया जाएगा।
कुछ दिनों तक इस ओर कुछ काम भी किया गया। भारत में बहुत सारे प्राइमरी, हाई स्कूल इंटरमीडिएट विद्यालय, महाविद्यालय, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का प्रचार प्रसार और निर्माण किया गया। बहुत सारे मेडिकल कॉलेज खोले गए। बहुत सारे आई आई एम, आई आई टी, वैज्ञानिक अनुसंधान के संस्थान बनाए गए और इनके द्वारा संविधान के मूल्यों को, आदर्शों को और आदेशों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ा गया और इस प्रकार भारत में आधुनिक ज्ञान विज्ञान की परिपाटी की शुरुआत की गई और इस प्रकार भारत में ज्ञान विज्ञान और वैज्ञानिक संस्कृति की रोशनी और ज्ञान-विज्ञान का साम्राज्य कायम करने की नीव रखी गई।
मगर पिचहतर साल की आजादी के आते-आते आज हम भारत में देख रहे हैं कि पिछले कुछ सालों से भारतीय समाज में अंधविश्वास, धर्मांधता, अज्ञानता, पाखंडों और ढपोरशंखी वातावरण, व्यवहार, सोच और मानसिकता का प्रचार प्रसार बहुत तेजी से किया जा रहा है। अब भारतीय समाज और राजनीति में धर्मनिरपेक्षता और ज्ञान विज्ञान और वैज्ञानिक संस्कृति के सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी है। धर्म, राष्ट्र और राज्य कार्यों में हस्तक्षेप करने लगा है। बहुत सारे तथाकथित राजनीतिक नेता धर्मांधता, अंधविश्वास और पाखंडों की शरण में चले गए हैं। वे खुलेआम भारत के संवैधानिक मान्यताओं का, वैज्ञानिक संस्कृति का, खुल्लम खुल्ला उलंघन कर रहे हैं।
राजकीय कार्यों में अंधविश्वास और धर्मांधता का प्रयोग कर रहे हैं। हवाई जहाज पर नींबू और प्याज टांग रहे हैं। भारत में जो कुछ हो रहा है उसे भगवान की कृपा बता रहे हैं। यहां जो भी कुछ हो रहा है, वह भगवान की मर्जी से हो रहा है। उनका कहना है कि यहां जो कुछ भी हो रहा है, वह भगवान की मर्जी से हो रहा है और यहां कण कण में राम और भगवान व्याप्त है।
यहां पर हम पूछ सकते हैं कि क्या समाज में हो रहे अन्याय, शोषण, जुल्म ज्यादति, हिंसा, दंगे, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी यह सब भगवान की मर्जी से हो रहे हैं और इन सब में भगवान व्याप्त है? अगर हम ज्ञान विज्ञान की कसौटी पर, इन बातों को जांचने की कोशिश करें तो, हम पाते हैं कि यह सब एकदम झूठा प्रचार है, अंधविश्वासी प्रचार है, पाखंड पूर्ण प्रचार है और यह भारतीय संविधान, कानून के शासन और ज्ञान-विज्ञान के साम्राज्य और संस्कृति के खिलाफ एकदम खुल्लम-खुल्ला दगाबाजी है।
आज हमें फिर से बताया जा रहा है कि जब लक्ष्मी उल्लू पर सवारी कर सकती है, गणेश चूहे पर सवारी कर सकता है, सरस्वती हंस पर सवारी कर सकती है तो सावरकर बुलबुल की पीठ पर बैठकर सवारी सकता है और जेल के दरवाजे तोड़कर भारत भ्रमण कर सकता है। इस प्रकार वर्तमान बीजेपी की कर्नाटक सरकार द्वारा आठवीं के छात्रों को यह पढ़ाया जा रहा है और अब लगता है कि पूरी की पूरी सरकार ने ज्ञान विज्ञान के सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी है।
वह ज्ञान विज्ञान के सिद्धांतों को खुलेआम रौंदने पर उतर आई है। जनता के बहुत सारे हिस्से भी इसी मानसिकता और सोच के शिकार हो गए हैं और आज हम देख रहे हैं कि हमारी सरकार कानून के शासन, संवैधानिक मूल्यों के साथ, ज्ञान विज्ञान की मान्यताओं के साथ, तर्क और विवेक के साथ, जैसे एक किस्म की छल कपट और गद्दारी कर रही हैं। सरकार एक तरफ तो ज्ञान, विज्ञान और अनुसंधान की जय की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ तमाम तरह के मनुवादी और ब्राह्मणवादी विचार, पुरातनपंथी, रूढ़ीवादी, अंधविश्वास, धर्मांधता, अज्ञानता और पाखंडों को बढ़ाने में और पालने पोसने में जी जान से लगी हुई है।
आज हमें अगर विज्ञान की जय और अनुसंधान की जय का भारत तैयार करना है तो हमें हजारों साल से चली आ रही तमाम तरह की रुढ़िवादी, पुराणपंथी, ब्राहमणवादी, मनुवादी, अंधविश्वासी और धर्मांध सोच, मानसिकता, व्यवहार और आचार विचार को छोड़ना पड़ेगा, इन्हें पूर्ण रूप से धराशाई करना पड़ेगा और इनके खिलाफ जनता में एक जन जागरण के प्रचार प्रसार का अभियान चलाना पड़ेगा और जनता में विवेकशील, तर्कशील और ज्ञान वैज्ञानिक आधारित संस्कृति का प्रचार प्रसार करना पड़ेगा, ज्ञान विज्ञान की संस्कृति का माहौल पैदा करना पड़ेगा और जनता के आचार विचार और व्यवहार को तर्क वितर्क विवेक और ज्ञान विज्ञान के प्रचार प्रसार से पुष्पित पल्लवित करना पड़ेगा।
इसी के साथ साथ भारत की सारी जनता को, सारे धर्मों के लोगों को, यह बताना पड़ेगा कि हमारे समाज में, हमारे देश में, अभी तक जो होता आया है वह प्रकृति की देन है और मानवीय क्रियाकलापों, और किसानों मजदूरों के श्रम, परिश्रम और पुरुषार्थ व मेहनत की देन है। यहां पर तथाकथित भगवानों, ईश्वरों, देवी-देवताओं, गॉड, अल्लाह खुदा ने कुछ नहीं किया है क्योंकि वे सिर्फ और सिर्फ हसीन काल्पनिक कल्पनाएं हैं। हकीकत में वे इस दुनिया और ब्रह्माण्ड में नहीं हैं और यहां इस दुनिया में जो कुछ भी होता आया है, वह कारण और कार्य की वजह से हुआ है। क्योंकि यहां कुछ भी बिना कारण नहीं होता। जो कुछ भी हो रहा है उसके पीछे कारण होते हैं, उसके पीछे बहुत सारे वजुहात होते हैं। हम सबको यह बात समझनी पड़ेगी और यह बात और यह हकीकत पूरी जनता को समझानी पड़ेगी, उसके दिमाग में लानी पड़ेगी। ऐसा किए बगैर ज्ञान की, विज्ञान की और अनुसंधान की, जय नहीं हो सकती।
बड़े अफसोस की बात है कि जहां हमारी सरकार के नेताओं, मंत्रियों, सांसदों,विधायकों और कार्यकर्ताओं को धर्मनिरपेक्षता और ज्ञान विज्ञान की संस्कृति का प्रयोग करना चाहिए और उन्हें अपने व्यवहार और आचार विचार में लाना चाहिए था, वहां ऐसा नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ हमारा सारा समाज और व्यवस्था, पूरी की पूरी सरकार और उसका सारा अमला उन्हीं पुरानी धर्मांधता, अवैज्ञानिकता, अंधविश्वास, अज्ञानता और पाखंडों के भंवर में फंसी हुई है। हमें लगता है की प्रधानमंत्री मोदी की “जय विज्ञान और जय अनुसंधान” की यह ताजातरीन मुहिम भी एक कोरी भाषणबाजी और जुमलेबाजी बनकर ही रह जाएगी।
बेहद अफसोस की बात है हमारी जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी इन हजारों साल पुरानी धर्मांधता अंधविश्वास पाखंडों अज्ञानता विवेकहीनता, तर्कहीनता की मान्यताओं और आस्थाओं से जुड़ा हुआ है। वह आज भी माने हुए बैठा है कि ब्रह्मा के चार सिर थे, ऋंग रिषी हिरण से पैदा हुआ था, द्रोणाचार्य दोने से पैदा हुआ था, हनुमान कान से पैदा हुआ था, करण सूर्य से पैदा हुआ था, गणेश मैल से पैदा हुआ था, राजा जनक अपने पिता की जांघ से पैदा हुआ था, सीता घड़े से पैदा हुई थी, राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न खीर खाने से पैदा हुए थे, लव कुश घास से पैदा हुए थे, मकरध्वज मछली से पैदा हुआ था, हनुमान सूर्य को निगल गया था, हिरण्यक्ष पृथ्वी को उठा सकता है, पत्थर पानी पर तैर सकते हैं, जुआ खेलकर युधिष्ठिर धर्मराज हो गया, पृथ्वी शेषनाग और कछुए की पीठ पर टिकी हुई है, सरस्वती की सवारी हंस था, गणेश की सवारी चूहा था, लक्ष्मी की सवारी उल्लू था और यह बेहद अफसोस जनक बात है कि भारत में पढ़े लिखे लोगों का एक बड़ा हिस्सा इस बौद्धिक गुलामी का शिकार है और वह इस सब में विश्वास किए बैठा है। वह आज भी इन सब को सही मान रहा है। अब तो ऐसा लगता है कि जैसे उसने ज्ञान विज्ञान तर्क विवेक और वैज्ञानिक संस्कृति को तिलांजलि दे दी है।
यह सब भारतीय संविधान के अनिवार्य मूल्यों के खिलाफ है, ज्ञान विज्ञान की परंपराओं और संस्कृति के खिलाफ है। ऐसा करके और इस विज्ञानविरोधी और ज्ञान विरोधी, तर्क विरोधी और विवेक विरोधी सोच, मानसिकता, व्यवहार और आचार विचार के चलते, भारत में “विज्ञान की जय, अनुसंधान की जय” का माहौल, समाज व सोच और मानसिकता तैयार नही की सकती और भारतवर्ष और हमारे समाज में ज्ञान-विज्ञान, अनुसंधान और वैज्ञानिक संस्कृति की जय नहीं हो सकती।

